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यात्रा वृतांत : जिस्पा : जहाँ बहुत कुछ कहते पहाड़

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
यात्रा वृतांत
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दिल्ली की आपाधापी, कंक्रीट की सघन दीवारों और थका देने वाले कोलाहल से दूर भागने की चाह जब भीतर गहराई तक उतर जाती है, तब हिमालय का मौन ही एकमात्र शरणस्थल प्रतीत होता है। एक उमस भरी शाम, जब शहर अपनी कृत्रिम रोशनी में जल रहा था, मन ने भीतर के सन्नाटे को सुनने की ठानी। गंतव्य तय था- लाहौल की गोद में बसा एक शांत, विस्मृत-सा कोना, जिस्पा।

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यात्रा की शुरुआत आधी रात को कश्मीरी गेट से हुई। बस जब दिल्ली की चौड़ी सड़कों को चीरती हुई हरियाणा के समतल खेतों में प्रविष्ट हुई, तब नींद और जागरण के बीच एक अजीब सा सम्मोहन था। खिड़की से बाहर केवल अंधेरा और यदा-कदा दिखने वाले ढाबों की पीली बत्तियां तैर रही थीं। चंडीगढ़ पार करते ही जब भोर की पहली किरण ने आसमान को छुआ, तो मैदान धीरे-धीरे ढलान में बदलने लगे थे। घुमावदार रास्तों के साथ ब्यास नदी का कलकल स्वर कानों में रस घोलने लगा। मनाली तक पहुंचते-पहुंचते चीड़ और देवदार के घने जंगलों ने स्वागत किया, किंतु यह तो केवल उस विशाल कैनवास की भूमिका मात्र थी जिसे प्रकृति आगे उकेरने वाली थी।

मनाली के पार रोहतांग के दुर्गम मोड़ों को लांघने के स्थान पर अब अटल टनल ने राह सुगम कर दी है। नौ किलोमीटर लंबी उस अंधेरी गुफा को पार करना किसी सामान्य सुरंग से गुजरना नहीं, बल्कि एक युग से दूसरे युग में प्रवेश करने जैसा था। दक्षिण छोर पर हरियाली, नम हवा और बादलों का डेरा था, किंतु जैसे ही टनल के उत्तरी छोर से बाहर निकले, दृश्य एकाएक बदल गया। सामने एक नितांत भिन्न संसार था- लाहौल का विस्तीर्ण, नग्न और उदात्त पठार। यहाँ हरियाली का आवरण हट चुका था; भूरी, स्लेटी और कहीं-कहीं ताम्रवर्णी विशाल चट्टानें अपने आदिम स्वरूप में खड़ी थीं। हवा में एक तीखा सूखापन था और धूप इतनी प्रखर कि पत्थरों की हर दरार स्पष्ट चमक रही थी।

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चंद्रा और भागा नदियों के संगम स्थल तांडी से होते हुए जब हमारी गाड़ी जिस्पा की ओर बढ़ी, तो भागा नदी हमारे समानांतर बहने लगी। उसका पानी मटमैले दूध जैसा, चट्टानों से टकराकर फेन उगलता हुआ आगे बढ़ रहा था। सूरज ढलने को था और पहाड़ों की छांव गहरी होने लगी थी। सड़क के किनारे बौद्ध प्रार्थना ध्वज- लुंगता- हवा के साथ तीव्र गति से फड़फड़ा रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो वे हवा के माध्यम से ब्रह्मांड को शांति और करुणा का कोई प्राचीन मंत्र भेज रहे हों।

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शाम के धुंधलके में जब हम जिस्पा पहुंचे, तो थकान की कोई परत चेहरे पर न बची। जिस्पा कोई भीड़-भाड़ वाला कस्बा नहीं है; यह तो भागा नदी के तट पर फैला हुआ कुछ घरों, खेतिहर जमीनों और विलो के पेड़ों का एक शांत झुरमुट है। लगभग 10,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह स्थान किसी तपस्वी की ध्यानस्थ मुद्रा जैसा शांत जान पड़ता है। यहाँ की हवा में एक विचित्र सी ठंडक थी, जो फेफड़ों में उतरते ही मन की सारी व्यग्रता को सोख लेती थी।

