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Guru Purnima Special : हर दिन 11 किमी पैदल स्कूल जा रही थी आदिवासी छात्रा, शिक्षिका ने अपने घर में दी रहने की जगह

Guru Purnima Special : एक गुरु ऐसा भी : बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की मुहिम को मूर्त रूप दे रहीं अनुराधा कुमारी

by Mujtaba Haider Rizvi
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Jamshedpur : जेनरेशन-जेड (जेन-जी) की समस्याओं और अधिकारों को लेकर चौतरफा चल रही बहस के बीच यह खबर थोड़ी सुकुन देने वाली है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर एक ऐसे गुरु की कहानी, जिसने बिना किसी आंदोलन अथवा शोर-शराबे के अपने शिष्य के जीवन में बदलाव की पहल की है। कक्षा ग्यारहवीं में पढ़ने वाली आदिवासी समाज की छात्रा जयंती हांसदा हर दिन करीब 11 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जा रही थी। बच्ची के पास स्कूल जाने के लिए वाहन का किराया देने तक के पैसे नहीं थे। ऐसी विषम परिस्थिति में शिक्षिका अनुराधा कुमारी ने बच्ची को अपने घर में रहने की जगह दी। इस छोटे से प्रयास से अब एक गरीब परिवार की बेटी डॉक्टर बनने के सपने देख रही है।

Guru Purnima Special

बिष्टुपुर स्थित अपने आवास पर दोनों छात्राओं जयंती और सीता के साथ शिक्षिका अनुराधा कुमारी

दरअसल, छात्रा जयंती हांसदा सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड के मिरूडीह की रहने वाली है। इसने दसवीं तक की पढ़ाई बिष्टुपुर के साउथ पार्क स्थित सरदार माधो सिंह मेमोरियल गर्ल्स हाईस्कूल की। इसी दौरान छात्रा के पिता सुनाराम हांसदा का का निधन हो गया। परिवार के पास आय का कोई साधन नहीं था। मुश्किल हालात के बीच अपने मेहनत के बल पर पढ़ाई करते हुए जयंती ने मैट्रिक की बोर्ड परीक्षा में 79.8 फीसद अंक प्राप्त किया। छात्रा ने आगे की पढ़ाई के लिए साकची स्थित सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस में दाखिला कराया। जयंती को घर से स्कूल और स्कूल से घर जाने के लिए प्रतिदिन 70 से 80 रुपये की जरूरत थी। पैसे का इंतजाम नहीं होने पर वह पैदल स्कूल से घर आने-जाने लगी। इस बात की जानकारी मिलने पर सरदार माधो सिंह मेमोरियल गर्ल्स हाईस्कूल की शिक्षिका अनुराधा कुमारी ने छात्रा से संपर्क किया। कहा कि अगर वह चाहे तो बिष्टुपुर में उनके घर में रहकर अपनी पढ़ाई कर सकती है। जयंती के लिए यह मदद किसी सपने के पूरे होने जैसा था। जयंती ने अपनी शिक्षिका को बताया कि वह आगे चलकर चिकित्सक बनना चाहती है। अनुराधा के कहने पर जयंती ने एक कोचिंग संस्था की प्रतियोगी परीक्षा में भाग लिया। इसका फायदा यह हुआ कि जयंती को कक्षा 12 तक इस संस्था की फ्री कोचिंग की सुविधा मिल गई।

तैयारी के लिए मिल रहा समय

जयंती बताती हैं कि कक्षा 10 तक वह अपने गांव मिरूडीह से ऑटो के जरिए बिष्टुपुर पढ़ने के लिए आती थी। इसमें बहुत किराया लगता था। पिता के मौत के बाद वह बंद हो गया। 11 वीं में दाखिला लेने के बाद घर से स्कूल की दूरी और अधिक हो गई। सुबह उसे करीब दो घंटे पहले स्कूल के लिए घर से निकलता पड़ता था। स्कूल के वापस घर लौटते तक रात हो जाती थी। शिक्षिका की मदद से अब हर दिन करीब चार घंटे का समय बच रहा है। इस समय को वह अपनी परीक्षा की तैयारी में लगा रही हैं। जयंती बताती हैं कि अपने घर में रहने की जगह देने के साथ शिक्षिका उनकी आर्थिक मदद भी करती हैं। पिता की मौत के बाद मां की तबीयत भी बहुत बिगड़ गई थी। इसके इलाज में भी शिक्षिका ने मदद की।

शिक्षिका अनुराधा के आवास पर पढ़ाई करती छात्रा जयंती हांसदा

वेतन का एक हिस्सा गरीब बेटियों की शिक्षा पर कर रहीं खर्च

शिक्षिका अनुराधा कुमारी मूल रूप से चाईबासा की रहने वाली हैं। उनकी स्कूलिंग चाईबासा सेंट जेवियर गर्ल्स हाईस्कूल से हुई है। इसके बाद उन्होंने चाईबासा महिला कॉलेज से एमए और बीएड किया। साल 2019 में उन्हें बिष्टुपुर के साउथ पार्क स्थित सरदार माधो सिंह मेमोरियल गर्ल्स हाईस्कूल में कार्यरत हैं। अनुराधा कहती हैं कि वह अपनी सैलरी का कुछ हिस्सा गरीब और जरूरतमंद बेटियों की पढ़ाई पर खर्च करती हैं। वह जयंती के अलावा सरायकेला खरसावां जिले के कुलुपटांगा निवासी छात्रा सीता बोयपाई को भी अपने घर में रखकर पढ़ा रही हैं। इसके अलावा, स्कूल की अन्य छात्राओं की भी मदद करती हैं। किसी को किताब-कॉपी दिलाना, किसी को टिफिन दिलाना उन्हें अच्छा लगता है। उनके इस काम में उनके पति भी मदद करते हैं। अपने पति के प्रेरणा से ही वह सब कुछ कर पाती हैं।

माता-पिता ने पढ़ाने से किया इनकार, शिक्षिका बनीं सहारा

शिक्षिका के घर में रहकर पढ़ाई करने वाली दूसरी छात्रा सीता बोयपाई ने बताया कि वह अनुराधा मैडम की मदद से ही पढ़ रही है। दसवीं के बाद सीता के माता-पिता ने आगे पढ़ाने से मना कर दिया था। इसके बाद सीता ने अपनी परेशानी अनुराधा को बताई। उन्होंने सीता बोयपाई को अपने घर पर रहकर पढ़ाई करने की सुविधा दी। सीता बोयपाई का इस साल ग्रेजुएट कॉलेज में दाखिला कराया है। वह बीए प्रथम वर्ष की छात्रा है। सीता पढ़ाई के साथ-साथ सिलाई भी सीख रही है। अनुराधा को उम्मीद है कि यह दोनों बेटियां भविष्य में बेहतर करेंगी। अनुराधा का कहना है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की अवधारणा को पूरा करने का प्रयास कर रही हैं।

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