Jharkhand Bureaucracy : गुरु कुछ बेचैन थे। किसी ने कान फूंक दिया था। पूजा का ‘फल’ मिलने वाला है। सिस्टम में फिर ‘सिंघम’ बनने की जोर-जुगत लगाई जा रही है। गुरु को यह बात हजम नहीं हुई। कृष्ण जन्मस्थान पर साधना और ऐसा चमत्कार? गुरु को यह कतई बर्दाश्त नहीं था। लिहाजा, सामने पड़ते ही दर्द की पोटली खोल दी। बताओ यार! यह तो हद है। भला ऐसा कोई करता है। जिस ज्वालामुखी के लावा से धरती लाल हो गई, फिर वहीं आशियाना बनाने की जिद। अब तक गुरु की गोल-गोल बातें आधी-अधूरी ही पल्ले पड़ रही थीं।
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पूरी कहानी तक पहुंचने के लिए धैर्य बनाए रखने की जरूरत थी। गुरु ने बात जारी रखी। कहा- अति महत्वाकांक्षा हमेशा भारी पड़ती है। क्या भूल गए वह दिन जब उस कालखंड का प्रवर्तन हुआ था? एक के बाद एक गले में ऐसी फांस कसी कि पूरी नौकरशाही हिल उठी। क्या मैडम, क्या हुक्मरान, सब कोठरी तक पहुंच गए। बड़े-बड़े नाम अर्श से सीधे फर्श पर आ गए। कितनी कठिनाई में दिन और रातें कटीं, यह भोगने वाले की अंतरात्मा जाने। फिलहाल राहत जरूर है, लेकिन शिकंजा पूरी तरह छूटा नहीं है।
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बावजूद पुरानी गलती दोहराने की कवायद हो रही है। इन्हें फिर वहीं सब चाहिए। वैसा ही काम, वही रुतबा और वही ऑफिस…। गुरु का दर्द दूर करने के लिए पूछ लिया, ‘क्या हुआ गुरु साफ-साफ बताइए’ गुरु बोले- एक मैडम को फिर ख्वाब आ रहे हैं। गोलबंदी शुरू हो गई है। बालू, पत्थर मिलाकर महल खड़ा करने का सपना है। दरअसल, गुरु नहीं चाहते थे, फिर माहौल बिगड़े।
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बात कोर्ट-कचहरी और गवाही तक पहुंचे। लिहाजा अनिष्ट की आशंका से उद्वेलित हो गए थे। ढांढ़स बंधाते हुए कहा- सिस्टम से गलती नहीं होगी गुरु। काहे परेशान हुए जा रहे हैं? गुरु बोले- महोदय यही सिस्टम पहले गच्चा खा चुका है। हम नहीं चाहते कि फाइल लेकर फिर दौड़ लगे। ऐसे में अगर मौजूदा दौड़ नहीं थमी तो परिणाम यथावत आ सकते हैं।
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यह समझ आनी चाहिए कि संकट टला नहीं है। नजर, नजरिया और हालात एक जैसे हैं। खदान में घुसने पर हाथ काले होने का अंदेशा है। बेहतर होगा, ख्वाब को अमलीजामा पहनाने की कसरत बंद करें। फिलहाल कमान काबिल हाथों में है। व्यवस्था में शांति बनी रहे। इसी में सबकी भलाई है। गुरु थोड़े शांत लग रहे थे। सान्निध्य से तनाव बढ़ने का डर था। लिहाजा हाथ जोड़े और दरबार से निकल पड़ा। मन-मस्तिष्क में एक के बाद एक शब्द कौंध रहे थे। पूजा, फल, कसरत, महत्वाकांक्षा…।

