
चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोवामुंडी प्रखंड अंतर्गत पेटेएता पंचायत के बुरुसाई टोला में एक बार फिर घर वापसी का मामला सामने आया है। यहां एक परिवार ने ईसाई धर्म का त्याग कर स्वेच्छा से आदिवासी हो समाज की प्राचीन परंपरा और सरना धर्म में दोबारा आस्था जताई है।
मिली जानकारी के अनुसार, करीब 35 वर्षीय टुपरा पुरती ने अपने चार सदस्यीय परिवार के साथ बुधवार की शाम पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच सरना धर्म में वापसी की। शुद्धिकरण अनुष्ठान से पहले टुपरा ने ग्रामीणों के सामने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि लगभग चार महीने पहले उनके घर में बीमारी ने डेरा डाल लिया था। लगातार इलाज और पारंपरिक पूजा-पाठ कराने के बाद भी जब स्वास्थ्य लाभ नहीं मिला, तो मजबूरी में उन्होंने धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म अपना लिया था। हालांकि, चार महीने के भीतर ही उन्हें यह अहसास हुआ कि उनकी असली शांति और पहचान अपनी मूल संस्कृति में ही है, जिसके बाद उन्होंने घर लौटने का पक्का निर्णय लिया।
पारंपरिक अनुष्ठान के साथ हुई घर वापसी
बुरुसाई टोला निवासी टुपरा पुरती ने अपनी पत्नी 32 वर्षीया शंकरी पुरती, 9 वर्षीया पुत्री सुनिका पुरती, 5 वर्षीया पुत्री बसंती पुरती और 1 वर्ष के पुत्र लक्ष्मण पुरती के साथ पूरे विधि-विधान से वापसी की।
मान्यताओं के अनुसार संपन्न कराई गई शुद्धिकरण की प्रक्रिया
गांव के पुजारी सुखराम पुरती ने हो समाज की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार शुद्धिकरण की प्रक्रिया संपन्न कराई। घर के आंगन में लाल मुर्गे की बलि देकर धार्मिक विधि से शुद्धि अनुष्ठान पूरा किया गया। इस दौरान पेटेएता के ग्रामीण मुंडा बिरसा पुरती, लम्पाहेस्सा के मुंडा विभीषण लागुरी और आदिवासी हो समाज युवा महासभा के तमाम पदाधिकारी प्रमुख रूप से मौजूद रहे। अनुष्ठान के बाद परिवार ने प्रकृति पूजा और अपनी मूल संस्कृति के साथ जीवन बिताने का संकल्प दोहराया। वहीं, गांव के लोगों ने भी उनके इस फैसले का खुले दिल से स्वागत करते हुए सामाजिक सहयोग का भरोसा दिया।
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और कुरीतियां बन रही हैं धर्मांतरण का कारण : गब्बरसिंह हेम्ब्रम
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए आदिवासी हो समाज युवा महासभा के राष्ट्रीय महासचिव गब्बरसिंह हेम्ब्रम ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समाज में अब जागरूकता तेजी से फैल रही है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में डायन-प्रथा, ओझा-गुनी और झाड़-फूंक जैसी सामाजिक कुरीतियों के कारण लोग मानसिक रूप से परेशान रहते हैं। इसके अलावा गांवों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी के कारण कई बार लोग मजबूरी में धर्मांतरण के मार्ग पर चले जाते हैं। उन्होंने तमाम सामाजिक संगठनों से आह्वान किया कि वे आगे आएं और अपनी मूल संस्कृति, भाषा और पहचान के संरक्षण के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं।
इस पुनर्मिलन और शुद्धिकरण कार्यक्रम में मुख्य रूप से जगन्नाथपुर अनुमंडल अध्यक्ष बलराम लागुरी, उपाध्यक्ष पुतकर लागुरी, कार्यकारिणी सदस्य राजेंद्र हेम्ब्रम सहित क्षेत्र के कई गणमान्य ग्रामीण उपस्थित रहे।

