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Old Hindi Film Stories : जिंदा आदमी के कत्ल की दास्तान- कब क्यूँ और कहाँ

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
Old Hindi Film Stories
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उन्नीस सौ साठ और सत्तर के दशक में, जब फिल्में ब्लैक एण्ड व्हाइट से रंगीन हो चुकी थीं, ऐसा लगता था कि हिन्दी सिनेमा का पूरा रचना संसार दर्शकों को रंगीनियाँ परोसने के लिए कहानियाँ बना रहा था। हेलेन का कैबरे, कुछ नाइट क्लब और होटल के सीन और कश्मीर, शिमला और खंडाला की वादियाँ हर फिल्म के आवश्यक तत्व थे। पैसे वाले प्रोड्यूसर हेलेन के अतिरिक्त बिंदू, अरुणा ईरानी, फरियाल जैसी अन्य डांसर्स को अवसर दे रहे थे, विदेशों खासकर स्विट्ज़रलैंड, लंदन, पेरिस और अमेरिका जैसे देशों में शूट कर रहे थे और विदेशी फिल्मों को हिन्दी में बना रहे थे। इस पूरे उपक्रम में अपराध कथाएं और थ्रिलर खासकर मर्डर मिस्ट्री फिल्म बनाने के लिए सबसे मुफीद कहानियाँ थीं।

इसी दौर में यह फिल्म ‘कब क्यूँ और कहाँ’ आई, जो अपने शीर्षक से ही खुद को एक थ्रिलर फिल्म घोषित करती है। फिल्म की कहानी पर बात करें तो फिल्म की शुरुआत एक हत्या से होती है। राय बहादुर जगदीश प्रसाद (मुराद) की हत्या उनके सौतेले भाई दलजीत (प्राण) द्वारा अपने साथी बिहारी (अर्जुन हिंगोरानी) के साथ मिल कर कर दी जाती है और हत्या को एक दुर्घटना का रूप दे दिया जाता है। उनकी बेटी आशा (बबीता) जो एक क्रूज की यात्रा में है, उसकी मुलाकात सीआईडी इन्स्पेक्टर आनंद (धर्मेन्द्र) से होती है। थोड़ी देर रूठने-मनाने, छेड़ने-बचाने की कवायद के बाद, आखिर दोनों में गहरा प्रेम पनप ही जाता है।

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क्रूज की यात्रा खत्म होते के बाद जब आशा मुंबई/बंबई पहुँचती है तो दलजीत और आनंद की पहली मुलाकात काफी तल्ख होती है। घर पहुँच कर आशा को पता चलता है कि उसके पिता राय बहादुर जगदीश प्रसाद की मृत्यु हो चुकी है। पता चलता है कि आशा का चाचा दलजीत न सिर्फ गहरे कर्जे में डूब हुआ है बल्कि इस बात से काफी खफा है कि उसे जयज़ाद में कुछ भी नहीं मिला है। जयज़ाद पा कर उससे कर्ज उतारने के लिए अपने पार्टनर बिहारी के साथ मिलकर वो अब आशा की भी हत्या करना चाहता है।

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इस काम में उसकी सहयोगी है रीटा (हेलेन) जो उसके और बिहारी के नाइट क्लब में डान्सर है। इधर लगातार मनमानियाँ कर रहा दलजीत अचानक सतर्क हो जाता है जब उसे पता चलता है कि राय बहादुर जगदीश प्रसाद के जानने वाले पुलिस सुप्रिन्डेन्टेन्ट गुप्ता (हरि शिवदसानी) के कहने से सीआईडी इन्स्पेक्टर आनंद, राय बहादुर जगदीश प्रसाद की मौत की जांच कर रहा है। वो आशा और उसकी सहेली लता(आशू) को लेकर, कश्मीर जाता है जिससे अपने पिता की मौत के सदमे से उबरने की कोशिश कर रही,कमजोर दिल आशा का मन बदल सके। दलजीत की छुपी इच्छा है कि वहीं कश्मीर में आशा की इस प्रकार हत्या कर दी जाए कि पूरा मामला एक एक्सीडेंट लगे।

