
दिल्ली से निकलते हुए उस सुबह मुझे यह पता नहीं था कि मैं किसी नदी की तलाश में जा रहा हूँ। मेरे सामने बस एक लंबी सड़क थी, कुछ दिनों की छुट्टी थी और पहाड़ की ओर जाने की वह पुरानी इच्छा, जो शहर में रहते-रहते मन के किसी कोने में जमा होती रहती है। दिल्ली की सड़कों पर सुबह अभी पूरी तरह खुली नहीं थी। दूध के ट्रक, दफ्तरों की ओर जाती बसें, चाय की दुकानों पर उठती भाप और फ्लाईओवर के नीचे सोई हुई रात- शहर अपनी रोज की जल्दी में था। मैंने पीछे मुड़कर दिल्ली को देखा तो लगा, यात्रा हमेशा किसी जगह से नहीं, किसी आदत से बाहर निकलने का नाम है। शायद पहाड़ की ओर जाने से पहले सबसे पहले शहर को अपने भीतर से उतारना पड़ता है।
जैसे-जैसे सड़क उत्तर की ओर बढ़ी, शहर का फैलाव पीछे छूटने लगा। खेत दिखाई देने लगे, छोटे कस्बे आए, सड़क किनारे के बोर्ड बदलते गए और फिर वह भूगोल शुरू हुआ जिसमें धरती धीरे-धीरे ऊपर उठती है। हरिद्वार और ऋषिकेश की ओर बढ़ते हुए गंगा का नाम पहले ही हवा में आ जाता है, लेकिन मेरी यात्रा का असली संबंध आगे जाकर अलकनंदा से होना था। यह विचित्र है कि नदियां हमें अपने पास बुलाने से पहले हमारे भीतर अपनी एक कल्पना बना देती हैं। अलकनंदा मेरे लिए तब तक नक्शे पर एक नाम थी; उस दिन से वह रास्ते के बाहर मौजूद कोई वास्तविक चीज नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बनती हुई एक उपस्थिति होने लगी।

ऋषिकेश के बाद सड़क ने अपना स्वभाव बदल लिया। मैदान की सीधी रेखा टूट गई और पहाड़ों ने रास्ते को मोड़ना शुरू किया। खिड़की के बाहर अब हर मोड़ के साथ कोई नया दृश्य खुलता था, लेकिन मैं दृश्यों को गिनना नहीं चाहता था। पहाड़ में यात्रा का अर्थ शायद यही है कि आप कुछ देर के लिए देखने की अपनी आदत छोड़ दें। हर मोड़ पर फोटो लेने की इच्छा धीरे-धीरे कम होती है और उसकी जगह एक शांत-सी निगाह ले लेती है। सड़क के नीचे कहीं गहरी खाई में पानी चमकता दिखाई देता, फिर अचानक गायब हो जाता। कहीं पहाड़ की देह पर घर चिपके थे, कहीं सीढ़ीनुमा खेत, कहीं मंदिर का लाल झंडा हवा में स्थिर था। मुझे पहली बार लगा कि पहाड़ में रास्ते केवल स्थानों को नहीं जोड़ते; वे मनुष्य और भूगोल के बीच पुराने समझौते को भी पढ़ते हैं।
अलकनंदा से पहली मुलाकात किसी भव्य दृश्य की तरह नहीं हुई। वह धीरे-धीरे सामने आई- कभी सड़क के नीचे, कभी किसी पुल के पार, कभी चट्टानों के बीच इतनी गहरी कि केवल उसकी आवाज सुनाई देती। नदी को पहली बार देखकर अक्सर हम उसकी सुंदरता खोजते हैं; मुझे उसकी गति दिखाई दी। वह किसी तस्वीर की तरह स्थिर नहीं थी। उसका रंग बदल रहा था, उसका स्वर बदल रहा था, उसका आकार बदल रहा था। वह पहाड़ से निकलकर केवल नीचे नहीं जा रही थी; वह हर मोड़ पर अपने आसपास की दुनिया को अपने भीतर शामिल करती जा रही थी।
तब समझ आया कि नदी के साथ यात्रा करना किसी नदी को देखने से बिल्कुल अलग अनुभव है। नदी के किनारे खड़े होकर आप उसे बाहर की चीज मानते हैं, लेकिन उसके साथ चलते हुए वह आपके रास्ते का हिस्सा हो जाती है। सुबह जिस धारा को आपने पीछे छोड़ा था, कुछ घंटों बाद वह किसी नए मोड़ पर फिर सामने आ जाती है। वह आपको याद दिलाती है कि यात्रा दूरी से नहीं, संबंध से बनती है। एक ही नदी बार-बार दिखाई देती है और हर बार कुछ अलग कहती है।
