रांची : डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान में ‘काव्य शिविर’ के दूसरे दिन दो सत्र आयोजित हुआ। पहले सत्र में डॉ माया प्रसाद ने महादेवी का वाग्वैशिष्ट्य और निराला की गीति योजना पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि महादेवी ने अपनी कविताओं में अपने जीवन अनुभव और वेदना की अभिव्यक्ति जिस विशेषता से की है उसने स्त्री चेतना और अधिकारों को अभिव्यक्ति दी है। निराला ने गीति काव्य के द्वारा छायावादी काव्य को एक नई ऊंचाई दी है। वक्ता राही डूमरचीर ने ‘शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में बिंब विधान’ पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि शमशेर की कविताओं की एक बड़ी विशेषता उनका बिंब विधान है। शमशेर जितने कलात्मक है उतने ही सामाजिक रूप से सचेत कवि भी हैं। शमशेर की कविताओं में बिंब की निर्मिति ही नहीं है बल्कि बिंब की निरंतरता बनी रहती है।

डॉ पंकज मित्र ने ‘कविता में प्रतीक और बिंब विधान’ पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि कविता में बिंब और प्रतीक के सटीक प्रयोग उसकी प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं। कवि बिंब और प्रतीक के माध्यम से अपनी बात सरलता से कह पाता है। वहीं दूसरे सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ सुजाता ने स्त्रीवादी सौंदर्य-शास्त्र पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक परंपरा से स्त्रियों को हमेशा बाहर रखा गया। लेखन में भी हम देखते हैं कि एक खास प्रकार की पुरुष दृष्टि है। उन्होंने बताया कि स्त्रीवादी सौंदर्य-शास्त्र ने मौखिक परंपरा को महत्व दिया है। तमाम लोकगीतों को स्त्री विमर्श का हिस्सा समझना चाहिए।
75 प्रतिभागी हुए शामिल
इतिहास में जाकर छूटी हुई चीजों को लाना और स्त्रीवादी सौंदर्य दृष्टि की पहचान आज के समय में जरूरी है। स्त्रीवादी दृष्टि की शुरुआत मीरा के पहले थेरी गाथाओं और वैदिक परंपराओं तक हमें वापस ले जाती है। वक्ता डॉ सुधीर सुमन ने अनामिका, नीलेश रघुवंशी और सविता सिंह की कविताओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि तीनों ही कवयित्रियां स्त्री की आकांक्षा और उसके सपनों के लायक दुनिया की बात करती हैं लेकिन तीनों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। इस शिविर में 75 प्रतिभागी उपस्थित रहे।

