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Jharkhand Delimitation : परिसीमन से बदल जाएगा झारखंड का राजनीतिक परिदृश्य : सूर्य सिंह बेसरा

झारखंड विधानसभा की 81 और लोकसभा की 14 सीटें रहेंगी बरकरार, लेकिन आरक्षित सीटों के स्वरूप में होगा बड़ा बदलाव

by Rakesh Pandey
Jharkhand Delimitation
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रांची : झारखंड में परिसीमन को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। पूर्व विधायक और आजसू के संस्थापक अध्यक्ष तथा राजनीतिक विश्लेषक सूर्य सिंह बेसरा का कहना है कि परिसीमन लागू होने के बाद झारखंड का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा। उनके अनुसार विधानसभा की कुल 81 और लोकसभा की कुल 14 सीटें बरकरार रहेंगी, लेकिन अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या और स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव होगा।
बेसरा के मुताबिक विधानसभा में एसटी के लिए आरक्षित 28 सीटों में छह की कमी होकर यह संख्या 22 रह जाएगी, जबकि एससी के लिए आरक्षित सीटें नौ से बढ़कर 10 हो जाएंगी। इसी तरह लोकसभा में एसटी के लिए आरक्षित पांच सीटों में से एक, राजमहल, समाप्त हो जाएगी और एससी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या एक से बढ़कर दो हो जाएगी।

परिसीमन का आधार क्या है?

बेसरा के अनुसार भारत निर्वाचन परिसीमन आयोग ने 17 अगस्त 2007 को परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत झारखंड में संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित आदेश राजपत्र में प्रकाशित किया था। इस आदेश के तहत झारखंड में लोकसभा के कुल 14 निर्वाचन क्षेत्र तथा विधानसभा के 81 निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं।
इनमें लोकसभा की चार सीटें अनुसूचित जनजाति और दो सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किए जाने का प्रावधान बताया गया है। इसी प्रकार विधानसभा की 81 सीटों में 22 सीटें अनुसूचित जनजाति तथा 10 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होंगी।
बेसरा का तर्क है कि परिसीमन के परिणामस्वरूप आदिवासी समुदाय के लिए लोकसभा की एक महत्वपूर्ण सीट राजमहल समाप्त हो जाएगी, जबकि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ जाएगी। विधानसभा स्तर पर भी एसटी के लिए आरक्षित सीटों में छह की कमी और एससी के लिए एक सीट की वृद्धि होगी।
उनका कहना है कि यही वह बिंदु है, जिसे लेकर झारखंड में परिसीमन का विरोध किया जा रहा है।

2001 की जनगणना के आधार पर परिसीमन

परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत संविधान के अनुच्छेद 81, 82, 170 और 327 के प्रावधानों के अनुरूप लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्समायोजन की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया गया।
बेसरा के मुताबिक वर्ष 2007-08 में देश के अधिकांश राज्यों में परिसीमन की प्रक्रिया लागू हुई। उनका कहना है कि झारखंड में विरोध के कारण परिसीमन को 2026 तक स्थगित रखा गया था।

लोकसभा सीटों में नाम और आरक्षण का बदलाव

झारखंड में लोकसभा की कुल 14 सीटें बरकरार रहने के बावजूद निर्वाचन क्षेत्रों के स्वरूप और आरक्षण में बदलाव का दावा किया गया है। वर्तमान में एसटी के लिए आरक्षित पांच संसदीय क्षेत्रों में सिंहभूम, खूंटी, लोहरदगा, दुमका और राजमहल शामिल हैं।
बेसरा का कहना है कि नए परिसीमन में राजमहल को एसटी आरक्षित संसदीय क्षेत्र के रूप में समाप्त कर दिया जाएगा। उनके अनुसार परिसीमन के दौरान राजमहल और कोडरमा जैसे ऐतिहासिक नामों को समाप्त किया गया, जबकि देवघर और बोकारो के नाम से नए संसदीय क्षेत्रों का गठन किया गया।
उनका सवाल है कि ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान से जुड़े निर्वाचन क्षेत्रों के नामों को बदलने या समाप्त करने का आधार क्या है।

