
Jamshedpur : टाटा पावर की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) में कंपनी के अध्यक्ष नटराजन चन्द्रशेखरन ने कहा कि वित्त वर्ष 26 विरोधाभासों का साल रहा है। इस साल की शुरूआत में एक बड़ी उम्मीद थी। लगा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर खर्च बढ़ेगा। सप्लाई चेन मज़बूत होगी। इससे दुनिया भर में आर्थिक विकास स्थिर रहेगा। इसी दौरान कई ऐतिहासिक व्यापार समझौते पूरे हुए। इनमें भारत और यूरोपीय संघ का मुक्त व्यापार समझौता शामिल है। साथ ही, अमेरिका के साथ एक अंतरिम व्यापार सौदा भी तय हुआ। लेकिन, इन अच्छी ख़बरों के साथ एक बड़ी चुनौती भी आई। पश्चिम एशिया का संकट शुरू हो गया। इसकी वजह से ‘स्टैगफ्लेशन’ का डर पैदा हो गया। यानी एक तरफ विकास की रफ्तार धीमी होने लगी, तो दूसरी तरफ महंगाई बढ़ने लगी। इसके साथ ही ऊर्जा सुरक्षा की भी चिंताएं बढ़ गईं।
एआई पर दुनिया भर में खर्च बहुत तेज़ी से बढ़ा
पिछले 65 सालों में हमारी धरती लगातार गर्म होती जा रही है, क्योंकि यह जितनी गर्मी बाहर छोड़ती है, उससे कहीं ज़्यादा खुद में समेट लेती है। साल 2026 में अल नीनो का असर रहने का अनुमान है। इस वजह से माना जा रहा है कि यह साल और भी गर्म होगा, जिससे कूलिंग यानी घरों और दफ्तरों को ठंडा रखने की ज़रूरत बहुत बढ़ जाएगी।इसी के साथ, एआई पर दुनिया भर में खर्च बहुत तेज़ी से बढ़ा है।अब यह खर्च तेल और प्राकृतिक गैस के निवेश को टक्कर देने लगा है। साल 2025 का ही उदाहरण लीजिए। पूरी दुनिया में बिजली की मांग सिर्फ 3% बढ़ी, लेकिन डेटा सेंटर्स में यह 17% बढ़ गई। अनुमान है कि साल 2030 तक, दुनिया की कुल बिजली का करीब 3% हिस्सा सिर्फ ये डेटा सेंटर्स ही इस्तेमाल करेंगे।आगे अध्यक्ष ने कहा है कि ऐसे माहौल में, ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। आगे बढ़ने के लिए हमें दो बड़ी चुनौतियों के बीच संतुलन बनाना होगा। पहली चुनौती है एआई के लिए बिजली की मांग और दूसरी चुनौती है गर्म होता मौसम। हम इस संतुलन को तभी हासिल कर सकते हैं, जब हमारा एनर्जी सिस्टम बदलेगा। हमें ऐसे मॉडल अपनाने होंगे जो पहले से ज़्यादा साफ़ हों, मज़बूत हों और विकेंद्रीकृत हों, यानी जो किसी एक जगह पर निर्भर न हो।
भारत का पावर सेक्टर: अपडेट और अनुमान
हमारा भारत का एनर्जी सिस्टम अब पहले से ज़्यादा साफ़, हरा-भरा और एक नए रूप में बदल रहा है। आज हम रिन्यूएबल एनर्जी यानी अक्षय ऊर्जा की कुल क्षमता के मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुँच चुके हैं।अगर 31 मार्च 2026 तक के आँकड़े देखें, तो भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 533 गीगावाट तक पहुँच गई है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें साफ़ और पर्यावरण के अनुकूल स्रोतों की हिस्सेदारी 53% है। इस सफ़र में सौर ऊर्जा सबसे आगे है, जिसकी क्षमता 150 गीगावाट से भी ज़्यादा हो चुकी है, और इसके बाद पवन ऊर्जा का नंबर आता है। इस पूरे वित्त वर्ष में जितनी भी नई बिजली क्षमता जोड़ी गई, उसमें से 95% से ज़्यादा हिस्सा साफ़ और पर्यावरण के अनुकूल स्रोतों का था। और इस बढ़त में भी, अकेले सौर ऊर्जा का योगदान करीब 80% रहा। अपने अध्यक्षiय भाषण में टी चंद्रशेखर में आगे कहा है कि साल 2030 तक, हमारी कुल बिजली उत्पादन क्षमता बढ़कर 770 गीगावाट होने का अनुमान है। इसमें से 64% हिस्सा पूरी तरह से साफ़ और पर्यावरण के अनुकूल स्रोतों का होगा। इस लक्ष्य को पाने के लिए हमें बैटरी और पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स में बड़े निवेश की ज़रूरत होगी। सिर्फ यही नहीं, साल 2030 तक भारत का ट्रांसमिशन नेटवर्क भी 5 लाख सर्किट किलोमीटर से बढ़कर 6 लाख सर्किट किलोमीटर हो जाने की उम्मीद है।

