Jharkhand Bureaucracy : नवरात्र की शुरुआत हो चुकी थी। गुरु के आवास का माहौल भक्तिमय था। सुबह-सुबह तफरीह करते हुए पहुंच गया। पता चला कि गुरु देवी साधना में लीन हैं। करीब डेढ़ घंटे इंतजार के बाद पूजा घर से बाहर निकले। शरीर पर पीतांबर और माथे पर चंदन। मौजूदा वेशभूषा गुरु के सख्त प्रशासक की सच्चाई को जैसे नकार रही हो।
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बहरहाल, अभिवादन के साथ गुरु हाथ में प्रसाद रखकर दूसरे कमरे में चले गए। थोड़ी देर में जब दोबारा निकले तो परिधान बदला हुआ था। सूट-बूट, महंगी घड़ी, स्टाइलिश चश्मा। कुर्सी से खड़े देखकर बैठने का इशारा किया। फलाहार सामने रखा था। गुरु ने ग्रहण करना शुरू किया। साथ-साथ बातचीत का सिलसिला चल निकला। गुरु बोले- कुछ पता चला पत्रकार महोदय हालिया घटनाक्रम? गुरु के सवाल का संदर्भ व प्रसंग क्या है, इससे पूरी तरह अनभिज्ञ था। सो, उत्तर ना में ही देना था, लेकिन कथा जानने के लिए विनम्रतापूर्वक आग्रह किया। पूछा- कुछ नया घटित हो गया क्या वनांचल में? गुरु बोले- हां-हां बिल्कुल। कुछ ऐतिहासिक ही घटित हुआ है।
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नौकरशाही के माथे पर नई इबारत लिख डाली गई है। इतना सुनते ही यह सोचकर झेंप गया कि इतनी अहम सूचना से कैसे अनजान रहा? बहरहाल, गुरु के इस नए खुलासे ने उत्सुकता काफी बढ़ा दी थी। बिना देर किए सीधे पूछा, ‘बताइए गुरु, क्या हुआ है?’ गुरु बोले, बता तो दूंगा, लेकिन सूचना की पुष्टि श्रोता-पाठक की जिम्मेदारी होगी। बात सुनने के लिए प्रारंभिक सहमति अनिवार्य थी। सो बगैर देर किए दे दी। कहा- बिल्कुल गुरु। सब कुछ जानने वाले के रिस्क पर। इतना सुनते ही गुरु के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
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गुरु ने बोलना शुरू किया। कहा- सुना है खेती-बाड़ी वाले महकमे में पेपरवेट वाली चर्चा हुई है। पेपरवेट वाली चर्चा? गुरु साफ-साफ बताइए। गुरु बोले, खेती-बाड़ी वाले महकमे की एक बड़ी कुर्सी पर एक आनंदी बाबा ने आसन जमा रखा है। एक दिन महकमे की मुखिया मैडम ने बाबा को औपचारिक चर्चा के लिए बुला लिया।
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मैडम सवाल पर सवाल करती रहीं। बाबा एक चुप-हजार चुप। बताने वाले बता रहे हैं कि मौनी बाबा बने साहब के व्यवहार से मैडम इतनी खीझ गईं कि उनकी ओर पेपरवेट फेंक दिया। राम जाने पेपरवेट साहब को लगा या नहीं। नौकरशाही के गलियारे में इस घटनाक्रम की बड़ी चर्चा है।
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गुरु का यह रहस्योद्घाटन हैरान करने वाला था। तमाम सूरमाओं के विस्फोटक विश्लेषण के सैकड़ों दावों में सच कैसे छिपा रह गया? कहीं कोई शोर नहीं, कोई खबर नहीं। दिमाग में बस एक सवाल कौंध रहा था? आखिर वह कौन शिल्पी हैं, जिसकी नेह भरी फिरकी से आदित्य की रोशनी ढक गई। मौसम का आनंद गायब हो गया। नाश्ते की प्लेट के साथ चर्चा कमरे में छोड़कर गुरु दफ्तर रवाना होने के लिए गाड़ी में बैठ गए थे। सेवादार से ताकीद की- साहब निकल रहे हैं। जल्दी-जल्दी गाड़ी के पास पहुंचा, हाथ जोड़े और विदा ली।
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