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Old Hindi Film Stories : अनामिका तू भी तरसे

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
Old Hindi Film Stories
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रहस्य और रोमांच श्रेणी की अधिकतर फिल्में एक कत्ल से शुरू होती हैं, होटलों, बदनाम बार जैसी जगहों की यात्रा करते आपको कातिल तक पहुँचाती हैं, पर 1973 की फिल्म अनामिका एक अलग ट्रीटमेंट वाली फिल्म है। फिल्म एक साहित्यिक कार्यक्रम से शुरू होती है, इस कार्यक्रम में मशहूर लेखक देवेन्द्र दत्त (संजीव कुमार) अपने पाठकों से रूबरू होने आए हुए हैं। पाठक मानते हैं कि एक लेखक के तौर पर देवेन्द्र की छवि स्त्रीविरोधी है क्योंकि उनके उपन्यासों की नायिकाएँ अक्सर धोखेबाज हुआ करती हैं। देवेन्द्र के चाचा शिव प्रसाद (ए के हंगल), उसकी नन्ही भतीजी डॉली (बेबी पिंकी) और उसका सेक्रेटरी हनुमान (असरानी) भी उसके साथ इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं। लौटते समय सब देखते हैं कि कुछ गुंडे चलती कार से एक युवती को फेंक कर भाग रहे हैं।

गाड़ी से गिरने और सर पर चोट लगने के कारण युवती (जया भादुड़ी) बेहोश हो जाती है। देवेन्द्र के लड़की को पुलिस के सुपुर्द करने के सुझाव को दरकिनार करते हुए, शिव प्रसाद उस घायल और बेहोश अजनबी लड़की को इलाज के लिए अपने घर ले आते हैं। साथ ही देवेन्द्र की सलाह पर उनके पारिवारिक डॉक्टर डॉ इरशाद हुसैन (इफतेखार), और पुलिस इन्स्पेक्टर कुलकर्णी (मधुप शर्मा) बुला लिए जाते हैं। अगली सुबह जब लड़की को होश आता है तो पता चलता है कि वह युवती अपनी पूरी याददाश्त खो चुकी है पर एक चौंकाने वाले दावे के तहत वह खुद को देवेन की कानूनी पत्नी, ‘श्रीमती देवेंद्र दत्त’ बताती है।

डॉ. इरशाद हुसैन इस भ्रम को मानसिक आघात का असर मानते हैं। अखबारों में दिए गए विज्ञापनों से भी कोई मदद नहीं मिलती और डॉ इरशाद की दवाएँ भी कुछ खास असर नहीं करती हैं और इस अजनबी लड़की की पहचान नहीं हो पाती। डॉ इरशाद और चाचा शिव प्रसाद के दबाव और समझाने-बुझाने के कारण धीरे-धीरे देवेन्द्र का मन भी बदलने लगता है और वो इस अजनबी लड़की को नाम देता है ‘अनामिका’। अनामिका पूरे घर के साथ खास कर डॉली के साथ घुलना मिलना शुरू कर देती है और परिवार का हिस्सा बनने लगती है।

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एक दिन देवेन्द्र से मिलने नरेश आता है। नरेश कश्यप (राजेश बहल), देवेन्द्र के प्रकाशक दौलत राम कश्यप (शिवराज) का बेटा है और देवेन्द्र की नई किताब ‘अनामिका’ के प्रिन्ट पहुँचाने की गरज से आता है। उसका आना देवेन्द्र के जीवन में खलबली लेकर आता है। नरेश अनामिका को पहचान तो लेता है लेकिन देवेन्द्र के सामने कुछ जाहिर नहीं करता और उसी रात अनामिका के अपहरण को गुंडे भेज देता है। गुंडे अनामिका का अपहरण तो नहीं कर पाते लेकिन उसे हल्की चोट आती है और इन घटनाओं से उसे कोई सदमा ना लगे इसलिए शिव प्रसाद, अनामिका और देवेन्द्र को कुछ दिनों के लिए शिमला भेज देते हैं। शिमला में घूमते फिरते एक दिन अचानक एक स्टूडियो में देवेन्द्र को अनामिका की एक फोटो एक फोटोग्राफर की दुकान में दिखाई देती है।

