
रांची : ससुराल में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी महिला को प्रताड़ित करने के मामले में हर बार सीधे तौर पर ‘दहेज’ शब्द का इस्तेमाल होना ही जरूरी नहीं है। अगर पति या उसके परिवार वाले किसी कारोबार या अन्य काम के नाम पर भी महिला से जबरन पैसे या संपत्ति की मांग करते हैं और उसे शारीरिक या मानसिक चोट पहुंचाते हैं, तो कानूनन वह भी गंभीर क्रूरता की श्रेणी में ही आएगा।
यह पूरा मामला पूर्वी सिंहभूम की रहने वाली अनीता भकत से जुड़ा हुआ है। अनीता का विवाह साल 2008 में गौरांग भकत के साथ हुआ था। आरोप के मुताबिक, शादी के कुछ ही समय बाद पति ने चावल के व्यापार के लिए मायके से एक लाख रुपये अतिरिक्त लाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। जब अनीता ने असमर्थता जताई, तो उसके साथ मारपीट की गई। यहां तक कि गर्भावस्था के दौरान भी उसे शारीरिक यातनाएं दी गईं और इलाज तक नहीं कराया गया।
पैसे न मिलने पर पत्नी को निकाल दिया था घर से
अंततः पैसे न मिलने पर उसे घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद अनीता ने इंसाफ के लिए कानून का दरवाजा खटखटाया। निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने साक्ष्यों के आधार पर पति और उसके परिजनों को आईपीसी की धारा 498ए और 323 के तहत कसूरवार ठहराया था। हालांकि, बाद में अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए आरोपियों को बरी कर दिया कि व्यापार के लिए मांगी गई रकम को तकनीकी रूप से ‘दहेज’ नहीं कहा जा सकता।
अपीलीय अदालत के इसी फैसले को पलटते हुए जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 498ए का दायरा सिर्फ शादी के समय तय हुए परंपरागत दहेज तक सीमित नहीं है। गैरकानूनी ढंग से किसी भी संपत्ति या नकदी की मांग के लिए महिला को तंग करना कानून की नजर में अपराध है।
हाई कोर्ट ने आरोपियों के बरी होने के आदेश को खारिज करते हुए निचली अदालत की सजा को फिर से बहाल कर दिया है। साथ ही, पति समेत तीनों दोषियों को दो महीने के भीतर अदालत के सामने आत्मसमर्पण करने की सख्त हिदायत दी है। नियत समय पर सरेंडर न करने की सूरत में पुलिस को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजने के निर्देश जारी किए गए हैं।
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