
रांची : झारखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में बैकडोर से एंट्री दिलाने और धांधली कराने वाले सिंडिकेट का सीआईडी ने भंडाफोड़ किया है। जांच में सामने आया है कि मेरिट सूची में हेरफेर करने से लेकर मनचाहा पद दिलाने तक के लिए लाखों रुपये का सौदा किया जाता था। इस मामले में जेपीएससी सदस्य डॉ. अजीता भट्टाचार्य के पूर्व पीए ब्रज कुमार राम की सीधी संलिप्तता के सबूत मिले हैं, जिसके बाद अदालत ने उनकी जमानत अर्जी पूरी तरह खारिज कर दी है।
नीचे से लेकर ऊपर तक काम कर रहा था पूरा नेटवर्क
सीआईडी द्वारा अदालत में दाखिल केस डायरी के मुताबिक, भर्ती प्रक्रियाओं में नीचे से लेकर ऊपर तक पूरा नेटवर्क काम कर रहा था। जांच में खुले कुछ बड़े खुलासे सामने आए हैं।
आरोप है कि 11वीं से 13वीं JPSC परीक्षा के दौरान एक अभ्यर्थी के इंटरव्यू में 80 अंक बढ़वाए गए। इसके बदले 5 लाख रुपये का लेन-देन हुआ और उम्मीदवार DSP पद के लिए चुन लिया गया।
वहीं सीडीपीओ परीक्षा में चार अभ्यर्थियों को पास कराने के लिए प्रति उम्मीदवार 20 लाख रुपये तय किए गए थे। चौंकाने वाली बात यह है कि सेटिंग वाले चारों अभ्यर्थी परीक्षा में सफल भी रहे।
अधिकारियों के नाम पर बंटती थी रकम
मामले के मुख्य आरोपी अभय तिवारी के बयान के अनुसार, डीएसपी, डिप्टी जेलर और दिव्यांग कोटे के पदों समेत कई अभ्यर्थियों से 15-15 लाख रुपये लिए गए। इस वसूली का हिस्सा कथित तौर पर तत्कालीन अध्यक्ष और आयोग के सदस्यों के पीए तक पहुंचता था।
अदालत ने खारिज की जमानत, CID के पास पुख्ता सबूत
रांची की विशेष अदालत ने ब्रज कुमार राम की जमानत याचिका खारिज करते हुए मामले की गंभीरता पर कड़ा रुख अपनाया है। बचाव पक्ष ने बीमारी और दुर्घटना में हुई सर्जरी का हवाला देते हुए खुद को बेकसूर बताया था, लेकिन अदालत ने सीआईडी के डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को प्राथमिक आधार माना।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला सिर्फ किसी के पीए होने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं में संगठित रूप से की गई धांधली से जुड़ा है। ऐसी गतिविधियों से न सिर्फ योग्य और मेहनती युवाओं के हक पर डाका पड़ता है, बल्कि सरकारी भर्ती प्रणाली से आम जनता का विश्वास भी उठता है। सीआईडी के पास वॉट्सऐप चैट, बैंक ट्रांजैक्शन और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स के रूप में ऐसे अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं, जो आरोपियों के दावों की पोल खोलते हैं। फिलहाल झारखंड प्रतियोगी परीक्षा अधिनियम के तहत आरोपी को राहत देने से साफ इनकार कर दिया गया है।
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