
रांची: झारखंड के लोक जीवन की आत्मा और हर आदिवासी उत्सव की जान कहे जाने वाले ‘मांदर’ के नाम अब एक नई और बड़ी उपलब्धि दर्ज हो गई है। भारत सरकार की जीआई रजिस्ट्री (चेन्नई) ने मांदर को आधिकारिक तौर पर भौगोलिक संकेतक यानी GI Tag दे दिया है। अब पूरी दुनिया में मांदर की इस खास बनावट और धुन का असली अधिकार सिर्फ और सिर्फ झारखंड के पास ही रहेगा।
क्यों खास है हमारी माटी का यह मांदर
मांदर सिर्फ लकड़ी और चमड़े का ढांचा नहीं, बल्कि इसके पीछे सदियों पुरानी परंपरा और कारीगरों की कड़ी मेहनत छिपी है। इसे बनाने में खास तरह की स्थानीय लाल मिट्टी, लकड़ी और विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी गूंज और थाप झारखंड के जनजातीय समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की धड़कन है। जीआई टैग मिलने से अब इस पारंपरिक कला को एक नई संजीवनी मिलेगी।
गुमला के कारीगरों की मेहनत ने लाया रंग
यह ऐतिहासिक सफलता इतनी आसानी से नहीं मिली। इसके लिए साल 2021 में गुमला स्थित रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड की ओर से जीआई रजिस्ट्री में आवेदन (नंबर 777) किया गया था। लंबी कानूनी और तकनीकी प्रक्रिया के बाद आखिरकार मांदर के अनोखेपन को मान्यता मिल ही गई। इस उपलब्धि से गुमला सहित पूरे प्रदेश के उन पारंपरिक कारीगरों के चेहरों पर खुशी की चमक है, जो पीढ़ियों से इसे गढ़ते आ रहे हैं। अब उन्हें अपनी कला का सही मोल और बड़ा बाजार मिल सकेगा।
सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में एक और चमकीला सितारा
झारखंड सरकार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस उपलब्धि पर खुशी जाहिर करते हुए इसे राज्य की सांस्कृतिक धरोहरों की बड़ी जीत बताया है। राज्य की सोहराय-कोहवर पेंटिंग, केसरिया कलाकंद, कुचाई सिल्क, भगैया साड़ी और डोकरा क्राफ्ट के बाद अब मांदर भी इस खास श्रेणी में शामिल हो गया है।
जीआई टैग मिलने के बाद अब न सिर्फ मांदर की मौलिकता सुरक्षित रहेगी, बल्कि इससे जुड़े स्थानीय कारीगरों को आर्थिक रूप से भी मजबूती मिलेगी। यह पहचान झारखंड के संगीत और लोककला को वैश्विक मंच पर एक नया मुकाम दिलाएगी।