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रात जिस्पा में एक नदी किनारे बने छोटे से होमस्टे में बीती। मिट्टी और लकड़ी की खुशबू से महकते उस कमरे में स्थानीय लद्दाखी-लाहौली परिवार ने जो आतिथ्य दिया, उसने यात्रा के सारे कष्ट हर लिए। एक कोने में जलती हुई ‘बुखारी’ (पारंपरिक हीटर) की गर्माहट के बीच जब कांसा के प्याले में नमकीन ‘मक्खन वाली चाय’ (गुर-गुर चाय) की चुस्की ली, तो लगा कि जीवन की सादगी में ही सारा सौंदर्य निहित है। उस रात जब बाहर निकले, तो आकाश किसी जादुई छतरी जैसा प्रतीत हुआ। दिल्ली के धुंधले आसमान में जो तारे वर्षों से लुप्त थे, वे यहाँ लाखों की संख्या में चमक रहे थे। आकाशगंगा इतनी स्पष्ट थी मानो कोई चांदी की नदी काले कैनवास पर उंडेल दी गई हो। नदी के पत्थरों से टकराने की अनवरत ध्वनि उस सन्नाटे को और अधिक गहरा बना रही थी।

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अगली सुबह जिस्पा की धूप ने जगाया। वह धूप चुभती नहीं थी, बल्कि बर्फ़ीली हवा के बीच एक रेशमी स्पर्श जैसी लगती थी। सुबह-सुबह गाँव की पगडंडियों पर निकल पड़ा। खेतों में स्थानीय ग्रामीण काम में जुटे थे। मटर और जौ के छोटे-छोटे खेत पहाड़ों के विशाल रूखेपन के बीच पन्ना की तरह चमक रहे थे। महिलाओं के चेहरों पर धूप और ठंड से उपजी लालिमा थी, और उनकी मुस्कान में वही निश्छल भाव था जो केवल इन दुर्गम ऊंचाइयों पर ही जीवित रह सकता है। गाँव के किनारे एक स्तूप (चोर्तेन) के पास वृद्ध लामा अपने हाथ में ‘मानी’ (प्रार्थना चक्र) घुमाते हुए ‘ॐ मणि पद्मे हूँ’ का धीमा उच्चारण कर रहे थे। उस क्षण में समय मानो पूरी तरह ठहर गया था। यहाँ कोई हड़बड़ी नहीं थी, कोई लक्ष्य पाने की अंधी दौड़ नहीं थी- केवल वर्तमान का एक गहरा, शाश्वत अहसास था।

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दोपहर में भागा नदी के किनारे पत्थरों पर बैठकर घंटों बीत गए। सामने विशाल पहाड़ थे, जिनकी चोटियों पर प्राचीन हिमनद (ग्लेशियर) चमक रहे थे। उन विशालकाय चट्टानों को देखकर मनुष्य के क्षुद्र अहंकार का बोध होता है। हम शहरों में बैठकर अपने अस्तित्व को कितना विराट समझ लेते हैं, जबकि इन मौन खड़े प्रस्तर स्तंभों के सामने हमारी सभ्यताएं और हमारा जीवन केवल एक क्षणभंगुर सांस के समान हैं। नदी का नीला-सफेद पानी निरंतर बह रहा था, यह सिखाता हुआ कि जीवन का वास्तविक धर्म केवल आगे बढ़ना है, राह की हर बाधा को गले लगाते हुए।

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जिस्पा से आगे बारालाचा ला और लद्दाख का दुर्गम मार्ग शुरू होता है, जहाँ की हवा और अधिक विरल और कठोर हो जाती है। किंतु जिस्पा की खासियत यही है कि यह क्रूर ठंड और कोमल जीवन के बीच का एक दुर्लभ सेतु है। यहाँ कठोर भूगोल के भीतर भी एक अपनत्व भरा जीवन धड़कता है।

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दो दिन उस मौन और सौंदर्य की छांव में बिताने के बाद वापसी की घड़ी आ पहुंची। मन भारी था, क्योंकि उस निर्मल एकांत को छोड़कर पुनः उसी कृत्रिम संसार में लौटना था जहाँ से भागकर यहाँ आए थे। जब गाड़ी ने वापसी की राह पकड़ी और जिस्पा के विलो के पेड़ पीछे छूटने लगे, तो खिड़की से मुड़कर एक अंतिम बार उस घाटी को देखा।

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जिस्पा ने मुझे कोई भौतिक उपहार नहीं दिया था, उसने तो भीतर का बहुत कुछ छीन लिया था- शहर की व्यग्रता, व्यर्थ की चिंताएं और अनवरत शोर। उसके बदले में उसने जो दिया, वह था एक अगाध मौन और स्वयं से साक्षात्कार। दिल्ली लौटते हुए भी जिस्पा की वह बहती नदी, हवा में तैरते प्रार्थना पत्र और तारों भरा वह असीम आकाश स्मृति के पटल पर हमेशा के लिए अंकित हो चुके थे। यह यात्रा केवल भूगोल की नहीं, अंतर्मन की एक गहरी यात्रा बन गई थी।

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