
दिल्ली से निकलते हुए हमेशा लगता है कि शहर पीछे छूट रहा है, लेकिन कुछ घंटे बाद समझ आता है कि शहर इतनी आसानी से पीछे नहीं छूटता। वह सड़क के किनारे लगे विज्ञापनों में, मोबाइल की स्क्रीन पर चमकती सूचनाओं में और हमारे भीतर चलती उस जल्दबाजी में बैठा रहता है, जिससे हम कहीं पहुँचने के लिए यात्रा करते हैं। पहाड़ों की तरफ जाते हुए मेरी कोशिश इस बार केवल दिल्ली से दूर जाने की नहीं थी। मैं अपने भीतर बसे उस शोर से भी दूर जाना चाहता था, जिसे शहर ने धीरे-धीरे मेरी आदत बना दिया था।
Read Also-यात्रा वृतांत : इतिहास, शौर्य व समय की धड़कन
पिन वैली की यात्रा दिल्ली से शुरू हुई थी। सुबह की धुंध और जागते हुए शहर के बीच जब बस ने दिल्ली को पीछे छोड़ना शुरू किया, तब खिड़की के बाहर बदलता हुआ भूगोल किसी धीमी फिल्म की तरह सामने आने लगा। मैदान खत्म हुए, रास्ते चढ़ने लगे और हवा में वह ठंड घुलने लगी, जिसे केवल तापमान से नहीं समझा जा सकता। पहाड़ों में प्रवेश करते ही सड़कें मोड़ लेने लगती हैं और शायद तभी मन भी अपने पुराने रास्तों से थोड़ा मुड़ना शुरू करता है।

शिमला और फिर आगे का रास्ता पार करते हुए जब यात्रा किन्नौर की ओर बढ़ी, तो हिमालय का चेहरा बदलता गया। कहीं देवदारों की गहरी हरियाली थी, कहीं चट्टानों के बीच बहती सतलुज और कहीं पहाड़ों की ऐसी सूखी देह, जिस पर हरियाली बहुत कम थी। मुझे हमेशा लगता रहा है कि हिमालय को केवल बर्फ से पहचानना, उसके साथ अन्याय है। उसका असली वैभव उसकी विविधता में है- एक ही पर्वत-श्रृंखला में जंगल भी हैं, रेगिस्तान भी और ऐसी घाटियाँ भी, जहाँ हवा तक किसी प्राचीन भाषा में बोलती हुई लगती है।
Read Also- यात्रा वृतांत : जलियांवाला बाग : यहां मिट्टी सुनाती इतिहास
रिकांगपिओ से आगे बढ़ते हुए सड़क और अधिक कठिन होती गई। स्पीति की तरफ जाने वाले रास्तों में एक समय ऐसा आता है, जब सड़क और पहाड़ के बीच संबंध लगभग निजी हो जाता है। नीचे नदी बहुत दूर दिखाई देती है और ऊपर चट्टानें इतनी निकट लगती हैं कि लगता है, बस हाथ बढ़ाकर उन्हें छुआ जा सकता है। हर मोड़ पर एक नया दृश्य खुलता और पिछले दृश्य को ऐसे मिटा देता, जैसे पहाड़ स्मृतियों को जमा नहीं होने देते।
Read Also- यात्रा वृतांत : स्मृतियों में बसा गुशैणी गांव
काज़ा की ओर बढ़ते हुए रास्ते में दुनिया धीरे-धीरे विरल होती गई। पेड़ कम होते गए, घर दूर-दूर दिखाई देने लगे और आकाश पहले से कहीं अधिक बड़ा। फिर पिन नदी की तरफ मुड़ते ही लगा कि हम हिमालय के भीतर किसी ऐसे हिस्से में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ समय ने अपनी गति थोड़ी धीमी कर दी है।
Read Also-यात्रा वृतांत : स्मृतियों में बस गई नागालैंड की दजुकू वैली
पिन वैली पहली नजर में खूबसूरत नहीं लगती। उसकी खूबसूरती किसी पोस्टकार्ड की तरह सामने नहीं आती। यहाँ पहाड़ों के रंग मिट्टी, धूसर, बैंगनी और भूरे हैं। उनके बीच कहीं-कहीं बर्फ की सफेद धारियाँ हैं और नीचे पिन नदी अपनी पतली-सी चमक के साथ घाटी को काटती हुई बहती है। पहली नजर में यह भू-दृश्य कठोर लगता है। लेकिन कुछ देर उसे देखते रहने पर उसकी कठोरता में एक गहरी कोमलता दिखाई देने लगती है। शायद यही पिन वैली की सबसे बड़ी खूबी है- वह आपको प्रभावित करने की कोशिश नहीं करती। वह बस अपने होने में मौजूद रहती है।
Read Also-यात्रा वृतांत : अमरनाथ, जहां यात्रा बन जाती तीर्थ
मुद गाँव की ओर जाते हुए रास्ते पर हवा तेज थी। ऊँचाई बढ़ने के साथ साँसों का अपना एक हिसाब होने लगा था। वहाँ चलना केवल पैरों का काम नहीं रह जाता। शरीर को हर कदम पर पहाड़ से बातचीत करनी पड़ती है। कुछ दूरी चलने के बाद रुकना पड़ता, पीछे मुड़कर घाटी को देखना पड़ता और फिर महसूस होता कि जिस दूरी को हमने कुछ मिनटों में पार किया है, वह वास्तव में कितनी बड़ी थी। मुद गाँव के पास पहुँचते-पहुँचते शाम उतर रही थी। पहाड़ों की ढलानों पर पड़ती धूप धीरे-धीरे खिसक रही थी। घरों की खिड़कियों से निकलती रोशनी दूर से किसी छोटे-से संसार का संकेत देती थी। शहर में शाम का अर्थ रोशनियों का बढ़ जाना है; यहाँ शाम का अर्थ रोशनियों का कम होते जाना था। और उस अंधेरे में मुझे पहली बार लगा कि शायद हम रोशनी के आदी होकर अंधेरे से डरने लगे हैं।
Read ALso- यात्रा वृतांत : नीलगिरि की वादियों में बिताए कुछ खूबसूरत पल
गाँव के लोगों से मिलना इस यात्रा का सबसे शांत हिस्सा था। उनकी जिंदगी में वह अतिरिक्त प्रदर्शन नहीं था, जो शहर में अक्सर हमारे हर व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। बातचीत छोटी थी, लेकिन उसके भीतर एक अपनापन था। पहाड़ों में लोग शब्दों को शायद इसलिए बचाकर इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि यहाँ जीवन स्वयं बहुत कुछ कह देता है।
Read Also- यात्रा वृतांत : स्मृतियों में बसा गुशैणी गांव
सुबह जब गाँव के ऊपर की ढलानों पर रोशनी उतरी, तो पिन वैली बिल्कुल अलग दिखाई दी। रात का कठोर अंधेरा हट चुका था और पहाड़ों पर सूरज की पहली किरणें किसी चित्रकार की पतली कूची की तरह फैल रही थीं। दूर बर्फ से ढकी चोटियाँ चमक रही थीं। सामने घाटी थी और उसके पार एक ऐसी विशाल शांति, जिसे कैमरे में कैद करना लगभग असंभव था।
Read ALso- यात्रा वृतांत : नीलगिरि की वादियों में बिताए कुछ खूबसूरत पल
मैं काफी देर तक वहीं बैठा रहा। यात्राओं में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जिन्हें हम तस्वीरों में नहीं रख पाते। वे केवल भीतर जमा होते हैं। बाद में वर्षों बाद अचानक किसी सुबह, किसी गंध या किसी हवा के झोंके के साथ लौट आते हैं। पिन वैली की वह सुबह मेरे लिए शायद ऐसा ही एक क्षण थी। वहाँ बैठकर मुझे नदी के बारे में सोचने का अवसर मिला। पिन नदी किसी बड़े शहर की नदी की तरह अपना परिचय नहीं देती। वह चुपचाप बहती है। उसे मालूम है कि उसे कहाँ जाना है, लेकिन वह कहीं पहुँचने की जल्दी में नहीं है। शायद यात्राएँ भी हमें यही सिखाती हैं।
Read Also-यात्रा वृतांत : अमरनाथ, जहां यात्रा बन जाती तीर्थ
हम जीवन भर पहुँचने की जल्दी में रहते हैं- किसी शहर तक, किसी नौकरी तक, किसी रिश्ते तक, किसी सफलता तक। और फिर एक दिन समझ आता है कि रास्ते में जो कुछ छूट गया, वही शायद सबसे महत्वपूर्ण था। पिन वैली में पहाड़ों के बीच चलते हुए मुझे पहली बार यह भी लगा कि यात्रा का अर्थ हमेशा नई जगह देखना नहीं होता। कभी-कभी यात्रा उस पुराने आदमी को पीछे छोड़ना भी होती है, जो घर से निकलते समय हमारे साथ आया था। वापसी के रास्ते में घाटी पीछे छूट रही थी। वही चट्टानें थीं, वही नदी थी, वही मोड़ थे। लेकिन अब उन्हें देखने वाली आँखें बदल चुकी थीं। शायद जगहें कभी नहीं बदलतीं; बदलते हम हैं और फिर हमें लगता है कि जगह बदल गई।
Read Also-यात्रा वृतांत : हिमाचल का गांव, जहां पहाड़ साझा करते मौन
काज़ा की ओर लौटते हुए मैंने आखिरी बार पीछे मुड़कर पिन वैली को देखा। दूर पहाड़ों के बीच नदी की एक पतली रेखा दिखाई दे रही थी। उस क्षण मुझे लगा कि हिमालय की असली शक्ति उसकी ऊँचाई में नहीं, उसकी चुप्पी में है। वह हमें कुछ कहता नहीं। बस हमारे भीतर इतना खाली स्थान बना देता है कि हम पहली बार अपनी आवाज सुन सकें। दिल्ली लौटते हुए सड़कें फिर सीधी होने लगीं। गाड़ियाँ बढ़ गईं। मोबाइल पर संदेश आने लगे। ट्रैफिक का शोर फिर आसपास फैलने लगा। शहर वही था, जिससे मैं कुछ दिन पहले निकला था। लेकिन मैं वही नहीं था।
Read Also-यात्रा वृतांत : कोल्ली हिल्स : पहाड़ सिखाते संस्कृति का नया अर्थ
पिन वैली से मैं कोई स्मृति-चिह्न लेकर नहीं लौटा था। न कोई दुर्लभ पत्थर, न कोई विशेष वस्तु। बस पहाड़ों की एक चुप्पी भीतर रह गई थी। और शायद यात्राओं में बचाकर लाने के लिए इससे बेहतर चीज कोई नहीं होती। क्योंकि जगहें अंततः पीछे छूट जाती हैं। रास्ते भी। लेकिन किसी दूर घाटी में बिताई गई एक सुबह, किसी नदी की आवाज और किसी पहाड़ के सामने खड़े होकर महसूस किया गया अपना छोटापन- ये चीजें हमारे भीतर बहुत लंबे समय तक चलती रहती हैं। पिन वैली से लौटकर मुझे यही समझ आया कि कुछ यात्राएँ हमें किसी जगह तक नहीं ले जातीं।
वे हमें हमसे थोड़ी दूर ले जाकर फिर हमारे ही भीतर वापस छोड़ देती हैं।
Read Also- यात्रा वृतांत : मियार वैली : दिल में उतरने वाली यात्रा