विधानसभा क्षेत्रों में व्यापक बदलाव का दावा

बेसरा के अनुसार विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या भले ही 81 रहेगी, लेकिन उनके नाम, भौगोलिक स्वरूप और आरक्षण में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा।

गढ़वा : पहले गढ़वा और भवनाथपुर दो विधानसभा क्षेत्र थे। परिसीमन के बाद तीन विधानसभा क्षेत्रों का गठन किया गया। पिपरा कला को नए क्षेत्र के रूप में शामिल किए जाने तथा भवनाथपुर को एससी के लिए आरक्षित किए जाने का उल्लेख किया गया है।

पलामू : जिले में पांच विधानसभा सीटें बरकरार रहने के बावजूद विश्रामपुर विधानसभा क्षेत्र का नाम बदलकर पाटन किए जाने की बात कही गई है।

लातेहार : पहले मनिका और लातेहार दोनों एसटी के लिए आरक्षित थे। परिसीमन के बाद मनिका का नाम बदलकर बालूमाथ किए जाने तथा आरक्षण के स्वरूप में बदलाव का दावा किया गया है।

चतरा : सिमरिया और चतरा दोनों सीटें पहले एससी के लिए आरक्षित थीं। बेसरा के अनुसार सिमरिया का नाम समाप्त कर ईटखोरी नाम से नया विधानसभा क्षेत्र बनाया गया और इसे सामान्य वर्ग के लिए निर्धारित किया गया।

हजारीबाग-रामगढ़ : दोनों जिलों में विधानसभा सीटों की संख्या छह से बढ़कर सात किए जाने तथा पतरातू नाम से नया क्षेत्र बनाए जाने का उल्लेख है।

कोडरमा : जिले में कोडरमा के अलावा मरकच्चो नाम से एक नया विधानसभा क्षेत्र बनाए जाने की बात कही गई है।

गिरिडीह : जमुआ विधानसभा क्षेत्र, जो एससी के लिए आरक्षित था, उसके स्वरूप में बदलाव कर देवरी नाम से क्षेत्र बनाए जाने और आरक्षण में परिवर्तन का दावा किया गया है।

देवघर : जिले की तीनों विधानसभा सीटों को बरकरार रखने की बात कही गई है।

गोड्डा : तीनों विधानसभा सीटें बरकरार रहने के बावजूद पोड़ैयाहाट और महागामा के नाम बदलकर क्रमशः पथरगामा और मेहरमा किए जाने का उल्लेख है।

साहिबगंज : जिले की तीन सीटों में से दो सीटें पहले एसटी के लिए आरक्षित थीं। बेसरा के अनुसार बोरियो (एसटी) सीट समाप्त कर बरहरवा नाम से नया सामान्य विधानसभा क्षेत्र बनाया गया।

पाकुड़: जिले में विधानसभा सीटों की संख्या तीन से घटाकर दो किए जाने तथा लिट्टीपाड़ा (एसटी) सीट समाप्त किए जाने का दावा है।

दुमका : चार विधानसभा क्षेत्रों को घटाकर तीन किए जाने और जामा (एसटी) सीट समाप्त किए जाने की बात कही गई है।

जामताड़ा : नाला विधानसभा क्षेत्र के आरक्षण में बदलाव किए जाने का उल्लेख है।

धनबाद और बोकारो में भी बदलाव

बेसरा के अनुसार धनबाद जिले में विधानसभा क्षेत्रों की संख्या छह से बढ़ाकर सात की जाएगी। उनका कहना है कि ऐतिहासिक महत्व वाले टुंडी विधानसभा क्षेत्र का नाम समाप्त कर दिया गया है और निरसा के साथ चिरकुंडा को जोड़ा गया है। इसके अलावा गोविंदपुर और कतरास नाम से नए विधानसभा क्षेत्रों के गठन तथा बाघमारा को एससी के लिए आरक्षित किए जाने का दावा किया गया है।

बोकारो जिले में विधानसभा सीटों की संख्या चार से बढ़कर पांच किए जाने तथा जरीडीह नाम से नए क्षेत्र के गठन की बात कही गई है।