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अलकनंदा के किनारे बसे छोटे कस्बों में नदी का जीवन किसी रोमानी चित्र जैसा नहीं था। वहां उसकी मौजूदगी बहुत व्यावहारिक थी। दुकान के बाहर बैठे लोग, पहाड़ से उतरते मजदूर, स्कूल से लौटते बच्चे, सड़क किनारे सामान ढोती औरतें, चाय की दुकानों पर बैठे ड्राइवर- सबके जीवन में नदी थी, लेकिन शायद उसी तरह जैसे घर की दीवार होती है: इतनी पुरानी और परिचित कि उसके बारे में रोज बात करने की जरूरत नहीं पड़ती। बाहर से आने वाला यात्री नदी में सौंदर्य देखता है; किनारे रहने वाला मनुष्य उसमें अपना जीवन देखता है। यही अंतर किसी भूगोल को पर्यटन से संस्कृति में बदलता है।
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एक छोटे-से बाजार में चाय पीते हुए मैंने सामने बैठे एक बुजुर्ग को काफी देर तक नदी की ओर देखते पाया। उन्होंने नदी के बारे में कोई बड़ी बात नहीं कही। उन्होंने बस इतना बताया कि पानी का मिजाज समझना पड़ता है। पहाड़ में पानी को केवल पानी समझना भूल है। उसके बढ़ने, घटने, रंग बदलने और आवाज बदलने के अपने संकेत होते हैं। वह बात मेरे भीतर बहुत देर तक रही। शहरों में हम मौसम की खबर मोबाइल पर देखते हैं; पहाड़ में मौसम अभी भी शरीर और भूगोल से पढ़ा जाता है।
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रास्ते में पुल आते रहे। हर पुल पर नदी कुछ क्षण के लिए नीचे चली जाती और मनुष्य ऊपर से उसे पार कर जाता। पुल मुझे हमेशा मनुष्य की एक विचित्र महत्वाकांक्षा लगे—हम उन चीजों के ऊपर से गुजरना चाहते हैं जिन्हें हम वास्तव में पार नहीं कर सकते। नदी को पार कर लेने के बाद भी नदी हमारे नीचे बहती रहती है। शायद इसी कारण पुलों पर खड़े होकर आदमी को अपने होने का आकार थोड़ा छोटा दिखाई देता है।
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जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ी, आस्था का भूगोल गहरा होता गया। मंदिरों के आसपास फूलों की दुकानें थीं, घाटों पर बैठे लोग थे, कहीं घंटियां थीं, कहीं मंत्र, कहीं चुप्पी। लेकिन अलकनंदा के किनारे आस्था भी केवल पूजा नहीं थी। वह स्मृति थी। कोई अपने मृत परिजन के लिए आया था, कोई किसी मनौती के लिए, कोई परंपरा निभाने, कोई केवल इसलिए क्योंकि उसके पिता भी यहां आए थे। नदी इन सब कारणों को एक साथ अपने भीतर जगह देती रही। शायद भारत में नदियों का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि वे धर्म को निजी विश्वास से निकालकर सामूहिक स्मृति बना देती हैं।
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एक शाम नदी के किनारे बैठा तो पहली बार मृत्यु का विचार यात्रा में इतनी स्पष्टता से आया। पानी सामने था और उसके पार पहाड़। कुछ दूरी पर अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही थी। जीवन और मृत्यु के बीच कोई पर्दा नहीं था। जिस नदी को थोड़ी देर पहले मैंने पहाड़ की सुंदरता के रूप में देखा था, वही अब किसी मनुष्य के जीवन की अंतिम स्मृति को अपने भीतर ले जाने वाली थी। उस क्षण नदी सुंदर नहीं लगी; वह गंभीर लगी। और शायद यहीं से यात्रा ने अपना असली अर्थ बदला।
