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Shaharnama : शहरनामा : मुखियापति की याद आ गई

by Birendra Ojha
Shaharnama
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बिहार में पहली बार जब मुखिया का पद महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया था, तो इसके साथ ही बेशुमार मुखियापति पैदा हो गए थे। समाज में उन्हें पत्नी से ज्यादा सम्मान मिलने लगा। हालांकि, झारखंड में ऐसा नहीं हुआ। यहां की महिलाएं सचमुच काफी सशक्त हैं, इसलिए यहां मुखियापति नहीं के बराबर देखने को मिलते हैं। यहां बात उससे मिलते-जुलते घटनाक्रम पर हो रही है। पिछले दिनों दो जनप्रतिनिधियों की मुलाकात ने मुखियापति जैसी परंपरा की अनायास याद दिला दी। एक ने दूसरी सखी से जनहित की पीड़ा बयां कर अपने पति से योजना की गाड़ी आगे बढ़ाने का आग्रह किया। खैर राजनीति में विपरीत मत-विचार रखने वालों में दोस्ती कोई नई बात नहीं है, लेकिन हैरानी तब हुई, जब वे खुद सखी के पति से बात रखने में सक्षम थीं, तो उन्होंने ऐसा क्यों किया। क्या यह नई परंपरा तो नहीं बन जाएगी।

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नगर वाली सरकार


ज्यादा दिन नहीं हुए, बड़े तामझाम के साथ नगर की सरकार बनी। दलीय आधार पर उम्मीदवार खड़े नहीं हुए थे, लेकिन अधिकतर उम्मीदवारों पर दलों का ठप्पा लग गया था। इसमें कहीं दलों ने तत्काल कार्रवाई कर दी, तो कहीं आंख मूंद ली। एक जगह तो आंख मूंदने का फायदा भी दिखा, वह चुन ली गईं। दूसरी जगह एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद पति का पैसा काम नहीं आया। यहां जब असिस्टेंट का चुनाव हुआ, तो ऐसा शख्स जीत गया, जिस पर दलीय ठप्पा ज्यादा नहीं लगा था। बेचारे ने खुद को निष्पक्ष दिखाने के लिए दोनों विपरीत ध्रुवों वाले नेताओं के घर जाकर मिठाई खा ली। इसके साथ ही उन्होंने शायद गंगा नहा लिया है, क्योंकि अब चर्चा भी नहीं होती। नगर वाली सरकार की चर्चा भी बंद हो गई है। जितने तामझाम से यह सरकार बनी थी, वैसी रौनक अब नहीं दिख रही।

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शोभायात्रा या शक्तियात्रा


आजकल शोभायात्रा एक तरह से शक्तियात्रा जैसी हो गई है। पहले एक समाज के लोग एक ही यात्रा निकालते थे, अब तीन-चार निकलने लगे हैं। उसमें शामिल नेतृत्वकर्ताओं को जब महसूस होता है कि उनकी शक्ति कम दिख रही है, तो वे अलग से एक नई यात्रा निकालना शुरू कर देते हैं। इसी तरह यह कारवां चल रहा है। पिछले दिनों ऐसी ही एक शक्तियात्रा में ऐसे शख्स को संघर्ष का सामना करना पड़ा, जिसे दूसरे की शक्ति देखी नहीं जा रही थी। हालांकि, यह संघर्ष कुछ ही देर चला, लेकिन चर्चा आज भी होती रहती है। बात शक्तियात्रा की हो रही है, तो उसमें संघर्ष होना स्वाभाविक ही है। अब शहरवासी उम्मीद कर रहे हैं कि शहर में अगले वर्ष एक नई शक्तियात्रा का उदय हो सकता है, किसी नए स्थान से यह यात्रा निकल सकती है। इसके लिए अभी से योजना बननी शुरू हो गई है।

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पैसा कहां गया


हाल ही में एक दुखद घटना हो गई, जब एक गरीब चायवाली उसी चाय से झुलस गई, जिससे उसके घर की रोटी आती थी। कुछ मनचलों ने उसके शरीर पर खौलती चाय इसलिए फेंक दी कि उन्हें ठेले पर वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं मिला। बहरहाल, इसके बाद शुरू हुआ चायवाली को मदद पहुंचाने का दौर। एक नेताजी के सौजन्य से जिला के प्रथम व्यक्ति ने भरोसा दिया कि पैसे के लिए इलाज नहीं बंद होगा। इसके बाद जनप्रतिनिधियों ने भी उसके मुफ्त या अपने खर्च से इलाज कराने का वादा किया। लेकिन, अस्पताल चलाने वाले ने ये सब बातें नहीं सुनी थीं। इसलिए भारी-भरकम बिल ठोक दिया। इससे परिवार के लोगों के हाथ-पैर फूल गए। अब रुपये का जुगाड़ करने के लिए चायवाली का क्यूआर स्कैनर जारी किया गया है, ताकि दानवीर मदद कर सकें। यह देखकर लोग पूछ रहे हैं कि पहले दिए गए भरोसे कहां गए।

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