
रांची: झारखंड में पुल और पुलिया टूटकर गिरने जैसे गंभीर मुद्दे पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव से इस मामले में पूरी जानकारी के साथ रिपोर्ट (शपथ पत्र) मांगी है। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की बेंच ने इस मामले से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की।
कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट इस बात पर काफी नाराज हुआ कि कोर्ट के पुराने आदेश के बाद भी विभाग के सचिव ने खुद अपनी रिपोर्ट कोर्ट में जमा नहीं की। उनकी जगह चीफ इंजीनियर (मुख्य अभियंता) ने रिपोर्ट फाइल कर दी थी। इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा- क्या विभाग के सचिव को कोर्ट के आदेश का पता नहीं था? जब फरवरी 2026 में सीधे सचिव से जवाब मांगा गया था, तो चीफ इंजीनियर ने रिपोर्ट क्यों दी? यह एक तरह से कोर्ट के आदेश को न मानना है और इसके लिए अवमानना की कार्रवाई भी हो सकती है।
हाई कोर्ट ने पूछे 3 मुख्य सवाल
अदालत ने ग्रामीण विकास विभाग को अगली सुनवाई तक हर हाल में जवाब देने को कहा है और मुख्य रूप से तीन बातें पूछी हैं। इनमें राज्य में ग्रामीण विकास विभाग के बनाए कितने पुल-पुलिया अब तक गिरे हैं, इन मामलों में दोषी अधिकारियों या ठेकेदार कंपनियों (एजेंसियों) पर क्या एक्शन लिया गया है तथा लापरवाह लोगों को क्या सजा दी गई है?
दरअसल, पंकज कुमार यादव नामक व्यक्ति ने कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि झारखंड में सरकारी पैसों से बने कई पुल घटिया निर्माण के कारण ढह गए। सबसे बड़ी बात यह है कि पुल गिरने के बाद भी जिम्मेदार अफसरों और ठेकेदारों पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई, जिससे उनके हौसले बुलंद हैं। हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली तारीख 2 जुलाई तय की है।

