
Jamshedpur : झारखंड के शैक्षणिक गलियारों को झकझोर देने वाले एक सनसनीखेज घटनाक्रम में, जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय (JWU) प्रशासन ने डॉ. विश्वराज लाल को आधिकारिक तौर पर जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) विभाग का नया अध्यक्ष (HoD) नियुक्त कर दिया है। विश्वविद्यालय की प्रभारी कुलसचिव (Registrar I/c) डॉ. सलोमी कुजूर ने 14 जुलाई 2026 को इस संबंध अधिसूचना (No. JWU/R/2026/476) जारी कर दी है। JSU के नए अधिनियम-2026 के तहत डॉ विश्वराज लाल को तीन साल के लिए इस पद पर नियुक्त किया गया है।
गौरतलब है कि डॉ. विश्वराज लाल पर लोकभवन और उपायुक्त कार्यालय के आदेश से चल रहे “पास-फेल घोटाले” और गंभीर “पैसे के बदले नंबर” (Money for Marks) मामले की जाँच की रिपोर्ट THE PHOTON NEWS के पत्रकार ने दिसंबर, 2025 में प्रकाशित की थी। इस पूरे मामले में डॉ. विश्वराज लाल के साथ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रभारी कुलसचिव राजेंद्र कुमार जायसवाल का नाम भी मुख्य सूत्रधार के रूप में शामिल था।
डॉ. विश्वराज लाल पर हैं गंभीर आरोप
पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त कार्यालय (पत्रांक- 1921/गो, दिनांक 02/12/2025) द्वारा जारी आधिकारिक आदेश और छात्रों के शिकायती पत्र के अनुसार, डॉ. विश्वराज पर लगे संगीन आरोप यह हैं:
* निजी ट्यूशन लेने के लिए छात्रों पर दबाव बनाने का आरोप।
* ट्यूशन नहीं लेने पर कम अंक देने अथवा अनुत्तीर्ण करने की धमकी देने का आरोप।
* परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रक्रिया में अनियमितता और “पैसों के बदले अंक” देने संबंधी आरोप।
* विश्वविद्यालय में नियमित शैक्षणिक गतिविधियों के संचालन में लापरवाही के आरोप।
* विभाग की अन्य शिक्षिकाओं के विरुद्ध छात्रों से शिकायतें करवाने का आरोप।
* छात्राओं के साथ अनुचित एवं अमर्यादित व्यवहार संबंधी शिकायतें।
इन आरोपों का उल्लेख शिकायत पत्रों में किया गया था। उपलब्ध दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट नहीं है कि इन आरोपों पर किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अंतिम रूप से दोष सिद्ध किया गया हो। इन आरोपों पर जांच शुरू हुई थी पर अंतिम जांच रिपोर्ट अब तक जारी नहीं की गई है।
जांच का परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं?
उपलब्ध अभिलेखों से यह संकेत मिलता है कि शिकायतों के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर जांच की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी। हालांकि, अब तक ऐसी कोई सार्वजनिक रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि जांच का अंतिम निष्कर्ष क्या रहा, आरोप सही पाए गए या नहीं, अथवा संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। यही कारण है कि विभागाध्यक्ष की नियुक्ति के बाद कई प्रश्न फिर से उठने लगे हैं।
HoD नियुक्त से पहले क्या हुई थी पर्याप्त जांच?
