
फीचर डेस्क : जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए घरों और मंदिरों को सजाया जा रहा है। इस दौरान सुंदर चित्रों और मूर्तियों का विशेष महत्व होता है। हालांकि, आध्यात्मिक दृष्टि से किसी देवता के चित्र का केवल आकर्षक होना ही महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। चित्र का आकार, उसमें दर्शाया गया संपूर्ण स्वरूप और उसकी सात्त्विकता भी पूजा तथा साधना के अनुभव से जुड़ी हो सकती है।
पूजा का उद्देश्य ईश्वर के प्रति भाव जागृत करना और मन को आंतरिक शांति की ओर ले जाना है। जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप, मुरलीधर रूप और अन्य स्वरूपों के चित्र बड़ी संख्या में पूजा-स्थलों पर लगाए जाते हैं। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भगवान श्रीकृष्ण का पूर्ण स्वरूप दर्शाने वाला बड़ा चित्र साधक के आध्यात्मिक अनुभव को अधिक प्रभावी बना सकता है।
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के शोध दल द्वारा किए गए एक अध्ययन में भगवान श्रीकृष्ण के अलग-अलग आकार के चित्रों से संबंधित सकारात्मक आभा और सूक्ष्म ऊर्जा का परीक्षण किए जाने का दावा किया गया है। इस अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर चित्र के आकार और उसमें दर्शाए गए स्वरूप की पूर्णता को आध्यात्मिक अनुभव से जोड़कर देखा गया है।
भगवान श्रीकृष्ण के चित्र और आध्यात्मिक ऊर्जा पर अध्ययन
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के शोध दल ने भगवान श्रीकृष्ण के पांच अलग-अलग आकार के चित्रों का अध्ययन किया। ये चित्र विश्वविद्यालय से जुड़े साधक-कलाकारों द्वारा तैयार किए गए थे।
अध्ययन में सकारात्मक और नकारात्मक सूक्ष्म ऊर्जाओं का आकलन करने के लिए ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ नामक उपकरण का उपयोग किए जाने की जानकारी दी गई। विश्वविद्यालय के अनुसार अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि देवता के चित्र के आकार और उसमें दर्शाए गए स्वरूप की पूर्णता का सकारात्मक आभा पर किस प्रकार प्रभाव पड़ सकता है।
शोध के अनुसार चित्र का आकार बढ़ने के साथ सकारात्मक आभा में भी वृद्धि दर्ज की गई। भगवान श्रीकृष्ण के 2 × 3 इंच के चित्र में सकारात्मक आभा 7.2 मीटर दर्ज की गई, जबकि 14 × 19 इंच के चित्र में यह बढ़कर 21 मीटर बताई गई।
सबसे बड़े और पूर्ण स्वरूप वाले चित्र में अधिक सकारात्मक आभा का दावा
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष सबसे बड़े आकार के चित्र से जुड़ा बताया गया है। महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के अनुसार 20 × 27 इंच के चित्र में सकारात्मक आभा 220 मीटर से अधिक दर्ज की गई।
इस चित्र की विशेषता यह थी कि इसमें भगवान श्रीकृष्ण का चरणों तक संपूर्ण स्वरूप दर्शाया गया था। इसके विपरीत अध्ययन में शामिल पहले चार चित्रों में भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप घुटनों तक दिखाया गया था।
विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार चित्र का आकार बढ़ने के साथ-साथ देवता के संपूर्ण स्वरूप का चित्रण भी सकारात्मक ऊर्जा के व्यापक प्रक्षेपण से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, इस तरह के निष्कर्षों को महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के आध्यात्मिक अध्ययन और उसके अपने शोध दृष्टिकोण के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
देवता का पूर्ण स्वरूप और देवता-तत्त्व का आध्यात्मिक संबंध
