Jamshedpur : क़ायद-ए-अहले सुन्नत हज़रत अल्लामा अरशदुल क़ादरी (अलैहिर्रहमा) के विसाल के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस वर्ष उर्स को “सिल्वर जुबली” के रूप में मनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। इस ऐतिहासिक आयोजन को यादगार बनाने के लिए मंगलवार शाम जामिया फैज़-उल-उलूम, जमशेदपुर में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता मरकजी उर्स कमेटी के संरक्षक हज़रत अल्लामा गुलाम रसूल बलयावी साहब क़िबला ने की।
बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि 25वीं उर्स-ए-क़ायद-ए-अहले सुन्नत को भव्य, ऐतिहासिक और आदर्श स्वरूप दिया जाएगा। इसके लिए विभिन्न धार्मिक, शैक्षणिक, शोध एवं संगठनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। साथ ही मदरसा के पूर्व छात्रों को विशेष सम्मान स्वरूप इजाजी ट्रॉफी प्रदान की जाएगी तथा विद्यार्थियों के लिए विभिन्न शैक्षणिक प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होगा।
देशभर की प्रमुख खानकाहों के सज्जादानशीनों, उलेमा और शैक्षणिक संस्थानों के जिम्मेदार लोगों की एक विशाल सभा आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया। इसके अलावा हर वर्ष उर्स को “यौम-ए-तहरीक” के रूप में मनाने का संकल्प लिया गया, ताकि अल्लामा अरशदुल क़ादरी के मिशन और विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके।
कार्यक्रमों की रूपरेखा के अनुसार 27 जुलाई 2026 को अखिल भारतीय स्तर पर छात्रों के लिए किराअत, नात, तकरीर और तहरीर प्रतियोगिता आयोजित होगी। 28 जुलाई को कादरी बुक फेयर का उद्घाटन तथा रस्म-ए-परचम कुशाई का आयोजन किया जाएगा। इसी दिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक ऑल इंडिया सेमिनार आयोजित होगा, जिसमें देशभर के विद्वान और बुद्धिजीवी अल्लामा अरशदुल क़ादरी की शैक्षणिक और दावती सेवाओं पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे।
29 जुलाई को नातिया मुशायरा का आयोजन किया जाएगा, जिसमें देश और विदेश के प्रसिद्ध शायर भाग लेंगे। 30 जुलाई को कुल शरीफ का विशेष कार्यक्रम होगा। शाम 4:35 बजे कुल शरीफ अदा किया जाएगा तथा रात्रि में तकरीरी कार्यक्रम आयोजित होगा। इसी अवसर पर मदरसा से फारिग होने वाले छात्रों की दस्तारबंदी भी की जाएगी।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि अल्लामा अरशदुल क़ादरी ने अहले सुन्नत व जमाअत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई। उन्होंने इराक, ईरान, ब्रिटेन, हॉलैंड और नेपाल सहित कई देशों का दौरा कर इस्लामी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘जलजला’ ने उन्हें विश्वस्तरीय पहचान दिलाई। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ, अंतरराष्ट्रीय इस्लामी मुद्दों और सामाजिक विषयों पर प्रभावशाली लेखन किया, जिसके कारण आज भी उन्हें सम्मान के साथ याद किया जाता है।
अल्लामा अरशदुल क़ादरी ने 1950 के दशक में धातकीडीह स्थित मदरसा फैज़-उल-उलूम की स्थापना के लिए संघर्ष करते हुए भूमि प्राप्त की और इसे पूर्वी भारत के प्रमुख इस्लामी शैक्षणिक केंद्र के रूप में विकसित किया। उनके प्रयासों से छात्रावास, विशाल पुस्तकालय, आधुनिक कंप्यूटर कक्ष, मिडिल एवं हाईस्कूल तथा तकनीकी संस्थान की स्थापना हुई। वर्तमान में उनके उत्तराधिकारी हज़रत अल्लामा डॉ. गुलाम ज़रक़ानी क़ादरी साहब के नेतृत्व में संस्थान में आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
बैठक में हज़रत मुफ़्ती आबिद हुसैन नूरी क़ादरी, बिलाल नासिर, मौलाना अब्दुल हन्नान रिज़वी, मेराज साहब, रिज़वान साहब, तनवीर साहब, अजहर खान, मौलाना इम्तियाज, मौलाना रमजान, मौलाना मुख्तार फैज़ी, मौलाना इरफान फैज़ी, इम्तियाज सिद्दीकी, मौलाना महफूज, मौलाना अबू हुरैरा मिसबाही, हाफिज फहीम अख्तर, मास्टर याकूब, मास्टर तंजीम, अब्दुल हमीद, मुफ़्ती मकसूद, मेराजुल हक अंसारी, मौलाना मुजाहिद और मौलाना महबूब आलम सहित बड़ी संख्या में उलेमा और गणमान्य लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन मरकजी उर्स कमेटी के पदाधिकारियों गुलाम शारानी क़ादरी, सगीर अहमद फैज़ी और अबरार कैसर फैज़ी ने किया।
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