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Health Insurance News : अस्पतालों, बीमा कंपनियों एवं टीपीए के कुचक्र से मरीजों को राहत दिलाना अत्यंत आवश्यक : कैट

by Birendra Ojha
CAIT
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जमशेदपुर : झारखंड सहित देशभर में लाखों मरीज, जिन्होंने अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए मेडिकल इंश्योरेंस लिया हुआ है, आज उसी व्यवस्था के कारण भारी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीड़ा झेलने को मजबूर हैं। इस अत्यंत गंभीर और जनहित से जुड़े विषय पर कैट (कन्फेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स) के राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री सुरेश सोंथालिया ने अस्पतालों से डिस्चार्ज के समय टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर), बीमा कंपनियों एवं अस्पतालों के बीच होने वाली अनावश्यक देरी को समाप्त करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

इस संबंध में दिल्ली की चांदनी चौक के सांसद और कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा को पत्र लिख कर कहा कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, महंगे बीमा प्रीमियम और कैशलेस इलाज की व्यवस्था के बावजूद यदि मरीज को अस्पताल से छुट्टी पाने के लिए घंटों या पूरा दिन प्रतीक्षा करनी पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इलाज पूरा होने और डॉक्टर द्वारा फिट घोषित किए जाने के बाद भी मरीजों को केवल फाइलों, ई-मेल, दस्तावेजों और औपचारिक अनुमोदनों के नाम पर अस्पतालों में रोके रखना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

इस संबंध में सांसद खंडेलवाल ने इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) के चेयरमैन को भी अलग से पत्र भेजकर बीमा कंपनियों और टीपीए के लिए सख्त एवं समयबद्ध दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि लोग स्वास्थ्य बीमा इसलिए लेते हैं, ताकि बीमारी के समय उन्हें आर्थिक सुरक्षा और मानसिक राहत मिल सके, लेकिन आज स्थिति इसके ठीक विपरीत हो गई है। बीमा सुविधा अब राहत का माध्यम बनने के बजाय अनेक मामलों में ‘प्रशासनिक प्रताड़ना’ का कारण बनती जा रही है।

सोंथालिया ने कहा कि देशभर में लाखों बीमाधारक मरीजों को उपचार पूरा होने और डॉक्टर द्वारा छुट्टी दिए जाने के बावजूद घंटों तक अस्पतालों में केवल इसलिए रोके रखा जाता है क्योंकि टीपीए, बीमा कंपनियां और अस्पताल आपस में औपचारिकताओं, दस्तावेजों और स्वीकृतियों के नाम पर फाइलें घुमाते रहते हैं। कई बार पहले से स्वीकृत इलाज के बावजूद अंतिम डिस्चार्ज के समय नए प्रश्न खड़े किए जाते हैं, अतिरिक्त कागजात मांगे जाते हैं और भुगतान की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल दी जाती है। इस प्रक्रिया में मरीज और उसके परिजन सबसे कमजोर पक्ष बनकर रह जाते हैं।

उन्होंने कहा कि यह समस्या केवल असुविधा का विषय नहीं है बल्कि एक गंभीर मानवीय और सामाजिक मुद्दा है। अस्पतालों में अतिरिक्त घंटों तक रुकने के कारण मरीजों को अतिरिक्त बेड चार्ज, दवाइयों एवं अन्य खर्चों का बोझ भी उठाना पड़ता है। दूर-दराज़ से आए परिवारों को यात्रा, रहने और भोजन की अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं और गंभीर बीमारी से उबर रहे मरीजों के लिए यह प्रतीक्षा और भी अधिक पीड़ादायक हो जाती है।

कैट ने कहा कि स्वास्थ्य बीमा और कैशलेस इलाज की व्यवस्था का मूल उद्देश्य मरीज को राहत और सुरक्षा देना था, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में मरीज अस्पताल, बीमा कंपनी और टीपीए के “कुचक्र” में फंस जाता है। उपचार के बाद भी मरीज और उसका परिवार प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बंधक बनकर रह जाते हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में लोगों के विश्वास को कमजोर करती है और बीमा क्षेत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

उन्होंने कहा कि अस्पताल डिस्चार्ज प्रक्रिया समय रहते शुरू नहीं करते, टीपीए बार-बार नए दस्तावेज मांगते हैं और बीमा कंपनियां स्पष्ट जवाबदेही से बचती हैं। छुट्टियों, रविवार और देर रात के समय स्थिति और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि संबंधित अधिकारी उपलब्ध नहीं होते। कई अस्पतालों में मरीजों को यह कहकर रोका जाता है कि “फाइनल अप्रूवल” नहीं आया है, जबकि इलाज की मंजूरी पहले ही मिल चुकी होती है। यह पूरी वस्था मरीज-केंद्रित होने के बजाय प्रक्रिया-केंद्रित बन चुकी है, जो मानवीय संवेदनाओं के विरुद्ध है।

कैट के चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि यदि डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान और अन्य वित्तीय सेवाएं कुछ मिनटों में संभव हैं, तो अस्पताल डिस्चार्ज जैसी संवेदनशील प्रक्रिया घंटों तक लंबित रहना पूरी तरह अनुचित है। तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस युग में मरीजों को फाइलों और औपचारिकताओं के नाम पर परेशान करना किसी भी आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने आग्रह किया है की कि केंद्र सरकार तत्काल एक सख्त और समयबद्ध नीति लागू करे, जिसके तहत डिस्चार्ज दस्तावेज जमा होने के बाद 1–2 घंटे के भीतर अंतिम टीपीए स्वीकृति अनिवार्य हो,तय समय में जवाब न मिलने पर “डीम्ड अप्रूवल” माना जाए और मरीज को तत्काल जाने दिया जाए, अनावश्यक देरी पर अस्पताल, टीपीए और बीमा कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय हो,पूरी प्रक्रिया के लिए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया जाए, 24×7 क्लेम क्लियरेंस सुविधा उपलब्ध हो तथा मरीजों के लिए प्रभावी और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।

सोंथालिया ने यह भी सुझाव दिया कि अस्पतालों को डिस्चार्ज से कई घंटे पहले ही बीमा एवं टीपीए संबंधी औपचारिकताएं शुरू करने के निर्देश दिए जाएं ताकि अंतिम समय में मरीजों को अनावश्यक प्रतीक्षा न करनी पड़े। उन्होंने कहा कि मरीज कोई “फाइल” नहीं बल्कि संवेदनशील मानव जीवन है और उसके सम्मान एवं सुविधा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “जो मरीज चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ होकर घर जाने के लिए तैयार है, उसे प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण अस्पताल में रोके रखना अमानवीय है। स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य मरीज को राहत देना होना चाहिए, न कि उसे कागजी औपचारिकताओं और संस्थागत उदासीनता के जाल में फंसाना। दुर्भाग्य से वर्तमान व्यवस्था में ठीक ऐसा ही हो रहा है।”

खंडेलवाल ने आशा व्यक्त की कि केंद्र सरकार और संबंधित नियामक संस्थाएं इस गंभीर विषय पर प्राथमिकता के आधार पर निर्णय लेकर देश के करोड़ों बीमाधारक मरीजों और उनके परिवारों को बड़ी राहत प्रदान करेंगी तथा स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था को वास्तव में मरीज हितैषी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगी।

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