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कुछ एक प्रयासों में नाकामयाब होते दलजीत को एक दिन अवसर हाथ लगता है जब आशा और लता उसकी हरकतों से डर कर खंडाला के बंगले पर चली जाती हैं। हर मंगलवार को घर जाने वाले माली की अनुपस्थिति से यह तय हो जाता है कि दोनों सहेलियाँ सुरक्षित रहेंगी। तभी वहाँ दलजीत पहुँच जाता है और लता पर हमला कर उसकी इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश करता है, छीना-झपटी में आशा से रिवॉल्वर चल जाती है और दलजीत मारा जाता है।

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जब आशा पुलिस के पास जाने को कहती है तो लता उसे समझाती है कि उसे बचाने में आशा से ये खून हुआ है, और सजा उन दोनों को होगी, इसलिए बेहतर है कि लाश को ठिकाने लगा दिया जाए। दोनों सहेलियाँ लाश को एक बक्से में रख कर ले जाती हैं और दलदल में डुबा देती हैं। घर पहुँच कर आशा के दुःस्वप्नों के दिन शुरू होते हैं जब आशा को दलजीत की आत्मा दिखाई देने लगती है और दलजीत का भूत उसे परेशान कर उसकी हत्या करने की बार-बार कोशिश करने लगता है।

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इधर जांच पड़ताल में लगे आनंद को ऐसे कई सबूत मिलते हैं जिनकी रोशनी में वो आशा के घर पहुँच जाता है और न सिर्फ असली गुनहगार को पकड़ लेता है बल्कि आशा की भी रक्षा करता है। सारे राज कहानी के अंत में खुल जाते हैं।
फिल्म के क्रेडिट्स ये दावा करते हैं कि इस फिल्म की कहानी, फिल्म के निर्माता और निर्देशक अर्जुन हिंगोरानी ने लिखी थी और पटकथा अर्थात स्क्रीन प्ले लिखा था बीस साल बाद, कोहरा, वो कौन थी और गुमनाम जैसी फिल्मों के पटकथा लेखक ध्रुव चटर्जी ने पर सूचना क्रांति के इस दौर में अध्येताओं ने यह खोज निकाला है कि फ्रेंच फिल्म ‘लेस डायबोलिक्स (Les Diaboliques)’ से प्रेरित घटनाओं में थोड़े फेरबदल के साथ इस फिल्म की कहानी लिखी गई है।

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फ्रेंच फिल्म Les Diaboliques खुद एक मशहूर उपन्यास She Who Was No More की कहानी पर आधारित है, फिल्म ने न सिर्फ फ़्रांस में बढ़िया प्रदर्शन किया बल्कि अमेरिका में प्रदर्शित उस वर्ष की सबसे सफल और सबसे अधिक पुरस्कृत विदेशी भाषा की फिल्म बनी। ऐसे में भारतीय निर्माताओं की नज़रों से फिल्म का बचना लगभग असंभव था। पर फिल्म की कहानी और विषय के ट्रीट्मेन्ट में अर्जुन हिंगोरानी, और एस एम अब्बास ने काफी मेहनत की और एक नई कहानी लिखी, जिसको ध्रुव चटर्जी ने बेहतरीन स्क्रीन प्ले लिख कर और बेहतरीन बना दिया।
फिल्म का संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया था और गीत लिखे थे इंदीवर और अनजान ने। लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मोहम्मद रफी और उषा खन्ना ने इन गीतों को अपनी आवाज दी।

