
रांची: पति के कथित दुर्व्यवहार और प्रताड़ना से परेशान होकर बच्चों के साथ वैवाहिक घर छोड़ने वाली महिला के फैसले को स्वतः स्वेच्छा से परित्याग नहीं माना जा सकता। झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए जमशेदपुर फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी ने यदि कथित मारपीट और क्रूरता को लेकर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है, तो सिर्फ इस आधार पर उसकी गवाही को अविश्वसनीय नहीं ठहराया जा सकता। मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन करना जरूरी है।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने महिला की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। महिला ने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत तलाक की मांग की थी, लेकिन जमशेदपुर की फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने क्रूरता के आरोपों पर विचार करते समय प्राथमिकी दर्ज नहीं होने को महत्वपूर्ण आधार बनाया था। खंडपीठ ने इस दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्ण माना और फैमिली कोर्ट का फैसला तथा उससे संबंधित डिक्री रद्द कर दी। महिला की ओर से अधिवक्ता प्रभाष कुमार और अधिवक्ता गणेश राम ने पक्ष रखा।
शराब पीकर मारपीट करने और बच्चों को लेकर घर छोड़ने का आरोप
मामले के अनुसार, महिला की शादी 20 अक्टूबर 2010 को जमशेदपुर के मैरिज ऑफिसर के समक्ष हुई थी। दंपती के दो बच्चे हैं। पत्नी ने अदालत में आरोप लगाया था कि बेटे के जन्म के बाद उसके पति ने शराब पीना शुरू कर दिया। इसके बाद उसके व्यवहार में बदलाव आया और वह कथित तौर पर पत्नी के साथ मारपीट करने तथा गाली-गलौज करने लगा।
महिला के मुताबिक, वर्ष 2015 में उसके ससुर की मृत्यु के बाद पति का व्यवहार और अधिक हिंसक हो गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने काम करना बंद कर दिया और परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट गया। पत्नी का कहना था कि उसे लगातार प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था और घर में रहना मुश्किल हो गया था।
याचिका में महिला ने बताया कि 15 मार्च 2018 को परिस्थितियों के कारण उसे अपने दोनों बच्चों के साथ वैवाहिक घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद वह अपने माता-पिता के घर रहने लगी। बच्चों की परवरिश और अपने खर्च के लिए उसने निजी नौकरी की। महिला ने इन्हीं परिस्थितियों को आधार बनाते हुए तलाक की मांग की थी।
जमशेदपुर फैमिली कोर्ट ने क्यों खारिज की थी तलाक याचिका?
मामले की सुनवाई के दौरान पति को अदालत की ओर से नोटिस भेजा गया था, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ। इसके बाद फैमिली कोर्ट ने एकतरफा कार्यवाही की। हालांकि, पत्नी की ओर से तलाक के लिए दायर याचिका को स्वीकार नहीं किया गया।
फैमिली कोर्ट ने कथित मारपीट और प्रताड़ना के संबंध में आपराधिक मामला दर्ज नहीं होने को महिला के आरोपों के विरुद्ध महत्वपूर्ण आधार माना था। इस फैसले को चुनौती देते हुए महिला ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की धारा 19(1) के तहत दायर की गई थी। मूल तलाक याचिका विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 27(1)(बी) और (डी) के अंतर्गत प्रस्तुत की गई थी।
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं होने के कारण पत्नी की ओर से लगाए गए क्रूरता के आरोपों को खारिज किया जा सकता है और क्या प्रताड़ना के कारण वैवाहिक घर छोड़ने को स्वेच्छा से परित्याग माना जा सकता है।
प्राथमिकी नहीं होना पत्नी की गवाही खारिज करने का आधार नहीं
खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक विवादों में क्रूरता के आरोपों का आकलन उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल प्राथमिकी दर्ज नहीं होने से पत्नी के बयान को अविश्वसनीय मान लेना उचित नहीं है। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि महिला ने अपने बयान में पति के शराब पीने के बाद मारपीट करने, गाली-गलौज और पैसों को लेकर प्रताड़ित करने के आरोप लगाए थे। उसने बच्चों के साथ दुर्व्यवहार किए जाने की बात भी कही थी।
अदालत के अनुसार, इन आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की उचित जांच किए बिना सिर्फ आपराधिक मामला दर्ज नहीं होने के आधार पर शिकायत को खारिज करना सही दृष्टिकोण नहीं था। वैवाहिक संबंधों में होने वाली कथित क्रूरता का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं किया जा सकता कि पीड़ित पक्ष ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी या नहीं। इस टिप्पणी के जरिए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत को मामले के सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करना चाहिए। पत्नी की गवाही, उसके बताए गए घटनाक्रम और अलग रहने की परिस्थितियों को समग्र रूप से परखना जरूरी है।
प्रताड़ना से मजबूर होकर अलग रहना स्वेच्छा से परित्याग नहीं
हाईकोर्ट ने वैवाहिक घर छोड़ने के पीछे की परिस्थितियों पर भी विचार किया। खंडपीठ ने इस सवाल को महत्वपूर्ण माना कि कोई महिला पति से अलग रहकर अकेले अपने जीवन और दो बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी क्यों उठाएगी। अदालत के अनुसार, यह परिस्थिति महिला के बयान की विश्वसनीयता का आकलन करते समय प्रासंगिक हो सकती है।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी को पति की ओर से क्रूरता का सामना करना पड़ता है और उन्हीं परिस्थितियों के कारण वह वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होती है, तो उसके इस कदम को स्वतः स्वेच्छा से परित्याग नहीं कहा जा सकता। यह देखना आवश्यक है कि महिला ने अपनी इच्छा से पति को छोड़ा या कथित प्रताड़ना और घरेलू परिस्थितियों ने उसे अलग रहने के लिए मजबूर किया।
अदालत ने क्रूरता और परित्याग के पहलुओं को आपस में जुड़ा हुआ माना। ऐसे मामलों में केवल पति-पत्नी के अलग रहने की स्थिति देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय अलगाव के कारणों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच जरूरी है।
हाईकोर्ट ने 9 फरवरी का फैसला और 16 फरवरी की डिक्री रद्द की
मामले में सुनवाई के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जमशेदपुर फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन नहीं किया था। क्रूरता के आरोपों पर निचली अदालत का निष्कर्ष न्यायिक दृष्टि से सही नहीं पाया गया।
इसके बाद खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के 9 फरवरी 2026 के फैसले और 16 फरवरी 2026 की डिक्री को रद्द कर दिया। इस फैसले में हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में प्राथमिकी के अभाव, पत्नी की गवाही और प्रताड़ना के कारण घर छोड़ने की परिस्थितियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

