अंशु कुमारी, उप संपादक
इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं यूपी की एसडीएम ज्योति कुमारी। पति-पत्नी के बीच का विवाद पूरे देश में बहस का केंद्र बिन्दु बन गया है। कोई महिला को गलत साबित करने पर तुला है। कोई पति की गलती बता रहा है। कई लोग दावा कर रहे हैं कि इस घटना के बाद लोगों ने अपने पत्नियों को पढ़ाना छोड़ दिया है। कुछ लोग इसे समाज तोड़ने की साजिश के रूप में देख रहे हैं। लिहाजा हमने पूरे केस और इसके सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए समाज और देश के अलग-अलग वर्गों से आने वाले अलग-अलग विशेषज्ञों से बात की। पूरे निष्कर्ष में एक बात साफ हो गयी कि यह केस हमारे देश और समाज के लिए उदाहरण नहीं बन सकता:- प्रस्तुत है सभी पक्षों से बातचीत को समेटती हमारी खास रिपोर्ट।
केस वन : उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रामगुलाम टोला की रहने वाली शालीनी देवी प्रयागराज में रहकर यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं। पति देवरिया सिविल कोर्ट में वकालत करते हैं। हर महीने वह बैंक अकाउंट में 15 हजार रुपये भेजते हैं। जब कोर्ट बंद होता है तो कई बार घर से अनाज लेकर ट्रेन से प्रयागराज पहुंचा देते हैं। कई बार भतीजे और दूसरे लोग भी यह काम करते हैं।
सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश की ज्योति मौर्य की घटना के बाद कई पतियों ने अपनी पत्नियों के पढ़ाई छुड़ा दी। क्या वास्तव में मौजूदा सामाजिक हकीकत यही है या पोस्ट और रील पर दर्शक बटोरने के लिए केस को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। शालीनी देवी बताती हैं कि यह केवल अपवाद है। पति-पत्नी के बीच का रिश्ता इतना मजबूत होता है कि कोई एक घटना समाज में आमूल परिवर्तन नहीं ला सकती।
केस टू : बिहार के जमुई के रहने वाले अनिल सिंह प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं। पत्नी पुष्पा कुमारी रसायन विज्ञान से एमएससी हैं। पत्नी सिविल सेवा की तैयारी करना चाहती थीं। परिवार के लोग इसके लिए तैयार नहीं थे। पत्नी दिल्ली जाना चाहती थीं। उनकी पढ़ाई-लिखाई वहीं हुई थी।
परिवार के बीच लंबे समय तक चली बहस के बाद तय हुआ कि पत्नी पुष्पा कुमारी दिल्ली की बजाये पटना में रहकर तैयारी करेंगी। इसके लिए पति ने बोरिंग रोड पर एक घर किराये पर लिया। फिलहाल पत्नी वहीं रहती हैं। पति और परिवार के लोग आना-जाना करते हैं। पत्नी को खाना नहीं बनाना पड़े इसके लिए एक नौकरानी का इंतजाम भी किया गया है।
हर महीने 20 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। कई बार पति को दोस्तों के बीच ताने भी सुनने पड़ते हैं, बावजूद उन्हें अपनी पत्नी की प्रतिभा पर पूरा भरोसा है। सोशल मीडिया पर चल रहे ज्योति विवाद से परिवार प्रभावित नहीं है।
सामाजिक विमर्श : अमिताभ बच्चन की फिल्म सूर्यवंशम देखकर बड़ी हुई पीढ़ी के बीच सोशल मीडिया पर एक खबर खूब वायरल है। इसमें उत्तर प्रदेश में एक चतुर्थ वर्गीय पति ने अपनी पत्नी को पढ़ा लिखाकर शादी के 12 साल बाद एसडीएम बनाया। अपनी कमाई का सारा पैसा पत्नी को पढ़ाने में खर्च कर दिया। लेकिन जैसे ही पत्नी ने एसडीएम की कुर्सी संभाली उसने अपने पति को छोड़ दिया। यह कहानी प्रयागराज की है। हकीकत की यह कहानी फिल्म सूर्यवंशम की कहानी से ठीक उलट है, लेकिन लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बनी हुई है।
फिल्म सूर्यवंशम में अमिताभ ने हीरा का किरदार निभाया था, जो अपनी पत्नी को पढ़ाकर अफसर बनाता है, लेकिन उस फिल्म में पत्नी अपने पति के साथ रहती है, जबकि यहां पत्नी कुर्सी पाते ही सनम बेवफा बन गयी। यही नहीं उसने पति के खिलाफ केस भी दर्ज करा दिया और अलग रहने लगी। सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्लेटफार्म के जरिये इस बात को हवा दी जा रही है कि इस घटना से पुरुष समाज डर गया है। वह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने में अपने लिए अब खतरा महसूस कर रहा है।
विश्लेषण : झारखंड के कोल्हान विश्वविद्यालय के अंगीभूत महाविद्यालय एबीएम कॉलेज में समाजशास्त्र विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर उत्पल कुमार चक्रवर्ती कहते हैं कि हिंदू धर्म मानने वाले अधिकांश लोगों के बीच यह परंपरागत मान्यता है कि पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का होता है। कोई एक घटना या उदाहरण पूरे सामाजिक तानेबाने को बदल दे, यह जरूरी नहीं है। कुछ लोग सच्चाई को स्वीकार करने की बजाये दुष्प्रचार का हिस्सा बन जाते हैं।