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इतने बड़े नामों के बावजूद फिल्म का सिर्फ एक गीत ‘प्यार से दिल भर दे’ ही सुनने में कर्णप्रिय लगता है फिल्म खत्म होने के बाद भी आपको याद रह जाता है । इस आधार पर कह सकते है कि संगीत फिल्म का कमजोर पक्ष है, एक दो बढ़िया गीत और रहते तो फिल्म दर्शकों को लंबे समय तक याद रहती। फिल्म में कल्याणजी- आनंदजी ने ड्रम और बीट के कुछ बढ़िया पैच रखे हैं और वेस्टर्न और इंस्ट्रुमेंटल रॉक आधारित डांस का प्रयोग किया गया है, जिसमें संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी ने अमेरिकी बैंड ‘द वेंचर्स’ के मशहूर ट्रैक ‘एस्केप’ (Escape) का उपयोग भी किया था।

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आमतौर पर फिल्मों में मर्डर मिस्ट्री से ही रहस्य और रोमांच का सृजन होता है पर कब क्यूँ और कहाँ में किसने किसको मारा, ये बता कर भी दर्शक को फिल्म से बांधे रख कर अर्जुन हिंगोरानी का निर्देशन और ध्रुव चटर्जी का पटकथा लेखन दर्शक को क्षण भर भी निराश नहीं होने देता। फिल्म का एक मजबूत पक्ष है इंडस्ट्री के सबसे समर्थ चरित्र अभिनेताओं के द्वारा किया गया पटकथानुकूल अभिनय। सीआईडी इन्स्पेक्टर आनंद के सहायक हनुमान की भूमिका में असित सेन, लता की भूमिका में आशू, टैक्सी ड्राइवर की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में मोहन चोटी, और क्रूज पर स्टिवर्ट की भूमिका में धूमल सभी के सहज और सशक्त अभिनय से फिल्म अच्छी बन जाती है।

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फिल्म की कमियों पर बात की जाए तो प्राण द्वारा निभाए गए चरित्र को लंपट दिखाए जाते समय थोड़ा बेहतर सीक्वेंस और कुछ बेहतर संवाद लिखे जा सकते थे, कुछ एक जगहों को छोड़ दें तो शेष अवसरों पर बहुत सी घटनाएँ अचानक घट जाती हैं और दर्शकों को उनका औचित्य समझने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ती है, और बबीता से थोड़ी और बेहतर अदाकारी कारवाई जा सकती थी, लेकिन ऐसे एक-आध अवसर ही हैं इसलिए फिल्म के रसास्वादन पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है और फिल्म अपनी गति बनाए रखती है। दिलफेंक आशिक के रूप में, धर्मेन्द्र भले प्रभावित ना करते हों पर पूरी फिल्म में उनका सुदर्शन व्यक्तित्व और स्मित मुस्कान वाला चेहरा उनकी बारहा याद दिलाता है।

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फिल्म के निर्माता और निर्देशक अर्जुन हिंगोरानी की बतौर निर्माता ये पहली फिल्म थी, इससे पहले उन्होंने 1958 में भारत की पहली सिन्धी फिल्म, अबाना का निर्देशन किया था। उसके बाद ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ उन्होंने 1960 में निर्देशित की और फिर दस वर्षों के एक लंबे अंतराल के बाद, आई उनकी यह फिल्म जिसने हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री को हिट फिल्मों के लिए एक अचूक नुस्खा दिया। फिल्म के नाम में अंग्रेजी के तीन ‘K’ प्रयोग करने का। कब, क्यूँ और कहाँ, कहानी किस्मत की, खेल खिलाड़ी का, कातिलों के कातिल, करिश्मा कुदरत का ये अर्जुन हिंगोरानी की लगातार सफल फिल्मों के नाम हैं।

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इस नुस्खे को बाद में करण जौहर, राकेश रौशन और एकता कपूर ने भी सफलतापूर्वक आजमाया। फिल्मों और खासकर जासूसी फिल्मों के शौकीन दर्शकों को यूट्यूब पर मौजूद ये फिल्म अच्छे अभिनय, बढ़िया लिखे गए सस्पेंस और असली क्रूज पर शूट हुई फिल्म होने के लिए पहली फुरसत में कब क्यूँ और कहाँ देख डालनी चाहिए।

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