Ranchi: झारखंड में स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्ति विवाद से जुड़े मामले में बुधवार को झारखंड हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले में दायर सभी हस्तक्षेप याचिकाओं को स्वीकार करते हुए हस्तक्षेपकर्ताओं को अपील में प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जो अभ्यर्थी अभी तक मामले में प्रतिवादी नहीं बनाए गए हैं, उन्हें नोटिस जारी कर मुकदमे की जानकारी दी जाए। साथ ही, जिन पक्षों ने कैविएट दायर की है, उन्हें भी याचिका की प्रतियां उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया।
खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दाखिल संशोधन याचिका को भी सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। मामले की अगली सुनवाई अब 30 जून को होगी।
हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि उनके मामले भी उसी प्रक्रिया के तहत निस्तारित हुए थे, लेकिन झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) ने उनके खिलाफ अलग से कोई अपील दाखिल नहीं की है। इसके बावजूद वर्तमान अपील में आने वाले फैसले का सीधा असर उनके अधिकारों और हितों पर पड़ सकता है। इसी आधार पर उन्होंने अपने हितों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप आवेदन दाखिल किया था।
सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने आयोग को आवश्यक संशोधन करते हुए सभी हस्तक्षेपकर्ताओं को अपील में औपचारिक रूप से पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स और चंचल जैन ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन उपस्थित हुए।
इस बीच राज्य सरकार ने अपनी संशोधन याचिका में कहा है कि हाई कोर्ट की एकल पीठ ने मूल आदेश में संशोधन करते हुए फैक्ट फाइंडिंग कमीशन के नए अध्यक्ष के रूप में न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी की नियुक्ति कर दी है। सरकार का कहना है कि यह संशोधन उस समय किया गया, जब मामले से संबंधित अपील पहले से ही खंडपीठ के समक्ष लंबित है।
सरकार ने अदालत को बताया कि संशोधित आदेश के बाद फैक्ट फाइंडिंग कमीशन ने सुनवाई शुरू कर दी है और ग्रीष्मावकाश के दौरान भी कार्यवाही जारी रखी गई। जबकि इसी विषय से जुड़ी अपील पर खंडपीठ में सुनवाई चल रही है। सरकार का तर्क है कि एक ही मामले में समानांतर सुनवाई उचित नहीं है, इसलिए एकल पीठ के संशोधित आदेश पर रोक लगाई जानी चाहिए।
अब इस बहुचर्चित नियुक्ति विवाद में सभी प्रभावित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा, जिससे मामले के अंतिम निर्णय का दायरा और प्रभाव दोनों व्यापक हो गए हैं।
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