रांची-खूंटी में भी बदलेगा समीकरण

रांची और खूंटी जिलों में पहले कुल नौ विधानसभा क्षेत्र थे। बेसरा के अनुसार परिसीमन के बाद इनकी संख्या घटकर आठ रह जाएगी।उनका कहना है कि तोरपा (एसटी), खिजरी (एससी) और मांडर (एसटी) जैसे विधानसभा क्षेत्रों के नाम और स्वरूप में बदलाव किया गया है। सिल्ली के आरक्षण में परिवर्तन तथा कांके के आरक्षण को सामान्य किए जाने का भी दावा किया गया है। वहीं रातू, जुगसलाई, रांची दक्षिण और रांची केंद्रीय जैसे नए नामों का उल्लेख किया गया है।
लोहरदगा में एसटी के लिए आरक्षित एक विधानसभा सीट बरकरार रहने की बात कही गई है। गुमला में तीन एसटी सीटों की संख्या घटाकर दो किए जाने तथा बिशुनपुर (एसटी) सीट के समाप्त होने का दावा किया गया है।

कोल्हान क्षेत्र में आरक्षण का बड़ा बदलाव

सिमडेगा जिले में दोनों विधानसभा सीटें एसटी के लिए आरक्षित रहने की बात कही गई है, हालांकि कोलेबिरा के नाम में परिवर्तन का उल्लेख है।
पश्चिमी सिंहभूम में विधानसभा सीटों की संख्या पांच से घटाकर चार किए जाने तथा मनोहरपुर जैसे क्षेत्र के स्वरूप में बदलाव का दावा किया गया है।
सरायकेला-खरसावां की तीनों सीटें बरकरार रहने के बावजूद ईचागढ़ और खरसावां जैसे ऐतिहासिक नामों को परिसीमन में प्रभावित किए जाने की बात कही गई है।

घाटशिला सीट को लेकर सबसे बड़ा सवाल

बेसरा के अनुसार पूर्वी सिंहभूम में विधानसभा सीटों की संख्या छह ही रहेगी, लेकिन परिसीमन से जिले का राजनीतिक समीकरण काफी बदल जाएगा।
उनका कहना है कि घाटशिला विधानसभा क्षेत्र वर्ष 1952 से आदिवासियों के लिए आरक्षित रहा है। वर्तमान में घाटशिला, धालभूमगढ़ और मुसाबनी प्रखंडों को मिलाकर इस क्षेत्र का गठन किया गया था। परिसीमन में धालभूमगढ़ को बहरागोड़ा और मुसाबनी को पोटका विधानसभा क्षेत्र के साथ जोड़े जाने तथा गैर-आदिवासी क्षेत्रों को मिलाकर घाटशिला का नया स्वरूप तैयार किए जाने की बात कही गई है।
बेसरा इसे आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बदलाव मानते हैं। उनके अनुसार मानगो और बागबेड़ा जैसे नए विधानसभा क्षेत्रों का गठन किया गया है, जबकि जुगसलाई के आरक्षण में भी बदलाव किया गया है।

2026 में फिर तेज हुआ परिसीमन का विरोध

बेसरा के अनुसार वर्ष 2007-08 में झारखंड में परिसीमन लागू करने का व्यापक विरोध हुआ था। इसके बाद राज्य में परिसीमन की प्रक्रिया को वर्ष 2026 तक स्थगित रखा गया।
उनका कहना है कि अब 30 अगस्त 2026 को रांची के मोरहाबादी मैदान में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोगों ने परिसीमन के विरोध में ‘उलगुलान’ का आह्वान किया है। इससे एक बार फिर झारखंड में परिसीमन का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है।

पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों को परिसीमन से बाहर रखने की मांग

सूर्य सिंह बेसरा का कहना है कि झारखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और जनजातीय संरचना को ध्यान में रखते हुए परिसीमन की प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि जिस प्रकार संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, उसी प्रकार पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों को भी परिसीमन अधिनियम, 2002 के प्रभाव से बाहर रखने पर विचार किया जाना चाहिए।

उनके अनुसार झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को सुरक्षित रखना जरूरी है। परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी पर पड़ सकता है।
इसी आधार पर बेसरा झारखंड में परिसीमन को लेकर व्यापक विमर्श और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।

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