Jamshedpur : दलमा वन्यजीव अभ्यारण्य के जंगलों में एक बार फिर पारंपरिक सेंदरा (शिकार) पर्व की गूंज सुनाई देने वाली है। इस बार यह आयोजन जहां सांस्कृतिक उत्साह का प्रतीक बन रहा है, वहीं वन विभाग और आदिवासी समाज के बीच टकराव की स्थिति भी पैदा हो गई है।
भव्य आयोजन की तैयारी
दलमा बुरू सेंदरा समिति ने इस साल के पर्व को ऐतिहासिक बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। झारखंड के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार से बड़ी संख्या में सेंदरा बीर (शिकारी) शामिल होंगे।
दलमा राजा राकेश हेम्ब्रम ने बताया कि “गिरा सिकम” (निमंत्रण पत्र) बांटे जा रहे हैं और मुख्यमंत्री, स्थानीय जनप्रतिनिधियों समेत आदिवासी समाज के प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया गया है।
तीन दिन का कार्यक्रम तय
- 25 अप्रैल: फदलोगोड़ा पूजा स्थल की सफाई और देवी-देवताओं का आह्वान
- 26 अप्रैल: बोंगा बुरू की पूजा और पारंपरिक बलि
- 27 अप्रैल: सेंदरा बीर जंगल में शिकार के लिए प्रस्थान
वन विभाग बनाम परंपरा
इस बार विवाद की मुख्य वजह वन विभाग की सख्ती है। विभाग ने साफ निर्देश दिया है कि किसी भी प्रकार का शिकार गैरकानूनी है और उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही लोगों से अपील की गई है कि वे पर्व को घरों में ही मनाएं।
दलमा राजा का दो टूक जवाब
वन विभाग के निर्देशों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए राकेश हेम्ब्रम ने स्पष्ट कहा कि—
“हम अपनी सदियों पुरानी परंपरा को हर हाल में निभाएंगे। पाबंदी को स्वीकार नहीं करेंगे।”
इस मुद्दे पर 20 अप्रैल को समिति की अहम बैठक भी बुलाई गई है, जिसमें डीएफओ और वन अधिकारियों के सामने विरोध दर्ज कराया जाएगा।
इतिहास और अधिकार का दावा
दलमा राजा का दावा है कि उनके पास 1340 ईस्वी के आसपास के दस्तावेज हैं, जो हेम्ब्रम परिवार के पारंपरिक अधिकार को दर्शाते हैं। उनके अनुसार, जंगल, जमीन और वन्यजीवों से जुड़ी यह परंपरा आदिवासी पहचान का अहम हिस्सा है, जिसे हर हाल में संरक्षित किया जाएगा।

