
रांची : झारखंड सरकार राज्य में ऐसी जेलों का निर्माण करने जा रही है, जहां कैदी मुक्त ढंग से अपने परिवार के साथ रह सकेंगे। वे रात जेल में काटेंगे, जबकि सुबह आम आदमी की तरह कमाने के लिए बाहर निकल जाएंगे। हां, शाम में नियत समय तक उन्हें जेल में वापस आ जाना होगा। इस जेल में कोई ताला नहीं लगेगा, लेकिन कैदियों पर निगरानी रहेगी। इस व्यवस्था को ओपन जेल कहते हैं। कई राज्यों में इसका संचालन हो रहा है। अब झारखंड में भी बनाने की पहल तेज कर दी गई है।
झारखंड में ओपन जेल यानी खुली जेल का यह नया मॉडल सबसे पहले हजारीबाग स्थित लोकनायक जयप्रकाश नारायण केंद्रीय कारा से शुरू होने जा रहा है। यहां 32 एकड़ भूमि पर 100 सर्वसुविधायुक्त फ्लैट बनाए जा रहे हैं।
इसके अलावा रांची के होटवार, दुमका, पलामू और जमशेदपुर की घाघीडीह जैसी बड़ी सेंट्रल जेलों में भी जमीन उपलब्ध होते ही ऐसी खुली जेलें तैयार की जाएंगी। जब तक पूरी जेल बनकर तैयार नहीं होती, तब तक कैदियों को ओपन बैरक में रखने की तैयारी की जा रही है।
सलाखें नहीं, न ही भारी-भरकम सुरक्षा
पारंपरिक जेलों के विपरीत इस खुली जेल में न तो ऊंची दीवारें होंगी और न ही भारी सुरक्षा का पहरा। कैदी सुबह 8 बजे बाहर जाकर काम-धंधा या नौकरी कर सकेंगे। रात 8 बजे से पहले कैदी को वापस लौटना होगा, जहां वह अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रह सकेगा। कैदियों के लिए मोबाइल फोन जैसी बुनियादी सुविधाओं पर पाबंदी नहीं होगी।
सभी को नहीं मिलेगी ऐसी सुविधा
इस आजादी भरे माहौल का हिस्सा हर कैदी नहीं बन सकता। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत गठित एक हाई-लेवल कमेटी ही इन बंदियों का चयन करेगी। इसके लिए कई शर्तें रखी गई हैं। ऐसे कैदी जिसने अपनी सजा का कम से कम 70% हिस्सा शांतिपूर्वक पूरा कर लिया हो।
जेल के भीतर उसका आचरण और व्यवहार बेहद अनुशासित रहा हो। खुली जेल में रहने वाला कैदी सामान्य जेल के अन्य बंदियों से नहीं मिल पाएगा।
देश के 17 राज्यों में चल रही ओपन जेल
देश भर के 17 राज्यों में कुल 103 खुली जेलें संचालित की जा रही हैं। राजस्थान 51 ओपन जेलों के साथ देश में सबसे आगे है, जबकि महाराष्ट्र 19 जेलों के साथ दूसरे नंबर पर है। झारखंड समेत देश के 11 राज्यों में फिलहाल एक भी सक्रिय खुली जेल नहीं है। हजारीबाग की पुरानी खुली जेल अब सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए इस्तेमाल होती है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य कैदियों को समाज से दोबारा जोड़ना, उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना और सजा पूरी होने के बाद एक सामान्य नागरिक की तरह जीने के लायक बनाना है।

