
रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के कथित दहेज मांग मामले में कामाख्या नारायण तिवारी को निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा रद्द कर दी है। जस्टिस अरुण कुमार राय की अदालत ने कहा कि जिस कानूनी संशोधन के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया गया, वह घटना के दो वर्ष बाद 1986 में लागू हुआ था। ऐसे कानून को पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू कर किसी व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जो कथित घटना के समय अस्तित्व में ही नहीं था। कोर्ट ने पाया कि विवाह वर्ष 1979 में हुआ था और मोटरसाइकिल की कथित दहेज मांग वर्ष 1984 में विवाह के बाद की गई थी। जबकि दहेज निषेध अधिनियम में विवाह के बाद किसी भी समय दहेज मांग को अपराध मानने वाला संशोधन 19 नवंबर 1986 से प्रभावी हुआ था।
हाईकोर्ट ने कहा कि घटना के समय लागू कानून के अनुसार दहेज मांग तभी अपराध थी, जब वह विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के संबंध में की गई हो। मामले में किसी भी गवाह ने ऐसी मांग का उल्लेख नहीं किया। सभी गवाहों ने विवाह के बाद मोटरसाइकिल मांगने की बात कही। ऐसे में अभियोजन दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के आवश्यक तत्वों को सिद्ध नहीं कर सका।
मामले में अभियोजन का आरोप था कि मोटरसाइकिल की मांग पूरी नहीं होने पर विवाहिता शशि कुमारी को प्रताड़ित किया गया, जिसकी बाद में मृत्यु हो गई। हालांकि हत्या के आरोप से ट्रायल कोर्ट पहले ही आरोपी को बरी कर चुका था। केवल दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत छह माह के कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी, जिसे हाईकोर्ट ने अब निरस्त कर दिया।
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