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थोड़ी छानबीन करने पर देवेन्द्र को पता चलता है कि अनामिका इससे पहले शिमला आ चुकी है और शहर के एक बड़े होटल में गंगा प्रसाद मल्होत्रा (नरेंद्र नाथ) के साथ उनकी पत्नी कंचन के रूप में रुकी थी। रहस्य के तार से तार जोड़ता देवेन्द्र, गंगा प्रसाद मल्होत्रा तक जा पहुंचता है और वहाँ उसे पता चलता है कि गंगा प्रसाद एक ऐयाश किस्म का कुंवारा आदमी है और अनामिका, गंगा प्रसाद की पत्नी नहीं। गंगा प्रसाद की बातों पर जब देवेन्द्र को भरोसा नहीं होता तो गंगा उसे रुबाई उर्फ रूबी (हेलेन) नाम की एक कैबरे डान्सर के पास भेजता है और वो भी अनामिका की पहचान कंचन के रूप में करती है और कहती है कि कंचन को एक बार पुलिस, रेड में भी पकड़ चुकी है। वहाँ से घर लौट कर आए देवेन्द्र को जब अनामिका अपनी सच्चाई बताने आती है तो देवेन्द्र उसकी कोई बात नहीं सुनता और उसे घर से निकाल देता है। और देवेन्द्र एक बार फिर कुछ वैसी ही मनःस्थिति से गुजरने लगता है जैसे चार साल पहले, सपना नाम की लड़की की बेवफाई से गुजर रहा था। इधर घर से बाहर निकलते ही नरेश के गुंडे अनामिका का अपहरण कर लेते हैं।

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अनामिका के अपहरण के बाद पता चलता है कि अनामिका का असली नाम अर्चना है और वो नरेश के दिवंगत भाई की पत्नी है जिसने शादी की रात ही आत्महत्या कर ली थी क्योंकि वो शादी के लायक नहीं था। अर्चना उर्फ अनामिका के अपहरण के पीछे नरेश का मकसद था जायज़ाद के उन कागजों पर दस्तखत करवाना जिससे कि नरेश अपनी उस पारिवारिक संपत्ति का स्वामी बन जाए जो उसके नरेश की कारगुजारियों से आहत उसके पिता मरते वक्त अपनी बहु अर्चना को सौंप गए हैं। वकील साहब, अर्चना और नरेश के बीच चली हाथापाई में लगी आग में नरेश घिर जाता है और उसे छोड़ कर अर्चना और वकील भाग जाते हैं।

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इन घटनाओं के कई महीनों बाद एक दिन शिव प्रसाद, देवेन्द्र को अखबार में छपी अनामिका की एक फोटो दिखाते हुए उसे एक बार अनामिका उर्फ अर्चना से मिल लेने को कहते हैं। दिल्ली पहुँच कर देवेन्द्र को पता चलता है कि अनामिका का असली नाम अर्चना है और वही उस प्रकाशन संस्थान की मालकिन है जिसने उसके नॉवेल छापे हैं। ये जान कर जब देवेन्द्र अनामिका से मिलने जाता है तो अनामिका उससे अपनी पहचान प्रदर्शित नहीं करती है। पार्टी में अनामिका फिल्म का कालजयी सदाबहार गीत गा कर, सबकी तालियाँ बटोरकर अर्चना के पीछे उसके घर तक पहुँच जाता है, वहाँ अर्चना उसे अपने बीते जीवन की कहानी सुनाती है और देवेन्द्र के साथ दर्शकों की भी शंकाओं का समाधान हो जाता है। अंत में आत्मरक्षा में की गई नरेश की हत्या के बाद, फिल्म सुखांत को प्राप्त होती है।

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सुरेन्द्र प्रकाश की कहानी पर पटकथा शशि भूषण ने लिखी और इस पटकथा को संवादों से सजाया मदन जोशी ने। तीन लेखकों द्वारा सँवारी गई इस कहानी को रघुनाथ झालानी ने अपने कुशल निर्देशन में परदे तक पहुंचाया। फिल्म के निर्माता मशहूर अभिनेता आमिर खान के पिता ताहिर हुसैन थे। फिल्म तीसरी मंजिल से एग्जीक्युटिव प्रोड्यूसर के रूप में अपना करिअर शुरू करने वाले ताहिर खान ने बतौर निर्माता कारवां, मदहोश, ज़ख्मी, हम हैं राही प्यार के जैसी बेहतरीन फिल्में बनाईं। पटकथा लेखक शशि भूषण अनामिका के अलावा काला आदमी और लावारिस जैसी फिल्मों की पटकथा के लिए जाने जाते हैं। फिल्म में अपनी छोटी उपस्थितियों से कहानी को आवश्यक गति देते कलाकारों में अचला सचदेव(अर्चना की माँ), यूनुस परवेज(राम लाख), मीना टी(बिजली) आदि ने भी सशक्त अभिनय किया है। हनुमान सिंह की भूमिका में असरानी का अभिनय भी बेहतरीन है।