विश्वविद्यालय द्वारा जारी HoD नियुक्ति अधिसूचना में यह उल्लेख नहीं है कि नियुक्ति से पूर्व शिकायतों एवं जांच की स्थिति का परीक्षण किया गया था या नहीं। यदि जांच लंबित है, तो क्या उसकी स्थिति पर विचार किया गया? यदि जांच पूरी हो चुकी थी, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर विश्वविद्यालय प्रशासन को देना है।
अधिकारियों के नाम का खौफ और प्रशासनिक मौन
छात्रों ने अपनी शिकायत में यह भी उल्लेख किया था कि आरोपी शिक्षक खुद को कानून से ऊपर दिखाने के लिए यह अफवाह उड़ाते थे कि वसूले गए पैसों का एक हिस्सा विश्वविद्यालय के बड़े अधिकारियों तक जाता है। हालांकि छात्रों ने इसे उसकी डराने की चाल बताया था, लेकिन जिस तरह से पूर्व में एक उच्चस्तरीय समिति बनाकर जांच की गई और उसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। वह जांच समिति भी वर्तमान प्रभारी कुलसचिव के कार्यकाल में ही बनाई गई थी, और अब सब कुछ जानते हुए भी यह नई अधिसूचना जारी कर डॉ. विश्वराज लाल को HoD बना दिया गया है। शिक्षा जगत में यह अटकलें तेज हैं कि इस पूरे मामले के पीछे पूर्व पदाधिकारी की धाक और विश्वविद्यालय पर उनकी मजबूत पकड़ काम कर रही है। चर्चा यह भी है कि वर्तमान प्रभारी कुलसचिव एवं तत्कालीन कुलपति से उनके संबंध काफी प्रगाढ़ थे, जिसके कारण पूर्व की जांच रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
काबिल शिक्षकों को किया गया दरकिनार, आरोपी को कमान क्यों?
विश्वविद्यालय सूत्रों के अनुसार, डॉ. कुमारी श्वेता और डॉ. ममता कुमारी भी इसी विभाग की शिक्षिकाएं हैं। छात्रों के मुताबिक, डॉ. कुमारी श्वेता विभाग में सबसे योग्य और अनुभवी हैं। उन्होंने अपनी काबिलियत और ईमानदारी के बल पर विश्वविद्यालय की कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक समितियों में अपनी जगह बनाई है। इसके बावजूद, विभाग में बेदाग छवि वाले और योग्य शिक्षक मौजूद होने के बाद भी एक आरोपी शिक्षक को विभाग की कमान सौंप दी गई है। यह कदम विश्वविद्यालय प्रशासन की आंखें मूंदने की नीति को दर्शाता है या फिर भ्रष्टाचार को दी जा रही खुली शह को?
नहीं बरती गई पारदर्शिता
शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि किसी भी विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष का पद केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि शैक्षणिक नेतृत्व का भी प्रतीक होता है। इसलिए यदि किसी अधिकारी या शिक्षक के संबंध में गंभीर शिकायतें सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा रही हों, तो नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता बरतनी पड़ती है।
अब विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—
1. क्या शिकायतों की जांच पूरी हो चुकी है?
2. यदि हाँ, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
3. यदि नहीं, तो जांच लंबित रहते हुए विभागाध्यक्ष की नियुक्ति किन आधारों पर की गई?
4. क्या HoD नियुक्ति प्रक्रिया में शिकायतों और उपलब्ध अभिलेखों पर विचार किया गया?
इन सवालों के जवाब आने तक यह HoD नियुक्ति विश्वविद्यालय परिसर में चर्चा और बहस का विषय बनी रहने की संभावना है।
जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय की साख दांव पर
मेमो नंबर JWU/R/2026/476 के जरिए कुलपति (Vice Chancellor) की अंतिम स्वीकृति के बाद जारी इस अधिसूचना ने छात्रों और अभिभावकों के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। जो विश्वविद्यालय मंचों से ‘महिला सशक्तिकरण’ का दम भरता है, उसी ने एक ऐसे व्यक्ति को विभागाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया है जो खुद छात्राओं के शोषण और शैक्षणिक जालसाजी के गंभीर आरोपों से घिरा हुआ है। इस फैसले के बाद अब जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय की साख और गरिमा पूरी तरह दांव पर लग गई है ।
कोट
इस संबंध में हमें डाक्यूमेंट्री एवीडेंस उपलब्ध कराएं। हम इस मामले की जांच कराएंगे और आवश्यक कार्रवाई करेंगे।
इला कुमार, वीसी जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय

