रांची : मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम और उनके पूर्व आप्त सचिव संजीव लाल बुधवार को बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा होटवार से रिहा हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद मंगलवार को आदेश अपलोड नहीं होने के कारण दोनों जेल से बाहर नहीं आ सके थे। अब आदेश की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।
सूत्रों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत आदेश अपलोड होने के बाद दोनों की ओर से बंध पत्र दाखिल किया जाएगा। इसके बाद जेल प्रशासन आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी कर रिहाई सुनिश्चित करेगा। आलमगीर आलम और संजीव लाल पिछले करीब 23 महीने से न्यायिक हिरासत में थे।
सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत
जानकारी के अनुसार, विशेष अदालत और हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों आरोपितों ने 25 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी। इस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने सोमवार को दोनों को नियमित जमानत प्रदान कर दी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से हिरासत में रहने और मामले की सुनवाई की स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह राहत दी है। हालांकि मामले की जांच और सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।
मई 2024 की ED छापेमारी से सामने आया मामला
यह मामला मई 2024 में उस समय चर्चा में आया था जब ईडी ने रांची समेत कई ठिकानों पर बड़ी छापेमारी की थी। जांच एजेंसी की कार्रवाई के दौरान जहांगीर आलम के आवास से करीब 32.2 करोड़ रुपये नकद बरामद किए गए थे।
इसके अलावा संजीव लाल के घर और कार्यालय से भी लाखों रुपये नकद और कथित तौर पर एक संदिग्ध डायरी मिलने की बात सामने आई थी। इस कार्रवाई के बाद पूरे राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो गई थी और मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया था।
सरकारी टेंडर कमीशन से जुड़ा है मामला
ईडी के अनुसार, यह मामला सरकारी टेंडरों में कथित कमीशन वसूली से जुड़ा हुआ है। जांच एजेंसी का दावा है कि ठेकेदारों से परियोजना लागत का लगभग 3 प्रतिशत तक कमीशन लिया जाता था। ईडी के मुताबिक, इस कथित वसूली का बड़ा हिस्सा संजीव लाल के माध्यम से तत्कालीन मंत्री आलमगीर आलम तक पहुंचता था। जबकि शेष राशि विभागीय अधिकारियों और इंजीनियरों के बीच बांटे जाने का आरोप है। हालांकि आरोपियों की ओर से इन आरोपों को लेकर पहले भी सफाई दी जाती रही है।

