
रांची :झारखंड के हजारों पारा शिक्षकों (सहायक अध्यापकों) के पक्ष में हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के उस मनमाने फैसले को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके तहत इन शिक्षकों को सेवा से बेदखल कर दिया गया था। अदालत के इस रुख से सालों से सेवा दे रहे अध्यापकों को बड़ी राहत मिली है।
जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने देवघर, दुमका, हजारीबाग, पूर्वी सिंहभूम और साहिबगंज के शिक्षकों द्वारा दाखिल 11 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने साफ किया कि जब वर्ष 2003 से 2006 के बीच इन शिक्षकों की बहाली हुई थी, तब न्यूनतम योग्यता मैट्रिक थी। सभी शिक्षक इस शर्त को पूरा करते थे। ऐसे में दो दशक तक सेवा लेने के बाद बाद की शैक्षणिक योग्यताओं से जुड़े विवाद को आधार बनाकर किसी को काम करने से नहीं रोका जा सकता।
8 हफ्ते के भीतर बकाया मानदेय देने का आदेश
अदालत ने निर्देश दिया है कि संबंधित शिक्षकों को सहायक अध्यापक के रूप में काम जारी रखने दिया जाए। इसके साथ ही अगस्त 2024 से रोके गए उनके पूरे वेतन व मानदेय का भुगतान आठ हफ्ते के भीतर पूरा किया जाए।
हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद का डिग्री विवाद
सरकार की ओर से ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद’ की इंटरमीडिएट डिग्री पर सवाल उठाए गए थे। इस पर अदालत ने 2012 के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस समय डिवीजन बेंच ने इस डिग्री को मान्यता दी थी और सरकार ने इसे लागू भी किया था। जब वह फैसला अंतिम हो चुका था, तो सालों बाद उसी मुद्दे पर दोबारा कार्रवाई करना गलत है।
बिना प्रक्रिया सेवा समाप्त करना नियम विरुद्ध
हाईकोर्ट ने ‘झारखंड सहायक अध्यापक सेवा शर्त नियमावली 2021’ का जिक्र करते हुए कहा कि बिना किसी तय कानूनी प्रक्रिया के मानदेय रोकना या काम से हटाना ‘बड़ी सजा’ के दायरे में आता है। भले ही ये शिक्षक नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकते, लेकिन नियम लागू होने के बाद उनकी सेवा को इस तरह मनमाने ढंग से समाप्त नहीं किया जा सकता।
Read Also: JSLPS अभ्यर्थियों को झटका, हाई कोर्ट ने कहा- परीक्षा देने से नौकरी का अधिकार नहीं बनता

