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यात्रा वृतांत : कोल्ली हिल्स : पहाड़ सिखाते संस्कृति का नया अर्थ

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
यात्रा वृतांत
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कई बार यात्रा किसी पर्यटन स्थल को देखने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को नए सिरे से जानने के लिए की जाती है। भारत और दुनिया के अनेक देशों की यात्राओं के दौरान मैंने हिमालय की बर्फीली चोटियां देखी थीं, रेगिस्तान की तपिश महसूस की थी और समुद्र की अनंत लहरों के साथ भी समय बिताया था। फिर भी मन के किसी कोने में दक्षिण भारत का एक अनजान नाम बार-बार दस्तक देता था—कोल्ली हिल्स। यह कोई चर्चित हिल स्टेशन नहीं है। यहां न ऊटी जैसी भीड़ है, न मुन्नार जैसी व्यावसायिक हलचल और न ही कोडाइकनाल जैसी पर्यटकों की चहल-पहल। शायद इसी अनजानेपन ने मुझे उसकी ओर खींच लिया।

दिल्ली से मेरी यात्रा सुबह-सुबह शुरू हुई। विमान जब बादलों को चीरते हुए चेन्नई पहुंचा तो मौसम, भाषा और हवा—सब कुछ बदल चुका था। उत्तर भारत की गर्म, धूलभरी हवाओं की जगह समुद्र की नमी से भरी हवा ने स्वागत किया। चेन्नई से ट्रेन द्वारा सेलम पहुंचना और फिर सड़क मार्ग से नामक्कल की ओर बढ़ना मानो दक्षिण भारत की आत्मा में प्रवेश करने जैसा था। रास्ते भर नारियल के झुरमुट, केले के विशाल खेत, लाल मिट्टी, दूर-दूर तक फैले धान के खेत और छोटे-छोटे रंगीन मंदिर यात्रा को किसी चलचित्र की तरह जीवंत बना रहे थे।

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नामक्कल से कोल्ली हिल्स की असली यात्रा आरम्भ होती है। लगभग सत्तर हेयरपिन मोड़ों वाली सड़क पहाड़ की ओर चढ़ती जाती है। हर मोड़ पर घाटियों का दृश्य बदल जाता है। कहीं बादल सड़क को छूते दिखाई देते हैं, कहीं दूर तक फैले जंगल और कहीं चट्टानों से उतरती जलधाराएं। कई बार मन हुआ कि गाड़ी रोककर बस इस दृश्य को देर तक देखता रहूं। यहां की हवा में एक अनोखी ताजगी थी, मानो जंगलों ने अपने भीतर संजोई हुई औषधीय सुगंध यात्रियों के लिए बचाकर रखी हो।

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कोल्ली हिल्स पहुंचते ही सबसे पहले जिसने मेरा स्वागत किया, वह था, वहां का मौन। शहरों में मौन भी शोर से भरा होता है, लेकिन यहां का सन्नाटा जीवंत था। पेड़ों के बीच बहती हवा, पक्षियों का संगीत और दूर कहीं गिरते पानी की हल्की आवाज़ इस मौन को अर्थ दे रही थी। मुझे लगा कि पहाड़ों का सबसे बड़ा आकर्षण उनकी ऊंचाई नहीं, बल्कि उनकी खामोशी होती है।

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अगले दिन मैंने अपनी यात्रा की शुरुआत अरापलीश्वरर मंदिर से की। भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि तमिल संस्कृति का जीवंत इतिहास भी है। मंदिर में पत्थर की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां समय की गवाही देती हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि यह क्षेत्र प्राचीन तमिल साहित्य में कोल्ली मलई के नाम से वर्णित है और यहां की अधिष्ठात्री देवी कोल्ली पावई आज भी लोकविश्वास का अभिन्न हिस्सा हैं। मुझे महसूस हुआ कि दक्षिण भारत के मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और इतिहास के जीवंत अभिलेख हैं।

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मंदिर से आगे बढ़ते हुए मैं आकाश गंगा जलप्रपात (अगाया गंगई फॉल्स) पहुंचा। वहां तक पहुंचने के लिए लगभग बारह सौ सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। उतरते समय जितना उत्साह था, लौटते समय उतनी ही परीक्षा। लेकिन नीचे पहुंचकर जो दृश्य सामने था, उसने सारी थकान भुला दी। ऊंची चट्टानों से गिरता जल, चारों ओर फैली हरियाली और पानी की फुहारों में घुली धूप मानो प्रकृति का कोई अनुष्ठान हो। वहां बैठकर मुझे लगा कि प्रकृति का सौंदर्य देखने की नहीं, महसूस करने की चीज़ है।

