
चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिले के गोइलकेरा में स्थित प्रसिद्ध ‘महादेवशाल मंदिर आज श्रद्धा और विश्वास का बड़ा केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां भगवान शिव के एक ही खंडित शिवलिंग के दो हिस्सों की पूजा दो अलग-अलग जगहों पर की जाती है।
रेल लाइन की खुदाई में प्रकट हुआ था शिवलिंग
मंदिर का इतिहास 19वीं सदी के मध्य से जुड़ा है। उस समय बंगाल-नागपुर रेलवे कोलकाता से मुंबई के बीच रेल लाइन बिछाने का काम चल रही थी। गोइलकेरा के बड़ैला गांव के पास खुदाई के दौरान जमीन से अचानक एक शिवलिंग निकला। शिवलिंग देखकर काम कर रहे मजदूरों की आस्था जाग उठी। उन्होंने तुरंत काम रोक दिया और आगे खुदाई करने से मना कर दिया।
ब्रिटिश इंजीनियर के प्रहार से टूटा शिवलिंग
स्थानीय किवदंतियों के अनुसार, तब के ब्रिटिश इंजीनियर रॉबर्ट हेनरी ने इसे अंधविश्वास कहकर टाल दिया। गुस्से में उसने फावड़े से शिवलिंग पर जोरदार वार किया, जिससे शिवलिंग दो टुकड़ों में बंट गया।कहा जाता है कि उसी शाम काम से लौटते वक्त इंजीनियर की अचानक मौत हो गई। इस रहस्यमयी घटना के बाद मजदूरों और ग्रामीणों में दहशत फैल गई। लोगों के विरोध और धार्मिक भावनाओं को देखते हुए ब्रिटिश अफसरों को रेल लाइन का रूट बदलना पड़ा। इसके लिए पहाड़ियों को काटकर दो सुरंगें भी बनाई गईं।
अब दो जगहों पर होती है पूजा
जहां से शिवलिंग निकला था, आज वहां भव्य महादेवशाल मंदिर बना है। शिवलिंग का बड़ा हिस्सा मंदिर के गर्भगृह में स्थापित है। वहीं शिवलिंग का दूसरा छोटा टुकड़ा यहां से करीब 2 किमी दूर रतनबुरू पहाड़ी पर स्थित है। वहां वह ग्राम देवी मां पाउड़ी के साथ विराजमान है। मान्यता है कि फावड़े के वार के बाद वह हिस्सा उछलकर वहां पहुंच गया था। परंपरा के अनुसार श्रद्धालु पहले महादेवशाल में दर्शन करते हैं, फिर मां पाउड़ी का आशीर्वाद लेने रतनबुरू जाते हैं। हालांकि आमतौर पर खंडित मूर्ति की पूजा नहीं होती, लेकिन इस शिवलिंग के प्रति लोगों की आस्था अटूट है।स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। इसी कारण दूर-दराज से भक्त महादेवशाल पहुंचकर बाबा का आशीर्वाद लेते हैं।
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