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हम नदियों को अक्सर जीवन देने वाली कहते हैं, लेकिन वे मृत्यु को भी अपने साथ लेकर चलती हैं। खेतों को पानी देने वाला वही प्रवाह राख को भी दूर ले जाता है। घाट पर खड़ा मनुष्य अपने जीवन का अंत नदी को सौंपता है और नदी आगे बढ़ जाती है। उसे रुकना नहीं आता। शायद इसी में उसका सबसे कठोर और सबसे करुण दर्शन छिपा है—कुछ भी स्थायी नहीं, लेकिन कुछ भी पूरी तरह समाप्त भी नहीं।
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अलकनंदा के साथ चलते हुए विकास का दूसरा चेहरा भी सामने आया। पहाड़ों को काटती सड़कें, सुरंगें, मशीनें, निर्माणाधीन पुल और बिजली की परियोजनाएं नदी के पुराने भूगोल के बीच आधुनिक भारत की बेचैनी की तरह दिखाई देती रहीं। यह कहना आसान है कि पहाड़ को वैसा ही रहने देना चाहिए जैसा वह था, लेकिन पहाड़ में रहने वाले मनुष्य के लिए सड़क, बिजली, अस्पताल, शिक्षा और रोजगार किसी रोमानी विचार से कम महत्वपूर्ण नहीं। नदी के किनारे खड़े होकर विकास का विरोध या समर्थन करना आसान नहीं था; कठिन था यह समझना कि मनुष्य को आगे बढ़ने की जरूरत और प्रकृति को बचाए रखने की जरूरत—दोनों एक ही जीवन में मौजूद हैं।
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दिल्ली से निकलते समय मैं एक जगह की ओर जा रहा था। अलकनंदा के साथ कुछ दिन बिताने के बाद लौटते हुए महसूस हुआ कि मैं किसी जगह से नहीं, एक प्रवाह से होकर आया हूँ। दिल्ली की सीधी सड़कों से लेकर हिमालय की घुमावदार पगडंडियों तक, रास्ते ने मुझे धीरे-धीरे यह सिखाया कि मंजिल हमेशा यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं होती। कभी-कभी रास्ता ही वह जगह होता है जहां जीवन अपने असली रूप में दिखाई देता है—दुकान के बाहर बैठा आदमी, पुल पार करता बच्चा, घाट पर अकेला खड़ा कोई बूढ़ा, पहाड़ काटती मशीन, मंदिर की घंटी और उनके बीच लगातार बहता पानी।
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लौटते हुए अलकनंदा कई जगह पीछे छूट गई, लेकिन उसका न रहना भी उसकी मौजूदगी जैसा ही था। अब वह हर मोड़ पर दिखाई नहीं देती थी, फिर भी यात्रा उसके बिना नहीं थी। शायद यही किसी नदी के साथ चलने का अंतिम अर्थ है- एक समय के बाद नदी बाहर बहना बंद नहीं करती, बल्कि भीतर बहने लगती है।
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दिल्ली लौटकर शहर फिर वैसा ही था। वही ट्रैफिक, वही शोर, वही जल्दी। लेकिन मुझे लगा कि मेरे भीतर कोई आवाज अब इस शोर के ठीक नीचे लगातार चल रही है। वह अलकनंदा की आवाज थी या यात्रा की- मैं तय नहीं कर पाया। बस इतना समझ आया कि मैं दिल्ली से पहाड़ गया था, लेकिन पहाड़ से लौटते हुए अपने साथ कोई दृश्य नहीं लाया। मैं अपने साथ एक प्रवाह लेकर लौटा था। और तब पहली बार लगा- शायद यात्रा किसी नदी तक पहुंचना नहीं होती; किसी नदी को अपने भीतर जगह दे देना होती है।
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