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दिलीप रॉय (राजेश खन्ना) एक नामी पेंटर है और उसकी पत्नी सुषमा (अल्का) काफी अमीर है। एक दिन पार्टी में जाने को लेकर दिलीप और सुषमा में बहस होती है और गुस्से में घर से बाहर गया दिलीप जब घर लौटता है तो पता चलता है कि सुषमा की हत्या हो चुकी है।
सुषमा की बहन रेणु (बिंदू) की गवाही पर दिलीप को कातिल मान पुलिस द्वारा पकड़ लिया जाता है पर इससे पहले कि दिलीप पर कत्ल के मुकदमे की सुनवाई पूरी कर अदालत अपना फैसला सुना पाती, दिलीप को अदालत में पागलपन का एक जबरदस्त दौरा पड़ता है और मुकदमे की सुनवाई रोक कर दिलीप को इलाज के लिए पागलखाने भेज दिया जाता है।
पागलखाने में दिलीप का इलाज डॉ त्रिवेदी (गजानन जागीरदार) कर रहे होते हैं। डॉ त्रिवेदी से दिलीप की मानसिक स्थिति का जायजा लेने अस्पताल पहुंचते हैं, सरकारी वकील मिस्टर खन्ना (मदन पुरी)। दिलीप का केस देख रहे इन्स्पेक्टर दीवान (सुजीत कुमार) भी उसी समय अस्पताल पहुंचे हुए हैं। ये सभी मिल कर दिलीप की मानसिक हालत का अंदाज लगाने की गरज से उससे बात करने की कोशिश करते हैं।

ऊलजलूल – उलझी हुई बातें कर के सभी को दुविधा में डालकर, दिलीप मौका पा कर इन्स्पेक्टर दीवान की पिस्तौल छीन लेता है और उस तूफ़ानी रात को अस्पताल से भाग जाता है। अस्पताल से भाग कर दिलीप जा पहुंचता है जगमोहन के घर। जगमोहन घर पर नहीं, घर पर उसकी पत्नी रेखा(नंदा) रहती है। रेखा को डरा-धमका कर दिलीप उसके घर में छिप जाता है।
रेखा का पति किंग्स एण्ड किंग्स नामक कंपनी में एक सेल्स इग्ज़ेक्यूटिव है और काम के सिलसिले में अक्सर घर से बाहर रहता है और रेखा बताती है कि काम के सिलसिले में वो अभी कलकत्ता गया हुआ है। फिल्म के सभी मुख्य किरदार इन्स्पेक्टर दीवान, डॉ त्रिवेदी सभी रेखा के घर आते हैं और उसे समझा कर जाते हैं कि रेडियो पर शायद उसने ये घोषणा सुनी हो कि अपनी बीवी की हत्या का आरोपी पागलखाने से भाग गया है और उसी इलाके में देखा गया है इसलिए सचेत रहे। यह भी एक इत्तेफाक ही है कि रेखा और जगमोहन से डॉ त्रिवेदी पहले से परिचित रहते हैं।
शुरुआत में मर्डर मिस्ट्री लगती फिल्म अचानक से एक होस्टेज सर्वाइवल फिल्म लगने लगती है क्योंकि रेखा, दिलीप से छुटकारा पाना चाहती है और लगता है कि बारिश की इस रात में रेखा के घर में छिपे दिलीप से शायद ही उसे छुटकारा मिले। अभी डॉ त्रिवेदी के आने का मामला निपटता भी नहीं कि रेखा की पड़ोसन बसंती (शम्मी) उसके घर आ जाती है। उसके जाने के बाद रेखा और दिलीप आपस में संवाद करते हैं और इस संवाद में दिलीप रेखा को यह समझाने की कोशिश करता है कि वो जल्द वहाँ से चला जाएगा और रेखा को उससे घबराने की जरूरत नहीं।
उसकी बातों से प्रभावित रेखा उसे सोने के लिए साफ बिस्तर, पीने के लिए विस्की और सिगरेट देती है। रेखा, दिलीप को अपने वैवाहिक जीवन के खालीपन के बारे में बताती है और उसे अपने विश्वास में लेती है। जब थोड़ी रात गहराने पर दिलीप को नींद आने लगती है तो रेखा मुख्य द्वार की चाभी चुरा कर भागने की कोशिश करती है पर आहट से दिलीप की आँख खुल जाती है और पकड़ी जाने के भय से रेखा घर में छिप जाती है।
रेखा को खोजने के क्रम में दिलीप को रेखा के बाथरूम में एक लाश दिखाई देती है और वो लाश देख कर चिल्लाने लगता है और अचानक हुए इस हल्ले गुल्ले को सुन कर इलाके में गश्त कर रहा इन्स्पेक्टर दीवान रेखा के घर आ पहुंचता है। इन्स्पेक्टर दीवान के जाने के बाद, जब दिलीप रेखा पर कत्ल का आरोप लगाता है कि उसने अपने पति को मार कर बाथरूम में छिपा रखा है तो रेखा उसे साफ-सुथरा बाथरूम दिखाती है और उसे उसका वहम बताती है। रेखा दिलीप को सांत्वना देती है और समझाती है कि ऐसा सबकुछ उसकी दिमागी हालत की वजह से हो रहा है।
