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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : सुरंग की तलाश

Jharkhand Bureaucracy : वनांचल के एक जनपद में इन दिनों प्रशासनिक गलियारे में एक अजीब सी बेचैनी पसरी है। बेचैनी का कारण कोई योजना नहीं, कोई रणनीति नहीं और न ही किसी मंत्री का दौरा है। चिंता यह है कि आखिर सरकारी कामकाज से जुड़ी बातें बाहर कैसे पहुंच रही हैं? हुजूर शक के आधार पर सबको सबक सिखाने की हुंकार भर रहे हैं। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानिए द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से…।

by Dr. Brajesh Mishra
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Jharkhand Bureaucracy : गुरु की महफिल जमी थी। बरसों पुरानी फिल्म शोले का प्रसंग चल रहा था। कथा अंग्रेजों के जमाने के जेलर वाली थी। चर्चा के केंद्र में थी जेल में सुरंग की खोज। गुरु अपने हिसाब से समझा रहे थे। कहा- जेलर साहब को लगता था कि जेल के कैदी साजिश कर रहे हैं। जेल से फरार होने की योजना बना रहे हैं। कहीं न कहीं कोई सुरंग खोदी जा रही है। बेचारे पूरी फौज लेकर निकल पड़ते। कभी बैरक के नीचे तलाश, कभी दीवारों की जांच, कभी कैदियों की निगरानी।

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हर बार नतीजा शून्य। शक के आधार पर सबूत खोजने में हाथ तक जल गए। जिन कैदियों को जेल ब्रेक कर निकलना था, चकमा देकर निकल गए। कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों वनांचल के लाल पानी वाले जनपद के बड़े साहब का है। साहब को विश्वास है कि प्रशासनिक महकमे में चलनेवाली चर्चाओं से जुड़ी बातें रहस्यमयी रास्ते से बाहर पहुंच रही हैं। अब साहब का पूरा इंटेलिजेंस यह जानने में लगा है कि आखिर वह रास्ता कौन सा है?

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गुरु बता रहे थे कि पहला शक बाबुओं पर गया। फिर कंप्यूटर ऑपरेटरों पर। नजरें उन अधिकारियों पर टिकी रहीं, जो बैठक में सबसे ज्यादा सिर हिलाते हैं। कुछ दिन बाद शक की सुई उनपर भी पहुंच गई, जो बैठक के दौरान चाय परोसते हैं। इतनी फील्डिंग खटने के बाद भी सूचना लीक का स्रोत नहीं मिला। अब तक मामला उतना ही रहस्यमय है, जितना शोले वाले जेल की सुरंग के मामले में था। जनपद के गलियारों में चर्चा है कि पथरीली जमीन का अनुभव लेकर आए साहब को किसी पर विश्वास नहीं।

लिहाजा अपने स्तर से ‘ऑपरेशन सुरंग’ शुरू कर दिया है। अलग-अलग लोगों को अलग-अलग सूचनाएं दी जा रहीं। यह जानने-समझने की ट्रिक लगाई जा रही है कि चारे के रूप में ‘फेंकी’ गई सूचनाओं में कौन सी बाहर पहुंच रही हैं? मुश्किल यह है कि खबरें बाहर पहुंचने के साथ-साथ भीतर भी लौट आती हैं। इससे शक का दायरा और बड़ा हो जा रहा है। उलझन सुलझ नहीं रही है।

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गुरु बताते हैं कि सरकारी दफ्तरों में सूचना का प्रवाह नदी की तरह होता है। बांधने की जितनी कोशिश की जाए, वह उतने ही नए-नए रास्ते खोज लेती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां नदी दिखाई नहीं देती, सिर्फ उसकी लहरें अखबारों और सोशल मीडिया पर हिलोरें मारती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिले के कुछ पुराने खिलाड़ी अब इस पूरे घटनाक्रम का आनंद ले रहे हैं। वे हर नई बैठक के बाद यह अनुमान लगाने का खेल खेलते हैं कि अगली बार साहब के शक की सुई किसकी ओर घूमेगी।

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किसी का दावा है कि अगली सूची में अनुभाग अधिकारी होंगे, तो कोई यह अंदाजा लगा रहा है कि तकनीक के इस युग में दोष अंततः मोबाइल फोन पर ही मढ़ दिया जाएगा। हालत यह हो गई है कि साहब को हर ओर सुरंग ही सुरंग नजर आ रही है। गुरु की मानें तो असली समस्या सुरंग नहीं, सुरंग का भ्रम है। जब हर तरफ सुरंग ही दिखाई देने लगे तो दीवारें भी संदिग्ध लगने लगती हैं। फिर हर कर्मचारी संभावित सुरंग खोदनेवाला और हर फाइल संभावित खोदाई स्थल बन जाती है। फिलहाल सुरंग की तलाश जारी है। जेलर साहब की तरह बड़े साहब भी पूरी गंभीरता से खोज अभियान में जुटे हैं। अब देखना यह है कि सुरंग मिलती है या शक का कोई अगला अध्याय शुरू होगा।

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