
चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिला प्रशासन द्वारा मिशन वात्सल्य के तहत संचालित फोस्टर केयर योजना ने जिले के असहाय एवं अनाथ बच्चों के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगाई है। परिवार का सहारा खो चुके चार बच्चों, एक बालिका एवं तीन बालकों को परिवार आधारित देखभाल उपलब्ध कराकर जिला प्रशासन ने न केवल उन्हें सुरक्षित एवं स्नेहपूर्ण वातावरण प्रदान किया, बल्कि उनके पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवहार एवं सामाजिक विकास की दिशा में भी उल्लेखनीय बदलाव सुनिश्चित किया है। फोस्टर केयर के प्रभावी क्रियान्वयन में पश्चिमी सिंहभूम जिला पूरे राज्य में प्रथम स्थान पर है।
दर्दनाक परिस्थिति से परिवार की गोद तक
मनोहरपुर प्रखंड क्षेत्र के सारंडा वन क्षेत्र के एक गांव में पिता की मृत्यु के बाद चार बच्चों की देखभाल उनकी मां द्वारा अत्यंत कठिन परिस्थितियों में की जा रही थी। कुछ समय बाद मां की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद बच्चों के सामने भोजन, सुरक्षा, पालन-पोषण और शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का संकट उत्पन्न हो गया। परिवार में केवल वृद्ध दादी का सहारा था, जो स्वयं बच्चों का समुचित पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं थीं। जिला बाल संरक्षण इकाई को मामले की जानकारी मिलने के बाद बच्चों के लिए परिवार आधारित देखभाल की पहल शुरू की गई। गैर-संस्थागत देखभाल पदाधिकारी डॉ. कृष्ण कुमार तिवारी द्वारा परिवार आधारित देखभाल की योजना तैयार कर बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बच्चों की संस्कृति एवं परंपरा की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त फोस्टर परिवार का चयन किया गया। सामाजिक अन्वेषण एवं निर्धारित मानकों की जांच के बाद बच्चों को फोस्टर परिवार में रखा गया।
फोस्टर परिवार बना बच्चों का नया घर
बाल कल्याण समिति तथा गांव स्तर पर हुई बैठकों के बाद सभी निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले सुखदेव टोप्पो एवं उनकी पत्नी दयन्ती खलखो को फोस्टर परिवार के रूप में चयनित किया गया। यह परिवार मनोहरपुर प्रखंड के धानापाली गांव का निवासी है और बच्चों के मूल गांव से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर है। फोस्टर परिवार में आने के समय बच्चों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक थी। उन्हें दैनिक स्वच्छता एवं नियमित दिनचर्या का पर्याप्त ज्ञान नहीं था तथा पोषण की कमी के कारण वे कुपोषित थे। जिला बाल संरक्षण इकाई एवं फोस्टर परिवार के प्रयास से बच्चों के लिए नियमित भोजन, स्वच्छता, योग, खेलकूद एवं शिक्षा की व्यवस्था की गई। उन्हें निकटवर्ती सरकारी प्राथमिक विद्यालय में नामांकित भी कराया गया।
छह महीने में दिखा बदलाव, लौटा बचपन
फोस्टर परिवार में देखभाल के लगभग तीन माह बाद बच्चों में उल्लेखनीय सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगा। उन्होंने हिंदी बोलना सीखा और फोस्टर परिवार के सदस्यों को मां-पापा कहकर पुकारना शुरू किया। बच्चों में अपनत्व एवं पारिवारिक जुड़ाव की भावना विकसित हुई। लगभग छह माह बाद चारों बच्चे कुपोषण से मुक्त हो चुके थे। उनके अक्षर ज्ञान, भाषा ज्ञान और सामाजिक समावेशन में सुधार हुआ। उनका शारीरिक विकास सामान्य बच्चों की तरह होने लगा। वे खेलकूद, शारीरिक व्यायाम एवं योग में रुचि लेने लगे तथा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़े। बच्चों ने संगीत सीखना भी शुरू किया।
उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा, हर बच्चे को परिवार और बचपन का अधिकार
पश्चिमी सिंहभूम उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा कि “बच्चे समाज के भविष्य की नींव हैं। किसी कारणवश परिवार से वंचित, अनाथ एवं बेसहारा बच्चे सबसे अधिक जोखिम में होते हैं। ऐसे बच्चों के लिए केवल संरक्षण ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सुरक्षित पारिवारिक वातावरण, स्नेह, शिक्षा, पोषण और सम्मान के साथ बचपन देना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। फोस्टर केयर इसी सोच को धरातल पर उतारने का प्रभावी माध्यम है। हमारा प्रयास है कि जरूरतमंद बच्चों को उपयुक्त परिवार से जोड़कर उन्हें ऐसा वातावरण मिले, जहां वे स्वयं को सुरक्षित, स्वीकार्य और परिवार का हिस्सा महसूस करें तथा अपने भविष्य का निर्माण कर सकें।” उपायुक्त ने आगे कहा कि फोस्टर केयर जैसी परिवार आधारित व्यवस्था को मजबूत करने के लिए समाज के सभी वर्गों की सहभागिता आवश्यक है। बच्चों के पुनर्वास, गुणवत्तापूर्ण जीवन, सुरक्षा और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए जिला प्रशासन निरंतर प्रतिबद्ध है।
प्रशासन और समाज की साझी पहल बनी बदलाव की ताकत
बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण में सहायक निदेशक, सामाजिक सुरक्षा कोषांग खुशेन्द्र सोनकेशरी तथा जिला बाल संरक्षण पदाधिकारी पुनिता तिवारी द्वारा नियमित मार्गदर्शन एवं तत्परता दिखाई गई। फोस्टर परिवार, गांव के सामाजिक कार्यकर्ताओं, बाल कल्याण समिति तथा जिला बाल संरक्षण इकाई के समन्वित प्रयास से बच्चों को परिवार आधारित देखभाल का लाभ मिल सका।
यह प्रसंग केवल चार बच्चों के जीवन में आए बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रमाण है कि संवेदनशील प्रशासनिक पहल, परिवार का स्नेह और समाज की सहभागिता मिलकर बेसहारा बचपन को फिर से उसका अधिकार, एक सुरक्षित घर, प्यार और बेहतर भविष्य दे सकती है।