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कोल्ली हिल्स का वास्तविक आकर्षण उसके प्राकृतिक स्थलों से अधिक वहां का जनजीवन है। यहां रहने वाले लोग सरल, विनम्र और प्रकृति के अत्यंत निकट हैं। उनकी आजीविका खेती, बागवानी और औषधीय पौधों पर आधारित है। कटहल, संतरा, अनानास, काली मिर्च, हल्दी, कॉफी और शहद यहां की पहचान हैं। मुझे एक स्थानीय परिवार के घर जाने का अवसर मिला। भाषा की दीवार अवश्य थी, लेकिन मुस्कान ने हर दूरी मिटा दी। अतिथि के रूप में उन्होंने जो अपनापन दिया, उसने यह विश्वास और गहरा किया कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मीयता है।

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केले के पत्ते पर चावल, सांबर, रस्म…

भोजन भी इस यात्रा का यादगार हिस्सा रहा। केले के पत्ते पर परोसा गया पारंपरिक तमिल भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि संस्कृति का परिचय था। गरम चावल, सांबर, रसम, कूटू, पोरियाल, दही और घर का बना अचार—सब कुछ सादगी से भरपूर, लेकिन संतुलित और पौष्टिक। सुबह की इडली, डोसा और फ़िल्टर कॉफी ने दक्षिण भारतीय भोजन के प्रति मेरी धारणा को और समृद्ध किया। स्थानीय बाजार से खरीदा गया शुद्ध पहाड़ी शहद और काली मिर्च आज भी उस यात्रा की मधुर स्मृति हैं।

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ठहरने के लिए मैंने किसी बड़े होटल के बजाय एक छोटे से इको-रिसॉर्ट को चुना। लकड़ी से बने कमरे की खिड़की से सुबह बादलों को घाटियों में उतरते देखना जीवन के उन दुर्लभ अनुभवों में से एक था, जिन्हें शब्दों में बांधना आसान नहीं होता। रात में न शहर का शोर था, न कृत्रिम रोशनी। केवल झींगुरों की आवाज़, हवा की सरसराहट और दूर कहीं जंगल की रहस्यमयी निस्तब्धता। उसी रात मुझे लगा कि शायद प्रकृति का सबसे बड़ा उपहार शांति है, जिसे हम शहरों में खो चुके हैं।

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तीन दिन कब बीत गए, पता ही नहीं चला। वापसी के समय वही घुमावदार सड़क अब परिचित लग रही थी। हर मोड़ जैसे मुझे रोक लेना चाहता था। नामक्कल, सेलम और फिर चेन्नई होते हुए जब विमान ने दिल्ली की धरती को छुआ तो मेरे बैग में केवल कुछ तस्वीरें और स्मृति-चिह्न नहीं थे, बल्कि अनुभवों का एक ऐसा संसार था, जिसने यात्रा को देखने का मेरा दृष्टिकोण बदल दिया था।

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कोल्ली हिल्स ने मुझे सिखाया कि यात्रा केवल स्थानों की सूची पूरी करना नहीं है। किसी जगह की आत्मा को समझना, वहां के लोगों के साथ बैठना, उनके भोजन का स्वाद लेना, उनकी लोककथाएं सुनना और प्रकृति के साथ कुछ पल मौन रहना- यही वास्तविक यात्रा है। आज भी जब उस यात्रा को याद करता हूं तो लगता है कि मैंने केवल एक पहाड़ी क्षेत्र नहीं देखा, बल्कि भारतीय संस्कृति के एक ऐसे रंग को महसूस किया, जो धीरे-धीरे मन पर चढ़ता है और फिर कभी उतरता नहीं।

दिल्ली लौटने के बाद अपनी डायरी के अंतिम पृष्ठ पर मैंने केवल एक पंक्ति लिखी- ‘कुछ यात्राएँ मंज़िल तक पहुँचकर समाप्त नहीं होतीं, वे लौटने के बाद भीतर शुरू होती हैं; कोल्ली हिल्स मेरे लिए ऐसी ही एक यात्रा थी’।

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