
रांची : प्रशासनिक स्तर पर होने वाली गलतियों की सजा आखिरकार कर्मचारियों को क्यों दी जाए? झारखंड हाईकोर्ट ने इस अहम सवाल का जवाब देते हुए विधानसभा सचिवालय में कार्यरत 23 कर्मचारियों के हक में एक बहुत ही राहत भरा फैसला सुनाया है। अदालत ने विधानसभा सचिवालय के उस फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें 100 की जगह 97 अंकों की परीक्षा होने का हवाला देकर पूरी परीक्षा और कर्मचारियों के प्रोमोशन को रद्द कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने इस कार्रवाई को पूरी तरह से मनमाना, कानून के खिलाफ और अनुचित करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि 13 अक्टूबर 2025 का परीक्षा रद्द करने वाला फैसला तत्काल प्रभाव से खत्म किया जाता है और सभी 23 कर्मचारियों को जूनियर सेक्रेटेरिएट असिस्टेंट के पद पर बहाल माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला
बात अगस्त 2025 की है, जब विधानसभा सचिवालय में काम कर रहे ग्रेड-IV कर्मचारियों को जूनियर सेक्रेटेरिएट असिस्टेंट बनाने के लिए प्रोमोशन की प्रक्रिया शुरू हुई। 14 सितंबर को परीक्षा हुई और 16 सितंबर को रिजल्ट भी आ गया। पास होने वाले कर्मचारियों को 3 अक्टूबर 2025 को प्रोमोशन दे दिया गया और ज्यादातर कर्मचारियों ने अपने नए पदों पर काम भी संभाल लिया। लेकिन कहानी में मोड़ 13 अक्टूबर को आया।
विधानसभा के उप सचिव ने एक आदेश जारी किया कि परीक्षा में कुछ तकनीकी कमियां थीं, इसलिए इसे रद्द किया जाता है। नतीजा यह हुआ कि जिन कर्मचारियों को प्रोमोशन मिला था, उन्हें जबरन फिर से उनके पुराने निचले पद (ग्रेड-IV) पर भेज दिया गया।
97 अंकों के विवाद में फंसा पेच
अदालत में विधानसभा की तरफ से यह दलील दी गई कि परीक्षा का प्रश्नपत्र 100 अंकों का होना चाहिए था, लेकिन गलती से 97 अंकों का ही सेट हो गया। इस तकनीकी गड़बड़ी की वजह से पूरी परीक्षा की वैधता पर सवाल उठते हैं, इसलिए इसे रद्द करना पड़ा।
दूसरी तरफ, कर्मचारियों का कहना था कि जब प्रश्नपत्र 97 अंकों का था, तो यह नियम सभी परीक्षार्थियों पर एक समान लागू हुआ। परीक्षा में न तो कोई धांधली हुई, न ही किसी को इसका अलग से फायदा मिला। फिर सिर्फ विभाग की एक छोटी सी गलती के कारण उनका प्रोमोशन क्यों छीना गया?
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया। जज ने कहा कि सबके लिए नियम बराबर है । परीक्षा 97 अंकों की भले ही हुई हो, लेकिन यह सभी अभ्यर्थियों के लिए समान थी। इससे किसी के साथ भेदभाव नहीं हुआ।
कर्मचारियों की कोई गलती नहीं
प्रश्नपत्र सेट करने या अंक तय करने की जिम्मेदारी विभाग की थी, इसमें कर्मचारियों का कोई कसूर नहीं था। प्रोमोशन देने और काम संभालने के बाद कर्मचारियों को निचले पद पर भेजना एक तरह से उनके पद को घटाना है। ऐसा फैसला बिना कर्मचारियों का पक्ष सुने या नोटिस दिए नहीं लिया जा सकता।
8 हफ्ते के भीतर सभी फायदे देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि इन सभी 23 कर्मचारियों को 3 अक्टूबर 2025 से ही उनकी सेवा में निरंतर माना जाए और आठ हफ्तों के भीतर उनसे जुड़े सभी एरियर और प्रशासनिक कागजी औपचारिकताएं पूरी की जाएं। कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब विधानसभा सचिवालय को कर्मचारियों का बकाया लाभ जल्द से जल्द देना होगा।
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