
दिल्ली की सुबह हमेशा की तरह भागती हुई थी। सड़कों पर गाड़ियों का शोर, बसों के पीछे दौड़ते लोग, चौराहों पर लाल बत्तियों के सामने ठहरी बेचैनी और अपने-अपने गंतव्य तक जल्दी पहुँचने की हड़बड़ी। इसी शोर के बीच एक सुबह मैंने धौलाधार की ओर जाने का निश्चय किया। मन कई दिनों से पहाड़ों की ओर खिंच रहा था। शहर की लगातार बोलती हुई दुनिया से दूर कहीं ऐसी जगह जाने की इच्छा थी, जहाँ कुछ देर अपने भीतर की आवाज भी सुनी जा सके। सामान बहुत कम था- कुछ कपड़े, एक डायरी, कैमरा और रास्ते में पढ़ने के लिए एक किताब। लेकिन यात्रा पर निकलते समय मुझे लगा कि असली सामान तो वह थकान है, जिसे मैं दिल्ली में छोड़ जाना चाहता था।
Read Also-यात्रा वृतांत : इतिहास, शौर्य व समय की धड़कन
दिल्ली से निकलते ही शहर ने देर तक पीछा किया। कहीं मेट्रो के खंभे थे, कहीं अधबने फ्लाईओवर, कहीं सड़क किनारे चाय की दुकानों पर जमा भीड़। गाड़ी के शीशे से बाहर देखते हुए महसूस हुआ कि शहर से बाहर निकलना केवल भौगोलिक दूरी तय करना नहीं है; उसके लिए अपने भीतर जमी हुई जल्दबाजी से भी थोड़ा मुक्त होना पड़ता है। सुबह की धूप धीरे-धीरे तेज हो रही थी। सड़क पर ट्रकों की लंबी कतारें थीं और ढाबों के सामने खड़े लोग चाय के गिलास हाथ में लिए दिन की शुरुआत कर रहे थे।
Read Also- यात्रा वृतांत : जिस्पा : जहाँ बहुत कुछ कहते पहाड़
एक ढाबे पर गाड़ी रुकवाई। चूल्हे पर चाय चढ़ी थी, तवे पर पराँठे सिक रहे थे और रेडियो पर पुराना फिल्मी गीत बज रहा था। चाय वाले ने पूछा, ‘कहाँ तक जाना है?’ मैंने कहा, ‘धौलाधार की तरफ’। वह मुस्कराया, ‘अच्छा है साहब, यहाँ गर्मी से निकलकर पहाड़ों में जाइए। बस, वहाँ पहुँचकर लौटने का मन नहीं करेगा’। उसकी साधारण-सी बात में पहाड़ों का एक ऐसा आकर्षण था, जिसे किसी पर्यटन-विज्ञापन में नहीं पाया जा सकता।

आगे बढ़ते हुए रास्ते का रंग बदलने लगा। मैदानों की खुली धरती, खेतों के बीच गुजरती सड़क और दूर तक फैली बस्तियाँ पीछे छूटती गईं। पंजाब की ओर से गुजरते हुए खेतों में काम करते लोग दिखाई देते थे। कहीं ट्रैक्टर चल रहा था, कहीं सड़क किनारे फल बेचने वाले अपनी दुकानें सजाए बैठे थे। रास्ते में एक जगह जाम मिला।
आगे किसी ट्रक के खराब हो जाने से वाहनों की लंबी कतार लग गई थी। लोग गाड़ियों से उतरकर सड़क की ओर देखने लगे। कुछ देर की प्रतीक्षा में अनजान यात्रियों के बीच बातचीत शुरू हो गई। पास खड़े एक बुजुर्ग ने बताया कि वह अपने बेटे के पास पठानकोट जा रहे हैं। उन्होंने पहाड़ों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘पहाड़ आदमी को धीरज सिखाते हैं। वहाँ रास्ता जितना ऊपर जाता है, आदमी को उतना ही धीरे चलना पड़ता है’। जाम खुलने के बाद भी उनकी बात मेरे मन में बनी रही। यात्रा में कई बार मंजिल से अधिक अर्थ रास्ते में मिले किसी अनजान व्यक्ति के वाक्य में छिपा होता है।