इधर सीआईडी इन्स्पेक्टर कर्वे (इफ्तेखार) जो सुषमा की हत्या की जांच कर रहे हैं उन्हें सुषमा की हत्या के मामले में कुछ महत्वपूर्ण सुराग मिलते हैं और दिलीप के घर से वो रेखा के घर तब पहुँच जाते हैं जब, अपने विश्वास पर टिका दिलीप खुद पुलिस से रूबरू होकर इत्तेफाकों के इस सिलसिले को समझने की कोशिश करता है । जगमोहन की हत्या हुई थी या नहीं, हुई थी तो किसने की थी, नहीं हुई थी तो बाथरूम में लाश किसकी थी, सुषमा का हत्यारा वाकई दिलीप था या कोई और ये सारे राज, ये सारी गुत्थियाँ फिल्म के आखिरी हिस्से में खुल जाते हैं, अंत क्या था इसके लिए पाठक फिल्म देखें तो बेहतर होगा क्योंकि इत्तेफाकों के सिलसिले की समाप्ति भी इत्तेफाक से ही होती है।
साल 1969 में आई फिल्म इत्तेफाक इस अर्थ में एक साहसिक प्रयोग थी कि फिल्म में कोई गाना नहीं था पर क्योंकि 1962 में लिखे मोंटे डोएल के नाटक ‘साइनपोस्ट टू मर्डर’ पर 1965 में इसी नाम की एक सफल फिल्म बन चुकी थी और बी आर फिल्म्स इससे पहले नौजवान, मुन्ना और कानून नाम की तीन, बिना गानों की, फिल्में पहले बना चुका था, इसलिए निर्माता बी आर चोपड़ा ने अपने भाई निर्देशक यश चोपड़ा पर भरोसा दिखाया। इत्तेफाक को भारतीय सिनेमा इतिहास की पहली इन्टरवल या मध्यांतर रहित फिल्म माना जाता है।
जी आर कामथ की पटकथा, अख्तर उल ईमान के संवादों से सजी इस फिल्म के निर्माता बी आर चोपड़ा और निर्देशक उनके अपने भाई यश चोपड़ा थे। यूं तो फिल्म में कोई गाना नहीं था, पर फिल्म का संगीत सलिल चौधरी ने दिया और छायांकन किया मशहूर छायाकार के जी कोरेगाओंकर ने। फिल्म का सम्पादन एस.बी. माने ने किया और शम्मी(बसंती), इफ्तेखार(इन्स्पेक्टर कर्वे), जगदीश राज (इन्स्पेक्टर खान), अमृत जैसे सह-कलाकारों ने समर्थ अभिनय किया। आज के दौर के मशहूर फिल्म कलाकार शरमन जोशी के पिता अरविन्द जोशी जो गुजराती रंगमंच के बड़े कलाकार माने जाते हैं, फिल्म से बतौर सहायक निर्देशक जुड़े थे। अरविन्द जोशी ने हिन्दी की कुछ एक फिल्मों में शौकिया चरित्र भूमिकाएँ भी की पर उनकी असली पहचान गुजराती सिनेमा और गुजराती रंगमंच से है ।
फिल्म राजेश खन्ना की सत्रह लगातार हिट फिल्मों की कड़ी की एक फिल्म थी और साल 1969 के फिल्म फेयर पुरस्कारों में इत्तेफाक को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (यश चोपड़ा) और सर्वश्रेष्ठ साउन्ड (एम. ए. शेख) का पुरस्कार मिला । फिल्म के तीन मुख्य कलाकार राजेश खन्ना (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता), नंदा (सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री) और बिंदू (सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री) भी पुरस्कारों की अपनी अपनी श्रेणियों के लिए नामांकित हुए। फिल्म में गीत नहीं थे पर फिल्म का बैकग्राउन्ड म्यूजिक या पार्श्व संगीत काफी दमदार था और फिल्म की गति को समय समय पर आवश्यक मजबूती प्रदान करता है।
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फिल्म की कहानी, अदाकारों का अभिनय और गति सब बेहतरीन हैं, उस दौर में मिस्ट्री श्रेणी की फिल्मों का मूल्यांकन करते हुए आलोचक निओ – नॉइर प्रभाव के कोण से फिल्मों को जरूर देखा करते हैं, इत्तेफाक में निओ नॉइर फिल्मों के तत्व भले थोड़े कम हों पर स्टॉकहोम सिन्ड्रोम और रोशमोन प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।
फिल्म में यह देख कर कि रेखा को कई बार ऐसे अवसर मिलते हैं कि वो आसानी से भाग कर जा सकती थी या दिलीप को पकड़वा सकती थी पर कहानी में इन अवसरों को रेखा ने जानकार छोड़ दिया या उससे छूट गए यह भी दर्शक अंत में समझ लेता है। फिल्म में एक दो अवसरों पर एक अच्छे गीत की कमी खलती है और अंत में जब सारे राज-फ़ाश होते हैं तो उस समय यदि फिल्म में थोड़ी अधिक भावनात्मकता (emotional intensity) होती तो और इत्तेफाक और बेहतर फिल्म हो सकती थी, लेकिन अपने समय में एक शानदार मर्डर मिस्ट्री के रूप में इत्तेफाक हमेशा याद की जाएगी।
फिल्म अमेज़न प्राइम और यूट्यूब पर देखने के लिए उपलब्ध है और यकीन जानिए फिल्म में शायद निर्माताओं ने इसीलिए कोई मध्यांतर नहीं रखा होगा क्योंकि फिल्म एक बार शुरू करके खत्म करने से पहले उठने का अवसर दर्शकों को नहीं देती है।