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फिल्म के सभी गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे जिन्हें सुरों से सजाया महान संगीतकार सचिन देव बर्मन के पुत्र राहुल देव बर्मन ने, जिन्हें हम सभी पंचम दा के नाम से याद करते हैं। फिल्म का सबसे ख्यात गीत निस्संदेह ‘मेरी भीगी-भीगी सी’ है। ये गाना राहुल देव बर्मन द्वारा गाये और संगीतबद्ध किए गए और सचिन भौमिक द्वारा लिखे गए ख्यात बांग्ला गीत ‘मोन पोरे रूबी रॉय’ की धुन पर आधारित है। बांग्ला पृष्ठभूमि के संगीतकारों खासकर भप्पी लाहिड़ी और आर डी बर्मन ने ये प्रयोग कई बार किया है कि उन्होंने अपने हिट गीतों की धुनों को हिन्दी और बांग्ला दोनों भाषाओं की फिल्मों में प्रयोग किया है।

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फिल्म की बात करें तो ये रहस्य रोमांच श्रेणी की सबसे अलहदा कहानियों में से एक है। अनामिका हत्या की गुत्थी को सुलझाती कहानी नहीं है, ये पहचान तलाशती कहानी है, संदेश देती कहानी है और सबसे बड़ी बात ये प्रेम बाँचती कहानी है। फिल्म के संदेश स्पष्ट हैं कि सिर्फ परिस्थितियाँ देख कर हमें किसी के विषय में कोई पूर्वाग्रह नहीं बनाना चाहिए। फिल्म की शुरुआत के दस मिनट में ही कहानी दर्शकों को बांध लेती है और दर्शक भी नायक देवेन्द्र की तरह बेसब्री से रहस्योद्घाटन की प्रतीक्षा करना शुरू कर देते हैं, पर ये प्रतीक्षा रसास्वादन का माध्यम बनती है रसास्वादन में बाधक नहीं।

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दूसरी भाषाओं की फिल्मों से ली गई कहानियों से इतर यह फिल्म एक अरिजनल स्टोरी लाइन पर फिल्म देखने का एक बेहतरीन अनुभव है। संजीव कुमार और जया भादुड़ी ने पिता-पुत्री(परिचय), ससुर-बहु(शोले) नौकर-मालकिन(नौकर) जैसी अलग अलग भूमिकाएँ की हैं पर पिछली फिल्म की पिता-पुत्री की जोड़ी को इस फिल्म में रोमांस करते दिखाने के निर्देशक के दिलेर फैसले को संजीव कुमार और जया भादुड़ी अपने अभिनय कौशल और ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री से सही सिद्ध करते दिखते हैं। खास तौर पर जया भादुडी की पल-पल बदलती भाव-भंगिमाएं बेहतरीन अनुभव देती हैं।

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रहस्य-रोमांच फिल्मों के आशिक की दृष्टि से देखें तो अनामिका की कहानी में दो कहानियाँ हैं एक जो अनामिका ने अंत में देवेन्द्र को बताई और दूसरी वो जो अलग अलग पात्रों से होते संवाद और व्यवहार (मेलजोल) से दर्शक को समझ आ रही होती है। अनामिका के प्रेम में डूबा देवेन्द्र अनामिका की कहानी पर विश्वास करने का रास्ता चुनता है क्योंकि उसे फिल्म इस संदेश के साथ समाप्त करनी थी कि किसी को उससे अतीत से जज करना उचित नहीं, कई बार परिस्थितियों के कारण कोई गलत दिख सकता है उसे गलत मान कर संवाद के रास्ते बन्द करना उचित नहीं। पर रहस्य- रोमांच फिल्मों के रसिया कहानी के लूपहोल खोजते रहते हैं और फिल्म ऐसे तमाम अवसर उपलब्ध करवाती भी है।

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इसके अलावा फिल्म का एक रोचक पक्ष फिल्म की कॉमेडी है, फिल्म में असरानी एक कॉमेडियन के तौर पर शामिल पात्र दिखाई देते हैं, पर उनकी कॉमेडी अश्लीलता की हद तक चली जाती है। फिल्म में स्वस्थ हास्य नायक-नायिका की नोकझोंक से ही आता है। फिल्म में एक कमी है समर्थ खलनायक की, मुख्य खलनायक के रूप में नरेश के लिए इस फिल्म में करने को बहुत कुछ था पर राजेश बहल अपनी सीमाओं से आगे नहीं जा पाते और दर्शकों को ‘नरेश’ बहुत अल्प समय में ही भूल जाता है। संजीव कुमार-जया भादुडी की जबरदस्त केमेस्ट्री, बेहतरीन कर्णप्रिय गीतों और एक रोमांटिक थ्रिलर देखने की इच्छा हो तो अमेज़न प्राइम और यूट्यूब पर उपलब्ध फिल्म जरूर देखें।

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