सोशल मीडिया पर पति-पत्नी के रिश्तों में आये बदलाव को लेकर किये जा रहे दावे मौजूदा सामाजिक हकीकत से बहुत दूर हैं। किसी शहर या राज्य में हुई कोई एक घटना लोगों के बीच चर्चा का विषय बन सकती है लेकिन लोग चर्चा के अनुसार ही उसे अपने जीवन में उतार लेंगे यह कहना ठीक नहीं है। मेरी जानकारी में बहुत सारे परिवार हैं, जहां पति अपनी न्यूनतम आय स्रोत से पत्नी को पढ़ा रहा है और पत्नी सफल होकर पूरे परिवार का भरण पोषण कर रही है।
चर्चा में क्यों : मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इलाहाबाद, प्रयागराज यूपी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. हंसनाथ तिवारी की माने तो मीडिया में केस की चर्चा खूब है। उन्होंने कहा कि मेरा निजी मत है कि ऐसा इस लिए है क्योंकि सिविल सेव में आने वाले लोगों को आज भी समाज बेहद सम्मान और आदर्श के रूप में देखता है।
युवा अधिकारियों को युवा अपना आदर्श मान बैठते हैं, ऐसे में किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे किसी अधिकारी के बारे में कोई जानकारी सामने आने पर वह निश्चित रूप से चर्चा का विषय बन जाती है। यह कहना कि इस केस से बिल्कुल कोई प्रभाव नहीं पड़ा, यह ठीक नहीं होगा। कुछ लोग इससे प्रभावित होकर कुछ दिनों के लिए अपने उद्देश्य में बदलाव ला सकते हैं लेकिन यह सही है कि इसका प्रभाव समाज पर बहुत लंबे समय तक नहीं रहेगा।
नारी विमर्श के नजरिये से : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र से पीजी डिप्लोमा इन जेंडर स्टडीज की पढ़ाई करने वाली डॉ. क्षमा त्रिपाठी बताती हैं कि यह मानना बिल्कुल गलत है कि पढ़ाई लिखाई करने के बाद कोई महिला अपने पति को छोड़ देती है। एसडीएम ज्योति जैसी एक या दो घटनाएं हो सकती हैं लेकिन अगर स्त्री-पुरुष की बात करें तो पुरुषों के ऐसे लाखों उदाहरण होंगे, जिन्होंने अपने पद या पावर के बाद महिलाओं को छोड़ दिया या विवाहेतर संबंध रखे। जिस तरीके से इस मुद्दे को उछाला जा रहा है, इससे साफ है कि महिला औ पुरुषों के बीच गैर बराबरी वाली मानसिकता को पोषित-पल्लवित करने में सहायक उदाहरण के रूप में इस केस का इस्तेमाल किया जा रहा है।
जानिए क्या है मामला:
बताया जाता है कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आलोक मौर्य की शादी 2010 में वाराणसी के चिरई गांव की रहने वाली ज्योति के साथ हुई थी। ज्योति ने शादी के बाद आगे की पढ़ाई करने की इच्छा जताई। उसके बाद आलोक ने अपनी छोटी सी तनख्वाह में से पैसे काटकर उसकी पढ़ाई के लिए रुपये जोड़े। उन्होंने उसका दाखिला प्रयागराज के एक अच्छे कोचिंग सेंटर में कराया था।
साल 2015 में जिस दिन उसके घर दो जुड़वा बेटियां हुईं, उसी दिन पीसीएस का रिजल्ट आया और ज्योति का सेलेक्शन पीसीएस में हो गया। पूरे घर में खुशी छा गई। उस समय ज्योति ने इसका श्रेय अपने पति आलोक मौर्य और ससुर को दिया। लेकिन अधिकारी बनने के बाद एक चपरासी पति के साथ ज्योति को रहना खटकने लगा। फिर उसने अपने पति को ही किनारे कर दिया।
इतना ही नहीं अपने पति को मरवाने और किसी और के साथ घर बसाने की योजना बनाने लगी। ऐसा आरोप पंचायती राज विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पति आलोक मौर्य ने अपनी पीसीएस पत्नी ज्योति वर्मा पर लगाया है।
कानूनी पक्ष : इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुरेंद्र मोहन मिश्रा बताते हैं कि यह केस भी पारिवारिक न्यायलयों में आने वाले लाखों केस की तरह ही है। चर्चा में आने के पीछे इसकी दो वजह है-पहला कि महिला मौजूदा समय में शासन में एक प्रतिष्ठित पद पर आसीन है, दूसरा कि कुछ लोग इस केस की आड़ में अपने अंदर बैठी महिला उत्पीड़न की मानसिकता को सही साबित करने का प्रयास कर रहे हैं।
पूरे मामले में कोर्ट कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत ही देखेगा। अगर दोनों पक्ष तलाक के लिए अर्जी देते हैं तो इसकी मेरिट के आधार पर बहस होगी। महिला और पुरुष के अपने-अपने तर्क होंगे। सभी पक्षों को सुनने के बाद ही कोर्ट किसी परिणाम तक पहुंचेगा। कौन सही है, कौन गलत। इन पर सामाजिक बहस के जरिये फैसला नहीं किया जा सकता है।

