Ranchi : झारखंड का आर्थिक हाल बेहाल है। बारह दिन पहले समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के आय-व्यय की समीक्षा के बाद यही निष्कर्ष प्राप्त हुआ है। राजस्व मद में 15,043.17 करोड़ रुपये कम अर्जित होने की गणना की गई है। केंद्रीय करों में हिस्सेदारी, अनुदान की राशि, राज्य का स्वकर और गैर-स्वकर में 1,25,666.72 करोड़ राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य था। इसके सापेक्ष केवल 1,10,623.55 करोड़ रुपये ही मिल सके। जाहिर है कि इसका दुष्प्रभाव विकास योजनाओं पर पड़ा।
प्रक्षेत्रवार आकलन में पाया गया कि केंद्रीय करों में हिस्सेदारी और सहायता अनुदान में अनुमानित लक्ष्य से 5935 करोड़ कम मिले। इसी प्रकार राज्य स्वकर में अनुमानित 42,113.38 करोड़ के सापेक्ष 37,313.13 करोड़ ही कमाई हुई, जिससे 4800.25 करोड़ का नुकसान हुआ। यही हाल राज्य गैर कर का भी रहा। अनुमानित लक्ष्य 19,456.12 के सापेक्ष 15,165.32 करोड़ ही अर्जित हुआ। यानी इस मद में 4290.80 करोड़ कम कमाई हुई।राज्य के एक बड़े कमाऊ विभाग वाणिज्यकर को 26,128 करोड़ लक्ष्य के सापेक्ष 5101 करोड़ कम मिला।
यह संभवतः जीएसटी की दर में युक्तिकरण के कारण हुआ। देश की खनिज संपदा में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखनेवाले इस राज्य को 2025-26 में खनिज रॉयल्टी मद में 15,500 करोड़ मिलने की उम्मीद थी, लेकिन मिला केवल 11,860 करोड़ ही। यानी 3,640 करोड़ कम मिला। पड़ोसी ओडिशा अपेक्षाकृत कम खनिज होने के बावजूद 50,000 करोड़ अर्जित करता है, जबकि छत्तीसगढ़ अपने खनिज क्षेत्र से 16-17 हजार करोड़ अर्जित करता है।
आसान नहीं वर्तमान वित्तीय वर्ष का लक्ष्य हासिल करना
वर्तमान वित्तीय वर्ष 2026-27 में बतौर राज्य स्वकर 46,000 करोड़ मिलने का लक्ष्य है, जबकि 2025-26 में 42,113 करोड़ लक्ष्य के सापेक्ष 4,800 करोड़ कम मिला। ऐसी स्थिति में वर्तमान वित्तीय वर्ष का निर्धारित विशाल लक्ष्य कैसे प्राप्त किया जा सकेगा, यह यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा है। राजस्व और योजना मद में 2020-21 से 2024-25 तक पांच वर्षों में बजट के सापेक्ष 82 प्रतिशत से अधिक खर्च करने का रिकार्ड रहा, जबकि 2025-26 में कम धनागम के कारण 75.97 प्रतिशत ही खर्च हो सका। उक्त पांच वर्षों में सरकार को राजस्व प्राप्तियां 88.58 प्रतिशत से लेकर 92.7 प्रतिशत रहीं, जबकि 2025-26 में 88 प्रतिशत ही अर्जित किया जा सका।
केंद्र से सहायता अनुदान में कटौती
ऐसे में स्वकर और गैर स्वकर बढ़ाने की सख्त जरूरत है। यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि केंद्र से सहायता अनुदान में कटौती हो रही है। जीएसटी के युक्तिकरण के कारण सालाना 4-5 हजार करोड़ नुकसान तय है। इसी प्रकार केंद्र प्रायोजित योजनाओं में केंद्र द्वारा अपेक्षित आर्थिक सहयोग में कमी लाई जा रही है। मनरेगा यानी वीबी ग्राम जी योजना में अब केंद्र-राज्य के बीच 90ः10 के बजाय 60ः40 प्रतिशत की हिस्सेदारी निर्धारित कर दी जाने से मजदूरों के लिए तकरीबन पांच हजार करोड़ अतिरिक्त जुगाड़ करना पड़ेगा।
नीति आयोग दे रहा इनकम सोर्स बढ़ाने की नसीहत
उधर, नीति आयोग राज्य को अपना आय स्रोत बढ़ाने की नसीहत दे रहा है। यही हाल रहा तो आंतरिक आय के स्रोतों में हर साल 30-40 हजार करोड़ अतिरिक्त उपार्जित करना पड़ेगा, जो हिमालय जीतने जैसा बड़ा प्रश्न है। बेदम होती जा रही आर्थिक स्थिति के संदर्भ में मुख्य सचिव कार्यालय को प्राप्त वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के पत्र में सलाह दी गई है कि राज्य के कमाऊ पूत वाणिज्यकर, भू-राजस्व, उत्पाद, परिवहन, निबंधन, माइन्स सेस, माइन्स रॉयल्टी, और वन विभाग के साथ समन्वय जरूरी है। धनागम की ठोस योजना बनाना अति आवश्यक है। मजे की बात यह है कि राजस्व प्राप्तियां तथा खर्च मुख्यतः वित्त विभाग का उत्तरदायित्व है, जबकि कमाऊ विभागों को वह नियंत्रित नहीं कर सकता। कमाने और खर्च करनेवाले विभाग वित्त विभाग के प्रति उत्तरदायी हों, ऐसा मेकेनिज्म विकसित करेगा कौन।