अध्यात्म-शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार किसी देवी या देवता का चित्र उनके वास्तविक स्वरूप से जितना अधिक मेल खाता है, उसमें संबंधित देवता के तत्त्व को आकर्षित और प्रक्षेपित करने की क्षमता उतनी अधिक हो सकती है।
देवता के संपूर्ण स्वरूप में अंगों के साथ उनके पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र, आभूषण और अन्य पहचान से जुड़े तत्व भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इस मान्यता के अनुसार पूर्ण स्वरूप वाला चित्र साधक को उस देवता के प्रति अधिक गहरा भाव अनुभव करने और आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में सहायक हो सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार के रूप में माना जाता है। इसलिए उनके विभिन्न स्वरूप भक्तों के लिए पूजनीय हैं। फिर भी, चरणों तक संपूर्ण स्वरूप को दर्शाने वाले चित्र को आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक व्यापक अनुभव से जोड़कर देखा जाता है।
बाजार में मिलने वाले चित्रों और साधक-कलाकारों के चित्रों पर दावा
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार वर्तमान समय में बाजार में उपलब्ध देवताओं के कई चित्रों में संबंधित देवता-तत्त्व को आकर्षित और प्रक्षेपित करने की क्षमता सीमित हो सकती है।
विश्वविद्यालय के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में यह क्षमता लगभग 1 से 2 प्रतिशत तक हो सकती है, जबकि कुछ विशेष परिस्थितियों में इसके अधिक होने का दावा किया गया है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय से जुड़े साधक-कलाकारों द्वारा निर्मित चित्रों में 31 प्रतिशत तक देवता-तत्त्व आकर्षित करने की क्षमता होने का दावा किया गया है।
इसका कारण चित्र निर्माण के दौरान साधना और कलाकार के आध्यात्मिक भाव को बताया गया है। यह निष्कर्ष विश्वविद्यालय के आध्यात्मिक शोध और मान्यताओं पर आधारित है।
जन्माष्टमी पूजा में भगवान श्रीकृष्ण का चित्र चुनते समय क्या ध्यान रखें?
जन्माष्टमी के अवसर पर पूजा-स्थल के लिए भगवान श्रीकृष्ण का चित्र चुनते समय भक्त अपनी धार्मिक आस्था और पूजा परंपरा के अनुसार निर्णय ले सकते हैं। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से पूर्ण स्वरूप, सात्त्विक प्रस्तुति और भावपूर्ण चित्रण को महत्वपूर्ण माना जाता है।
बड़ा और चरणों तक संपूर्ण स्वरूप दर्शाने वाला चित्र केवल पूजा-स्थल की सजावट तक सीमित नहीं माना जाता। महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के दृष्टिकोण के अनुसार ऐसा चित्र पूजा और ध्यान के दौरान आध्यात्मिक अनुभव को प्रभावित करने की क्षमता रख सकता है।
जन्माष्टमी पर पूर्ण स्वरूप वाले चित्र का आध्यात्मिक महत्व
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का प्रमुख पर्व है। इस अवसर पर पूजा, भजन, कीर्तन और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का स्मरण किया जाता है। पूजा-स्थल पर स्थापित भगवान श्रीकृष्ण का चित्र भक्त के भाव और श्रद्धा का केंद्र बनता है।
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार बड़े आकार, पूर्ण स्वरूप और सात्त्विकता से युक्त चित्र को सकारात्मक आध्यात्मिक स्पंदनों के अधिक व्यापक प्रक्षेपण से जोड़ा गया है।
इस जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के चित्र का चयन करते समय उसके आकार और कलात्मक सुंदरता के साथ उसके पूर्ण स्वरूप और सात्त्विक प्रस्तुति को भी ध्यान में रखा जा सकता है। धार्मिक आस्था के अनुसार ऐसा चित्र पूजा के वातावरण को अधिक श्रद्धापूर्ण बनाने और साधना के दौरान एकाग्रता तथा भाव जागृत करने में सहायक हो सकता है।

