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विपक्षी नेताओं ने राज्यपाल से की मुलाकात, 21 सांसदों के हस्ताक्षर वाली सौंपी चिट्ठी

by Rakesh Pandey
विपक्षी नेताओं ने राज्यपाल से की मुलाकात
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विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A के सांसद मणिपुर की राज्यपाल अनुसुइया उइके से मिलने इंफाल के राजभवन पहुंचे हैं। इस बीच, कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने पत्रकारों से बात की। उन्होंने कहा कि मुख्य बात यह है कि मणिपुर में हो रही हिंसा को नजरअंदाज किया गया है।

मणिपुर से लौटने के बाद DMK सांसद कनिमोझी ने कहा कि हमने राज्यपाल को अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं, वह भी चिंतित हैं और चाहती हैं कि हम केंद्र सरकार को बताएं कि हमने क्या देखा है। हम बहस के लिए कहेंगे और हम सरकार को बताना चाहते हैं कि हमने क्या देखा है और लोग भी चाहते हैं सभी दलों के नेता वहां (मणिपुर) जाएं और देखें कि क्या हो रहा है…वहां शांति वार्ता होनी चाहिए, यही एकमात्र रास्ता है।

मुलाकात के बाद 21 सांसदों ने अपने हस्ताक्षर वाली एक चिट्ठी उन्हें सौंपी। इसमें उन्होंने मांग की है कि राज्यपाल सरकार से कहें कि राज्य में हो रही हिंसा को लेकर जरूरी कदम उठाए जाएं। विपक्षी सांसदों ने कहा कि इस मामले पर प्रधानमंत्री की चुप्पी दिखाती है कि वो गंभीर नहीं हैं।

एयरपोर्ट पर RJD सांसद मनोज झा ने कहा, हम चाहते हैं कि मणिपुर में शांति बहाल हो। हमारी एकमात्र मांग है कि दोनों समुदाय सद्भाव से रहें। मणिपुर में स्थिति पीड़ादायक है। संसद में पहले ही चर्चा हो चुकी है कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को मणिपुर का दौरा करना चाहिए।

I.N.D.I.A सांसदों की राज्यपाल को चिट्ठी

हम I.N.D.I.A के सदस्यों ने चुराचांदपुर, मोइरांग और इंफाल के रिलीफ कैंप का दौरा किया है। वहां हम हिंसा पीड़ितों से मिले। उनके दुख, कहानियां, आपबीती सुनकर हम हैरान और दुखी हैं। उनमें खुद को दूसरे समुदायों से अलग किए जाने का गुस्सा है। इस पर बिना देर किए एक्शन लेने की जरूरत है। राज्य और केंद्र सरकार इन दो समुदाय के लोगों के जीवन और संपत्ति को सुरक्षा देने में फेल रही हैं क्योंकि अब तक 140 मौतें, 500 से ज्यादा कैजुअलिटी और 5 हजार से ज्यादा घरों में आग लगाने की घटनाएं हो चुकी हैं। 60 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित किए गए हैं।

स्थिति बिगड़ती जा रही है’

कांग्रेस सांसद ने कहा, “ राज्यपाल ने सुझाव दिया है कि मणिपुर की स्थिति का समाधान निकालने के लिए सभी को मिलकर काम करना चाहिए। जैसे ही हमें मौका मिलेगा, हम संसद में केंद्र सरकार पर दबाव बनाएंगे और लोगों की ओर से उठाए गए मुद्दों के साथ साथ केंद्र सरकार, राज्य सरकार की ओर से जो कमियां हमने यहां देखीं, उन्हें पेश करेंगे।”

संसद के अंदर भी रखेंगे बात

वहीं, विपक्षी सांसदों ने राज्यपाल से मुलाकात के बाद कहा कि संसद में सरकार पर दबाव डालेंगे। सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की और कहा कि मणिपुर की समस्या का हल निकले। ऑल पार्टी मीटिंग हो मणिपुर को लेकर सबको एकजुट होकर पहल करना चाहिए। वैली के लोग हिल्स नहीं जा रहे और हिल्स के लोग वैली नहीं आ पा रहे हैं। सांसदों ने कहा कि अगले दिन हम मणिपुर की समस्या का समाधान करने के लिए सरकार पर दबाव डालेंगे। सदन के अंदर बात रखेंगे। मणिपुर के हाल पर चर्चा होनी चाहिए। देश के अंदर असुरक्षा पैदा हो रही है। हमने गवर्नर को ज्ञापन सौंपा है।

मणिपुर में कब भड़की हिंसा?

3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर (ATSUM) ने ‘आदिवासी एकता मार्च’ निकाला। यह मार्च चुरचांदपुर के तोरबंग इलाके में निकाला गया था। इसी दौरान आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच हिंसक झड़प हो गई. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे। 3 मई की शाम तक हालात इतने बिगड़ गए कि राज्य सरकार ने केंद्र से मदद मांगी। बाद में सेना और पैरामिलिट्री फोर्स की कंपनियों को वहां तैनात किया गया। ये रैली मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के खिलाफ निकाली गई थी। मैतेई समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा देने की मांग हो रही है। मणिपुर हिंसा में अब तक 150 लोग मारे जा चुके हैं।

मैतेई क्यों मांग रहे जनजाति का दर्जा?

मणिपुर में मैतेई समुदाय की आबादी 53 फीसदी से ज्यादा है। ये गैर-जनजाति समुदाय है, जिनमें ज्यादातर हिंदू हैं। वहीं, कुकी और नगा की आबादी 40 फीसदी के आसापास है। राज्य में इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद मैतेई समुदाय सिर्फ घाटी में ही बस सकते हैं। मणिपुर का 90 फीसदी से ज्यादा इलाकी पहाड़ी है।

सिर्फ 10 फीसदी ही घाटी है। पहाड़ी इलाकों पर नागा और कुकी समुदाय का तो घाटी में मैतेई का दबदबा है। मणिपुर में एक कानून है। इसके तहत, घाटी में बसे मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी इलाकों में न बस सकते हैं और न जमीन खरीद सकते हैं। लेकिन पहाड़ी इलाकों में बसे जनजाति समुदाय के कुकी और नगा घाटी में बस भी सकते हैं और जमीन भी खरीद सकते हैं। पूरा मसला इस बात पर है कि 53 फीसदी से ज्यादा आबादी सिर्फ 10 फीसदी इलाके में रह सकती है, लेकिन 40 फीसदी आबादी का दबदबा 90 फीसदी से ज्यादा इलाके पर है।

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