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Old Hindi Film Stories : कहीं दीप जले कहीं दिल

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
Old Hindi Film Stories
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प्रतिबद्धता, कला का औचित्य जैसे भारी-भरकम विशेषणों और अपेक्षाओं के बोझ से दबा होने के बावजूद सिनेमा मूल रूप से स्वस्थ मनोरंजन का एक माध्यम है। फिल्म बनाना एक तकनीकी कौशल वाला काम है इसलिए इस माध्यम में अच्छा फिल्मकार कहने को अच्छी कहानियाँ ढूँढता रहता है। कई बार एक ही कहानी कई-कई फिल्मकार अपनी तरह से दर्शकों के सामने ले कर आते हैं और दर्शक कहानी पर कम और कहन पर अधिक केंद्रित होकर कथाओं का आनंद लिया करते हैं।


सीआईडी, नौ दो ग्यारह, प्यासा सहित लगभग एक दर्जन फिल्मों में कला निर्देशन का कार्य करने, चौदवीं का चाँद जैसी शानदार फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशक का फिल्म फेयर पुरस्कार जीतने वाले बीरेन नाग के निर्देशकीय कौशल पर निर्माता, गायक और संगीतकार हेमंत कुमार ने विश्वास किया और जब बीरेन नाग अपनी पहली फिल्म बनाने का प्रस्ताव लेकर हेमंत कुमार के पास गए तो उन्होंने उसे स्वीकार किया, इस तरह अस्तित्व में आई साल 1962 की सबसे बड़ी फिल्म ‘बीस साल बाद’। फिल्म को ‘जिघांसा’ नामक बांग्ला फिल्म का रीमेक माना जाता है जो हेमेन्द्र कुमार रॉय के बांग्ला उपन्यास ‘निशिथिनी बीविशिका’ पर आधारित थी। यह दीगर बात है कि हेमेन्द्र कुमार रॉय का यह उपन्यास खुद सर आर्थर कैनन डायल की कृति ‘द हाऊन्ड्स ऑफ बास्करवाइल्स’ से प्रेरित रचना मानी जाती है ।


चंदनगढ़ स्टेशन पर जब रात को ट्रेन रुकती है तो वहाँ उतरने वाले नौजवान को सलाह दी जाती है कि इतनी रात गए उस भूत बंगले में जाना ठीक नहीं। अगले फ्रेम में पता चलता है कि ये नौजवान फिल्म का नायक विजय (विश्वजीत) है। स्टेशन पर विजय को ले जाने के लिए आए डॉक्टर पाण्डेय (मदनपुरी) बताते हैं कि बीस साल पहले विजय के दादा जी, फिर उसके पिता जी और अब हाल ही में उसके चाचा जी की हत्या हो चुकी है। डॉक्टर पाण्डेय, विजय को कहते हैं कि चंदनगढ़ की उस हवेली के बाशिंदे बीमार हो कर नहीं मरते, उससे पहले मार दिए जाते हैं। हवेली की तरफ जाते उन्हें भी डर लगता है, लेकिन जागीर की नौकरी छोड़ना भी नहीं चाहते।

हवेली पहुँचने पर उनका सेवक लक्ष्मण (देव किशन) जब विजय को बताता है कि वो कमरा, जिसकी खिड़की जंगल तरफ खुलती है और जहां से घुँघरुओं की आवाज भी आया करती है, उसी कमरे में सारे जागीरदार रहा करते थे, जिनकी हत्या हुई है तो विजय भी उसी कमरे में रहना चुनता है। अगली सुबह जब विजय अपनी जागीर की और जागीर से लगे जंगल की सैर कर रहा होता है तो उसकी मुलाकात राधा (वहीदा रहमान) से होती है जो वहाँ बकरियाँ चरा रही होती है।

इससे पहले की राधा का पूरा परिचय पता चले वहाँ मोहन (सज्जन) आ जाता है। जल्द ही विजय के साथ ऐसी फिल्मों में होने वाली घटनाएं घटनी शुरू हो जाती है, खिड़की से कभी रोने, कभी गाने की आवाज सुनाई देती है, थोड़ी दूर पर एक लड़की भी दिखाई देती है, वहाँ पहुँचने पर लड़की वहाँ से दूर नजर आती है जैसी घटनाएं होनी शुरू हो जाती हैं। धीरे धीरे कहानी में रामलाल (मनमोहन कृष्ण) आते हैं जो राधा के चाचा हैं और हवेली के पुराने विश्वासपात्र रहे हैं।

लक्ष्मण विजय को बताता है कि उसके दादा जी जब जागीरदार बने तो उन्होंने गाँव की लड़कियों पर बुरी नजर डालना शुरू कर दिया इन लड़कियों में एक लड़की रामलाल की भी थी, जिसने अपनी जान दे दी और भूत बन कर बदला लेने के लिए हत्याओं पर हत्याएं किये जा रही है। विजय के चाचा और विजय के पिता भी उसी बदले की भेंट चढ़ गए। फिल्म में कुछ एक हत्याओं, कर्णप्रिय गीतों और उलझाती घटनाओं के बाद असली कातिल और हत्याओं के पीछे का असली सच सामने आ जाता है और पुलिस कातिल को गिरफ्तार कर लेती है।


साल 1962 की सबसे सफल फिल्म ‘बीस साल बाद’ गीतांजलि पिक्चर्स के बैनर तले बनी थी और ज्यादातर इंटरनेट सोर्स फिल्म के रिलीज की तारीख पहली जनवरी ही बताते हैं। बीरेन नाग निर्देशित इस फिल्म की पटकथा ध्रुव चटर्जी और संवाद देव किशन ने लिखे थे। शकील बंदायूनी के लिखे गीतों को निर्माता हेमंत कुमार ने संगीत दिया और गीतों को आवाज दी हेमंत कुमार और लता मंगेशकर नें, फिल्म का छायांकन मार्शल ब्रगैन्जा नें और सम्पादन केशव नंदा ने किया।

