
फीचर डेस्क : गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा, प्रार्थना और व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, सुखकर्ता और सिद्धि-बुद्धि के दाता के रूप में पूजा जाता है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर श्रद्धालु घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति की स्थापना कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति तथा जीवन के विघ्न दूर होने की प्रार्थना करते हैं।
सनातन संस्था के ग्रंथ ‘श्री गणपति’ में गणेश चतुर्थी के व्रत, गणेशमूर्ति की स्थापना, दैनिक पूजा, उत्तरपूजा और विसर्जन से जुड़ी विभिन्न विधियों का उल्लेख किया गया है। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी से जुड़ी इन परंपराओं और पूजा-विधि के बारे में।
सिद्धिविनायक व्रत का क्या है महत्व?
गणेश चतुर्थी के व्रत को ‘सिद्धिविनायक व्रत’ भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की उपासना करने से साधक को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन के विघ्न दूर होने की कामना की जाती है।
यदि किसी परिवार में भाई एक साथ रहते हैं और उनका धन-कोष तथा रसोई साझा है, तो एक ही गणेशमूर्ति की स्थापना की जा सकती है। वहीं, यदि परिवार के सदस्यों की रसोई और धन-कोष अलग-अलग हैं, तो अलग-अलग घरों में गणेशमूर्ति की स्थापना करने की परंपरा बताई गई है।
हर साल नई गणेशमूर्ति क्यों स्थापित की जाती है?
सनातन संस्था की दी गई जानकारी के अनुसार गणेश चतुर्थी के अवसर पर हर वर्ष नई गणेशमूर्ति स्थापित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के समय भगवान गणेश से संबंधित तत्त्व अधिक सक्रिय रहता है और इसी कारण इस अवधि में गणेशमूर्ति की स्थापना एवं उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है।
मान्यता के अनुसार पुरानी मूर्ति में पुनः आवाहन करने के बजाय उत्सव के लिए नई मूर्ति स्थापित कर पूजा के बाद उसका विसर्जन किया जाना उचित माना गया है।
कैसी होनी चाहिए गणेशमूर्ति?
गणेश चतुर्थी के लिए गणेशमूर्ति के संबंध में भी कुछ धार्मिक परंपराएं बताई गई हैं। इनके अनुसार मूर्ति:
चिकनी मिट्टी से बनी हो।
प्लास्टर ऑफ पेरिस की न हो।
लगभग 1 से 1.5 फुट ऊंची हो।
पीढ़े पर विराजमान हो।
बाईं ओर सूंड वाली हो।
प्राकृतिक रंगों से रंगी हुई हो।
पर्यावरण की दृष्टि से भी मिट्टी की मूर्तियों को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इनके विसर्जन से जलस्रोतों पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है।
गणेश चतुर्थी पर स्थापना और विसर्जन की परंपरा
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मिट्टी के गणपति की प्राणप्रतिष्ठा और पूजा करने तथा उसी दिन विसर्जन करने की शास्त्रीय विधि का उल्लेख मिलता है। हालांकि, समय के साथ गणेशोत्सव को अधिक दिनों तक मनाने की परंपरा भी विकसित हुई।
कई परिवारों में गणपति को डेढ़, पांच, सात या दस दिनों तक विराजमान रखने की परंपरा है। कुछ स्थानों पर ज्येष्ठा गौरी के साथ गणपति का विसर्जन भी किया जाता है।
परंपरा के अनुसार गणपति का विसर्जन अलग-अलग परिवारों में पहले, दूसरे, तीसरे, छठे, सातवें अथवा दसवें दिन किया जा सकता है।
गणेशमूर्ति की स्थापना कैसे करें?
गणेशमूर्ति स्थापित करने के लिए पूजा की चौकी पर चावल रखकर उसके ऊपर मूर्ति स्थापित करने की परंपरा है। इसके बाद विधिपूर्वक गणेशजी का पूजन किया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा के दौरान मूर्ति के नीचे रखे चावल भी चैतन्य से परिपूर्ण हो जाते हैं और इन्हें बाद में प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है।
गणेशमूर्ति घर कैसे लाएं?
गणेशमूर्ति को गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले घर लाने की परंपरा को भी शुभ माना जाता है। परिवार के सदस्य श्रद्धापूर्वक गणपति की मूर्ति घर लाते हैं।
मूर्ति को स्वच्छ वस्त्र से ढककर लाने और रास्ते में ‘गणपति बाप्पा मोरया’ का जयघोष करने की परंपरा है। घर पहुंचने के बाद आरती करके गणेशमूर्ति को मंडप या पूजा स्थल पर ले जाया जाता है। मूर्ति की स्थापना के लिए सजाई गई चौकी पर अक्षत रखे जाते हैं और उसके बाद गणेशजी को विराजमान कराया जाता है।
किस दिशा में रखें गणेशमूर्ति?
दी गई धार्मिक परंपरा के अनुसार गणेशमूर्ति का मुख पश्चिम दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ माना गया है। यदि ऐसा संभव न हो तो पूजा करने वाले व्यक्ति की दिशा और पूजा स्थल की स्थिति का ध्यान रखना चाहिए। गणेशमूर्ति का मुख दक्षिण दिशा की ओर रखने से बचने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को उग्र देवताओं की दिशा माना जाता है।
गणेश चतुर्थी पर प्रतिदिन कैसे करें पूजा?
गणपति के घर में विराजमान रहने तक प्रतिदिन सुबह और शाम पूजा करने की परंपरा है। इस दौरान पंचोपचार पूजन किया जा सकता है। पूजन के बाद भगवान गणेश की आरती और मंत्रपुष्प का पाठ किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार गणेशजी को दूर्वा, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करते हैं।
क्या है उत्तरपूजा?
गणेशमूर्ति के विसर्जन से पहले उत्तरपूजा की जाती है। इसमें भगवान गणेश को चंदन, अक्षत, पुष्प, हल्दी-कुंकुम, दूर्वा, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है।
इसके बाद आरती और मंत्रपुष्पांजलि की जाती है। पूजा पूरी होने के बाद गणेशमूर्ति को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।
गणेशमूर्ति का विसर्जन कैसे करें?
गणेशमूर्ति के विसर्जन के समय श्रद्धालु भगवान गणेश को दही, पोहे, नारियल, मोदक आदि अर्पित करते हैं। विसर्जन स्थल पर आरती करने के बाद श्रद्धापूर्वक गणेशमूर्ति का विसर्जन किया जाता है। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन के निर्देशों और निर्धारित विसर्जन स्थलों का पालन करना भी जरूरी है।