Read Also- यात्रा वृतांत : हिमालय का वह चेहरा जो तस्वीरों में नहीं मिलता
हिमाचल प्रदेश की सीमा में प्रवेश करते ही दृश्य में एक सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देने लगा। हवा में ठंडक घुली थी और सड़क के दोनों ओर हरियाली गहरी होने लगी थी। मकानों की बनावट बदल रही थी, दुकानों के नामों के साथ पहाड़ी जीवन की झलक मिलने लगी थी। रास्ता अब केवल आगे नहीं बढ़ रहा था, धीरे-धीरे ऊँचाई की ओर भी उठ रहा था। कहीं सड़क के किनारे चीड़ के पेड़ खड़े थे, कहीं पहाड़ी ढलानों पर छोटे-छोटे घर दिखाई देते थे। मोड़ों पर गाड़ी की गति अपने आप धीमी हो जाती। हर मोड़ के बाद दृश्य बदल जाता और लगता कि प्रकृति ने आगे कोई नया पन्ना खोल दिया है।
Read Also- यात्रा वृतांत : जिस्पा : जहाँ बहुत कुछ कहते पहाड़
धर्मशाला की ओर बढ़ते हुए पहली बार धौलाधार की हिमाच्छादित चोटियाँ स्पष्ट दिखाई दीं। दूर आकाश के नीचे सफेद पर्वत ऐसे खड़े थे, मानो बादलों के बीच किसी ने प्रकाश की एक दीवार खड़ी कर दी हो। गाड़ी की खिड़की से उन्हें देखते हुए कुछ क्षणों के लिए आसपास की सारी हलचल अप्रासंगिक हो गई। वे इतने निकट भी लगते थे और इतने दूर भी कि उनके बीच की दूरी का अनुमान लगाना कठिन था। मैंने कैमरा उठाया, लेकिन तस्वीर लेते समय लगा कि कैमरा उस दृश्य को तो दर्ज कर सकता है, उसके सामने खड़े होने का अनुभव नहीं। पहाड़ों की भव्यता केवल उनकी ऊँचाई में नहीं होती; उसमें एक ऐसी निस्पृहता भी होती है, जो मनुष्य को अपने छोटे-से संसार से बाहर देखने के लिए प्रेरित करती है।
Read Also-यात्रा वृतांत : स्मृतियों में बस गई नागालैंड की दजुकू वैली
धर्मशाला पहुँचकर सड़क के किनारे एक छोटी-सी दुकान पर रुका। वहाँ चाय के साथ स्थानीय पकवान मिल रहे थे। दुकानदार से बातचीत हुई तो उसने मौसम की ओर संकेत करते हुए कहा कि पहाड़ों में धूप देखकर भरोसा नहीं करना चाहिए; थोड़ी देर में बादल घिर सकते हैं और रास्ते का मिजाज बदल सकता है। उसकी बात सच निकली। कुछ ही देर बाद धूप की जगह धुंध ने ले ली। सामने की पहाड़ी धीरे-धीरे धूसर पर्दे में छिपने लगी। हवा में नमी बढ़ गई और पेड़ों की पत्तियाँ हिलने लगीं। यह परिवर्तन इतना सहज था कि प्रकृति को किसी दृश्य-सज्जा की आवश्यकता नहीं थी। वह स्वयं अपने रंग बदल रही थी।
Read Also- यात्रा वृतांत : मियार वैली : दिल में उतरने वाली यात्रा