नायक विश्वजीत की ये पहली हिन्दी फिल्म थी और इस फिल्म ने उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट का दर्जा पाया। बांग्ला फिल्मों के स्टार विश्वजीत को सबसे पहले गुरुदत्त ने हिन्दी सिनेमा साहब बीवी और गुलाम में भूतनाथ का रोल ऑफर किया। क्योंकि बांग्ला थिएटर में बिमल मित्र की इस कालजयी कृति पर खेले जा रहे नाटक में बिश्वजीत भूतनाथ का चरित्र निभा रहे थे। इनका चयन, मीना कुमारी, अबरार अल्वी और गुरु दत्त ने नाटक देख कर किया, पर क्योंकि विश्वजीत गुरुदत्त की प्रोडक्शन कंपनी के साथ पाँच साल के अनुबंध में बंधना नहीं चाहते थे इसलिए बात बनी नहीं।

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फिल्म से जुड़े अपने अनुभवों को याद करते हुए एक साक्षात्कार में विश्वजीत ने बताया कि अपनी पहली हिन्दी फिल्म की शूटिंग के दौरान, होंठों में सिगरेट फंसा कर दलदल के इर्दगिर्द घूमते हुए वो खुद की उपस्थिति को लेकर बेहद असमंजस में थे, और हिन्दी सिनेमा में अपना भविष्य उन्हें खतरे में लगने लगा था पर जब फिल्म का प्रीमियर हुआ तो पार्श्वसंगीत, लता मंगेशकर की आवाज की कशिश और मार्शल ब्रगैन्ज़ा के कैमरे के जादू ने उन्हें एहसास दिलाया कि बीस साल बाद उस वक्त दुनिया की किसी भी भाषा के सिनेमा से टक्कर लेने लायक फिल्म है ।

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‘बीस साल बाद’ को वर्ष 1962 के फिल्म फेयर पुरस्कारों की कुल सात श्रेणियों में नामांकित किया गया और चार श्रेणियों साउन्ड डिज़ाइनिंग के लिए एस वाई पाठक, सम्पादन के लिए केशव नंदा, कहीं दीप जले कहीं दिल गीत के लिए लता मंगेशकर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिक और शकील बंदायूनी को इसी गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। फिल्म ने कुल तीन करोड़ से ऊपर कमाई की और इसका शुद्ध लाभ भी डेढ़ करोड़ था।

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फिल्म के एक बहुत महत्वपूर्ण किरदार रामलाल के रूप में नजर आने वाले मनमोहन कृष्ण भारतीय सिनेमा के पुरोधाओं की श्रेणी में गिने जाते हैं। कई हिन्दी और पंजाबी फिल्मों में काम करने वाले मनमोहन कृष्ण ना सिर्फ अदाकारी के लिए जाने जाते हैं बल्कि अपने कैरियर के शुरुआती दौर में उन्होनें पार्श्वगायन भी किया है। ‘धूल का फूल’ के गीत ‘तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा’ की प्रसिद्धि ने मनमोहन कृष्ण को हर घर का परिचित चेहरा बना दिया। अपने कैरियर में इन्होंने यशराज फिल्म्स के लिए ‘नूरी’ फिल्म का निर्देशन भी किया ।

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हिन्दी से लेकर पंजाबी फिल्मी दुनिया में अपनी प्रतिभा प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले मनमोहन कृष्ण ने भौतिक विज्ञान की पढ़ाई की थी और प्रोफेसर की नौकरी छोड़ कर फिल्मों में आए थे। फिल्म के गीतकार शकील बदायूनी की बात करें तो ये वो दौर था जब बदायूनी साहब अपनी रचनात्मकता के सर्वोच्च शिखर पर थे। ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ गीत के लिए उन्हें लगातार तीसरी बार फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजा गया था। इससे पहले के दो वर्षों में वो क्रमशः‘चौदहवीं का चाँद हो’(चौदहवीं का चाँद) और ‘हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं’(घराना) के लिए भी पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे।

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‘बीस साल बाद’ फिल्म को अपने बेहतरीन गीतों, संगीत और अदाकारी के लिए जाना जाता है। फिल्म में कैमरा तकनीक, पहली ही फिल्म में जबरदस्त और भावप्रणव अभिनय के साथ अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाते विश्वजीत और अपनी निर्देशकीय क्षमता से हिन्दी सिनेमा पर अपनी गहरी छाप छोड़ते बीरेन नाग के लिए ये फिल्म याद की जाएगी।

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फिल्म में कुछ एक दृश्यों में कहानी झटके से आगे बढ़ती है, कुछ कड़ियाँ मिलाने का काम दर्शकों के जिम्मे रह जाता है और लक्ष्मण के रूप में काम करते फिल्म के संवाद लेखक देव किशन कई जगह प्रयास करते हैं कि वो अपनी आँखों और भावभंगिमा से रहस्य गहरा सकें, पर खास कामयाब नहीं हो पाते। फिल्म की कोई भी बात अधूरी रह जाती है अगर हम वहीदा रहमान जी की बात ना करें। ‘बीस साल बाद’ विशेष रूप से उनकी फिल्म है ‘राग मांड’ पर आधारित उन पर फिल्माया गीत ‘सपने सुहाने लड़कपन के’ आज भी उनके भावप्रणव नृत्य और अभिनय के लिए याद किया जाता है।
फिल्म यूट्यूब के साथ साथ एयरटेल एक्सट्रीम के एप पर उपलब्ध है और एयरटेल एक्सट्रीम पर बिना विज्ञापनों के देखी जा सकती है।

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