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Jharkhand News : देवघर कॉलेज में फर्जीवाड़े का खेल…ढाई साल तक गायब कर्मचारी के नाम पर उठाते रहे मानदेय, राजभवन की सख्ती के बाद कुलपति से जवाब-तलब

डेढ़ लाख रुपये के गबन में 2023 से लंबित है सख्त कार्रवाई, सिंडिकेट के बार-बार फैसले बदलने और आरोपी को पद देने पर उठे गंभीर सवाल

by Kanchan Kumar
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रांची : झारखंड के ​देवघर कॉलेज में वित्तीय घोटाले को दबाने और दोषियों को बचाने का खेल अब सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय (दुमका) के लिए गले की फांस बन गया है। लगभग तीन साल पहले उजागर हुए जैक फंड फर्जीवाड़े में कोई ठोस कार्रवाई न होने से राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार बेहद सख्त हो गए हैं। पूरे मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की ढिलाई और हीला-हवाली को देखते हुए राजभवन ने सीधा दखल दिया है और विश्वविद्यालय की कुलपति से जवाब मांगा है।

​यह पूरा विवाद देवघर कॉलेज के एक कर्मचारी बालेश्वर मांझी के मानदेय की अवैध निकासी से जुड़ा है। आरोप है कि यह कर्मचारी लगभग ढाई साल तक संस्थान से नदारद रहा, लेकिन उसके नाम पर कागजों में मानदेय बनता रहा और करीब डेढ़ लाख रुपये की रकम डकार ली गई। जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने फरवरी 2023 में कॉलेज परिसर में जोरदार धरना-प्रदर्शन किया, तब जाकर इस बड़े फर्जीवाड़े की परतें खुलीं। छात्रों का आरोप था कि तत्कालीन प्राचार्य डॉ. बसंत कुमार गुप्ता, बर्सर और लेखापाल ने मिलकर इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया।

​पैसों की भरपाई कर लीपापोती की कोशिश

​मामला सामने आने पर विश्वविद्यालय ने आरोपी प्राचार्य का तबादला बड़हरवा कॉलेज कर दिया। विवि प्रशासन का दलील यह रहा कि प्राचार्य ने गबन की गई पूरी राशि वापस जमा कर दी है । उनका ट्रांसफर भी हो चुका है, इसलिए मामला यहीं खत्म माना जाना चाहिए। हालांकि, राजभवन इससे बिल्कुल सहमत नहीं है। राजभवन का स्पष्ट कहना है कि 20 अप्रैल 2023 को ही विभागीय कार्रवाई का सख्त निर्देश दिया गया था, लेकिन विवि ने न तो किसी को दंडित किया और न ही कोई अंतिम रिपोर्ट भेजी।

​दो बार बदले फैसले, फिर भी आरोपी को मिला ईनाम

​विवाद तब और गहरा गया जब राजभवन को पता चला कि सिंडिकेट की बैठकों में लिए गए फैसलों को बार-बार बदला गया। 28 जून 2025 की सिंडिकेट बैठक में प्राचार्य और संबंधित कर्मियों को निलंबित करने और प्राथमिकी दर्ज कराने का सख्त निर्णय लिया गया था। लेकिन महज तीन महीने बाद, 26 सितंबर 2025 की बैठक में इस फैसले को पलटते हुए मामले की फिर से समीक्षा करने का ढुलमुल रुख अपना लिया गया। इतना ही नहीं, जिस प्राचार्य पर गबन के गंभीर आरोप थे, उन्हें बाद में विवि सिंडिकेट का सदस्य भी मनोनीत कर दिया गया।

​राजभवन के अवर सचिव द्वारा भेजे गए पत्र में साफ पूछा गया है कि आखिर किन परिस्थितियों और किस आधार पर पहले लिए गए फैसलों को बार-बार बदला गया। अब राजभवन की इस सीधी सख्ती के बाद विवि प्रशासन की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।

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