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यात्रा वृतांत : अमरनाथ, जहां यात्रा बन जाती तीर्थ

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
यात्रा वृतांत
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कुछ यात्राएं कैलेंडर में तय नहीं होतीं। वे भीतर बहुत पहले आरम्भ हो चुकी होती हैं ; जिस दिन हम घर से निकलते हैं, उस दिन केवल उनके दृश्य आरम्भ होते हैं। अमरनाथ की मेरी यात्रा भी शायद उसी दिन शुरू नहीं हुई थी, जब मैंने श्रीनगर की उड़ान पकड़ी। वह तो बहुत पहले किसी अनाम आकांक्षा की तरह मन में जन्म ले चुकी थी। वर्षों से हिमालय को दूर से देखने वाला मन एक दिन उसकी निस्तब्धता के भीतर प्रवेश करना चाहता था। महादेव केवल उस आकांक्षा का नाम भर थे; असली आकर्षण उस मार्ग का था, जिसके बारे में सुन रखा था कि वहां पहुंचकर पहाड़ भी बोलते नहीं, केवल सुनते हैं।

श्रीनगर से पहलगाम की ओर निकलते ही शहर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा। सड़क जैसे-जैसे दक्षिण-पूर्व की ओर मुड़ी, घाटी का रंग बदलता गया। चिनारों की लंबी कतारें, अखरोट के वृक्ष, कहीं दूर धूप में चमकते धान के खेत और उनके पार धुंधली पड़ती पर्वत-श्रृंखलाएं- सब कुछ एक ऐसे विस्तार में खुल रहा था, जहां प्रकृति अपनी सुंदरता का प्रदर्शन नहीं करती, उसे सहज रूप से जीती है। तभी एक मोड़ पर लिद्दर नदी पहली बार दिखाई दी। वह किसी उन्मुक्त बालिका की तरह चट्टानों से टकराती हुई बह रही थी। कुछ दूर तक सड़क उसके साथ-साथ चलती रही। उस क्षण लगा, जैसे यात्रा को एक सहयात्री मिल गया हो। आगे के कई घंटे वह नदी कभी मेरे साथ चलती, कभी देवदारों की ओट में खो जाती और अगले ही मोड़ पर फिर मुस्कराती हुई सामने आ खड़ी होती।

पहलगाम पहुंचते-पहुंचते सांझ उतरने लगी थी। पहाड़ों की चोटियों पर ठहरी हुई अंतिम धूप धीरे-धीरे राख में बदलती अग्नि की तरह बुझ रही थी। बाज़ार में यात्रियों की चहल-पहल थी, घोड़ों की टापें थीं, दुकानों से उठती कश्मीरी कहवा की सुगंध थी और उन सबके बीच लिद्दर का अविराम स्वर, जो मानो इस पूरी घाटी की धड़कन हो। मैं होटल पहुंचने की जल्दी में नहीं था।

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सामान गाड़ी में ही छोड़कर नदी के किनारे चला आया। पानी इतना निर्मल था कि उसमें झुककर अपना चेहरा देखने का मन नहीं हुआ; लगा, कहीं इस पारदर्शिता पर अपनी उपस्थिति का बोझ न डाल दूं। सामने देवदारों की लंबी पंक्तियाँ थीं। उनकी स्थिरता में सदियों का धैर्य था और नदी की चंचलता में जीवन का अनवरत प्रवाह। शायद इसी संगति का नाम हिमालय है- जहां स्थिरता और गति एक-दूसरे का विरोध नहीं, बल्कि विस्तार बन जाती हैं।

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रात गहराने लगी तो घाटी का स्वर भी बदल गया। दिन का कोलाहल जैसे किसी ने धीरे से समेट लिया हो। दूर कहीं मंदिर की घंटी बजी, फिर सब कुछ मौन में विलीन हो गया। उस मौन में बैठा मैं बार-बार यही सोचता रहा कि तीर्थ केवल वह स्थान नहीं होता, जहां देवता निवास करते हैं; तीर्थ वह भी होता है, जहां पहुंचकर मनुष्य अपने भीतर के अनावश्यक शोर को पीछे छोड़ देता है। पहलगाम ने मुझसे अभी तक कुछ कहा नहीं था, फिर भी उसने मेरी यात्रा का पहला पाठ पढ़ा दिया था- महादेव तक पहुंचने की जल्दी मत करो ; उनके प्रदेश को पहले अपने भीतर उतरने दो।

सुबह की पहली किरण के साथ मैं बेताब घाटी की ओर निकल पड़ा। रात की हल्की नमी अब भी घास की पत्तियों पर मोतियों की तरह ठहरी हुई थी। पहाड़ों की ढलानों पर धूप धीरे-धीरे उतर रही थी और लिद्दर का जल उस सुनहरी आभा को अपने साथ बहाए लिए जा रहा था। रास्ते में गूजरों के छोटे-छोटे डेरे दिखाई दिए। कुछ बच्चे भेड़ों के पीछे दौड़ रहे थे, कुछ स्त्रियां लकड़ी के चूल्हों पर सुबह का भोजन बना रही थीं।

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यात्राएं तभी जीवित होती हैं, जब उनमें केवल दृश्य नहीं, मनुष्य भी शामिल हों। इन्हीं चेहरों के बीच से गुजरते हुए पहली बार लगा कि अमरनाथ का मार्ग केवल श्रद्धालुओं का रास्ता नहीं, पीढ़ियों से जीवन जीते लोगों का भी रास्ता है; उनकी सांसें, उनके श्रम और उनकी मुस्कानें भी इस तीर्थ का उतना ही हिस्सा हैं, जितनी आगे कहीं बर्फ की वह पवित्र गुफा।

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बेताब घाटी से लौटते हुए मुझे बार-बार यही अनुभूति होती रही कि प्रकृति अपनी सबसे बड़ी व्याख्या मौन में लिखती है। मनुष्य उसके अर्थ खोजने में जीवन लगा देता है, जबकि वह स्वयं किसी अर्थ की आकांक्षी नहीं होती। शायद यही कारण है कि पहाड़ों के बीच कुछ दूर चल लेने के बाद शब्द अनावश्यक लगने लगते हैं। रास्ता आरू घाटी की ओर मुड़ा तो घाटी का स्वभाव भी बदल गया।

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यहां सौंदर्य अधिक आत्मीय था। देवदारों की सघन छाया के बीच बिखरे लकड़ी के घर, ढलानों पर चरते भेड़ों के झुंड, दूर कहीं उठता धुएं का पतला-सा स्तंभ और उन सबके बीच अपने सहज क्रम में चलता जीवन- यह दृश्य किसी पर्यटक के कैमरे के लिए नहीं, बल्कि समय की स्मृति के लिए बना हुआ प्रतीत होता था। एक वृद्ध चरवाहे से थोड़ी देर बातचीत हुई। उसने मुस्कराकर केवल इतना कहा- ‘पहाड़ पर जल्दी मत चलना, पहाड़ जल्दी चलने वालों को पसंद नहीं करते’। उस सहज वाक्य में हिमालय का पूरा दर्शन समाया हुआ था। वहां गति नहीं, लय महत्त्वपूर्ण है।

चंदनवाड़ी पहुंचते ही यात्रा का स्वर एक बार फिर बदल गया। यहां से आगे श्रद्धा और साहस साथ-साथ चलते हैं। रंग-बिरंगे रेनकोट पहने यात्री, कंधों पर सामान ढोते पोनीवाले, ‘बम-बम भोले…’ के गगनभेदी उद्घोष, सेना के सतर्क जवान और उनके बीच बहती लिद्दर- सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जहां आस्था किसी व्यक्तिगत अनुभूति से निकलकर सामूहिक ऊर्जा बन जाती है। यहीं से पैदल यात्रा का वास्तविक आरम्भ हुआ। ऊंचाई बढ़ती गई, सांसें छोटी होती गईं, लेकिन भीतर एक विचित्र शांति उतरती चली गई।

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शेषनाग की नीलाभ झील, पंचतरणी की हिमशीतल धाराएं और अंततः वह क्षण, जब बर्फ की गुफा सामने थी- इन सबका वर्णन शब्दों से अधिक मौन के योग्य है। वहां पहुंचकर मैंने कुछ मांगा नहीं। मन में केवल इतना भाव था कि जीवन में कुछ स्थान ऐसे भी रहने चाहिए, जहां मनुष्य अपनी इच्छाओं का नहीं, अपनी सीमाओं का स्मरण करे। हिम से निर्मित शिवलिंग के सामने खड़े होकर पहली बार लगा कि अनश्वरता का अर्थ अमर होना नहीं, बल्कि हर क्षण बदलते हुए भी अपने सत्य को अक्षुण्ण बनाए रखना है।

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वापसी के लिए मैंने बालटाल का मार्ग चुना। यह रास्ता अधिक दुर्गम अवश्य है, पर हिमालय की दूसरी प्रकृति से परिचित कराता है। जहां पहलगाम का मार्ग आपको धीरे-धीरे अपने भीतर उतारता है, वहीं बालटाल का मार्ग अपने विराट विस्तार से एक साथ अभिभूत कर देता है। कुछ ही देर बाद सामने सोनमर्ग की स्वर्णाभ घाटी खुली। सांझ की ढलती धूप घास के विस्तृत मैदानों पर इस तरह बिखरी हुई थी कि समझ में आया, इसे ‘सोनमर्ग’- स्वर्णभूमि— क्यों कहा गया।

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दूर थाजीवास हिमनद की श्वेत आभा, सिंध नदी का तीव्र प्रवाह और हवा में घुली देवदार की गंध ने यात्रा के अंतिम पड़ाव को किसी उपसंहार की बजाय नई भूमिका बना दिया। तभी मन में एक विचार अनायास उभरा- अमरनाथ यात्रा केवल उस गुफा तक पहुंचकर पूरी नहीं होती। यदि पहलगाम उसकी विनम्र प्रस्तावना है, तो सोनमर्ग उसका दीर्घ प्रतिध्वनि-गीत है। एक आपको श्रद्धा तक ले जाता है, दूसरा उस श्रद्धा को जीवन में लौटाकर जीना सिखाता है।

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जब लौटने के लिए गाड़ी ने घाटी से बाहर की सड़क पकड़ी, तब महसूस हुआ कि पीछे केवल पहाड़ नहीं छूट रहे थे। कुछ ऐसा भी वहीं रह गया था, जिसे शब्दों में बांधना संभव नहीं। और शायद कुछ ऐसा मेरे साथ भी लौट रहा था, जिसे कोई देख नहीं सकता था। यही हर सच्ची यात्रा का सबसे बड़ा प्रतिफल है।

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वह हमें नए स्थानों से कम, अपने नए स्वरूप से अधिक परिचित कराती है। अमरनाथ से लौटकर मैंने यही जाना कि तीर्थ किसी देवस्थान तक पहुंचने का नाम नहीं है; तीर्थ वह है, जहां से लौटने के बाद मनुष्य पहले जैसा नहीं रहता। पहलगाम से सोनमर्ग तक फैली यह पूरी घाटी उसी परिवर्तन की मौन साक्षी है।

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