अगली सुबह धौलाधार को देखने की उत्सुकता ने जल्दी जगा दिया। रात की ठंडक अभी हवा में बची हुई थी। आसमान साफ था और दूर की चोटियों पर उगते सूरज की रोशनी पड़ रही थी। बर्फ कहीं सुनहरी दिखाई देती थी, कहीं हल्की गुलाबी। नीचे घाटी में बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े तैर रहे थे। कुछ देर तक मैं बिना कुछ बोले उस दृश्य को देखता रहा। तभी पास में खड़ा एक बच्चा अपने पिता से पूछने लगा, ‘पापा, पहाड़ों पर इतनी बर्फ क्यों है?’ पिता ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन बच्चा फिर पूछ बैठा, ‘और ये इतने बड़े कैसे हो गए?’ मैं अनायास मुस्करा दिया। उसके प्रश्न में वह सहज विस्मय था, जो बड़े होते-होते हमारे भीतर से कम होने लगता है। हम पहाड़ों के नाम जान लेते हैं, उनकी ऊँचाई नाप लेते हैं, तस्वीरें खींच लेते हैं; लेकिन उनके सामने खड़े होकर फिर से आश्चर्य करना भूल जाते हैं।
Read ALso- यात्रा वृतांत : नीलगिरि की वादियों में बिताए कुछ खूबसूरत पल
मैक्लोडगंज की ओर जाते हुए रास्ते में पर्यटकों की चहल-पहल थी। छोटी दुकानों में ऊनी कपड़े, हस्तशिल्प और रंग-बिरंगी वस्तुएँ सजी थीं। कैफे से आती कॉफी की गंध, दूर से सुनाई देती प्रार्थना की ध्वनि और गलियों में घूमते लोगों के बीच पहाड़ी जीवन की अपनी लय थी। एक छोटे-से भोजनालय में बैठकर खाना खाया। बाहर हल्की ठंड थी और भीतर गर्म भोजन की भाप। वहाँ बैठे कुछ यात्रियों की बातचीत में ट्रेकिंग, मौसम और अगले दिन की योजना का जिक्र था। सबके आने के कारण अलग थे, लेकिन पहाड़ों के सामने पहुँचकर सबके पास कहने के लिए लगभग एक ही बात थी- यहाँ आकर अच्छा लग रहा है। शायद प्रकृति का आकर्षण यही है कि वह अलग-अलग स्वभाव और अनुभव वाले लोगों को कुछ देर के लिए एक साझा मौन में ले आती है।
Read Also-यात्रा वृतांत : अलकनंदा : गति, रंग व स्वर बदलती नदी
धौलाधार के आसपास बिताए वे कुछ दिन बहुत लंबी अवधि के नहीं थे, फिर भी उन्होंने समय के अनुभव को बदल दिया। दिल्ली में जहाँ हर क्षण किसी अगले काम की ओर धकेलता है, वहाँ सुबह की धूप को पहाड़ पर उतरते देखना भी अपने आप में एक काम था। रास्ते पर चलते हुए पेड़ों की छाया पर ध्यान जाता, हवा की ठंडक महसूस होती और बादलों का बदलता आकार आँखों को रोक लेता। वहाँ यह जरूरी नहीं था कि हर अनुभव को तुरंत शब्दों या तस्वीरों में बदल दिया जाए। कुछ दृश्य केवल देखे जाने के लिए होते हैं और कुछ क्षण केवल भीतर सँजोने के लिए।
वापसी के दिन जब गाड़ी फिर मैदानों की ओर उतरने लगी, धौलाधार की चोटियाँ धीरे-धीरे पीछे छूटती गईं। कुछ देर तक वे खिड़की से दिखाई देती रहीं, फिर पहाड़ियों और बादलों के बीच ओझल हो गईं। सड़क वही थी, गाड़ी वही थी और दिल्ली लौटने की प्रतीक्षा भी थी, लेकिन यात्रा पर निकलते समय मन में जो बेचैनी थी, वह अब वैसी नहीं रही। मैंने डायरी खोली और कुछ पंक्तियाँ लिखीं। शब्द कम थे, पर उनके पीछे रास्तों की लंबाई, चाय की गर्माहट, अनजान लोगों की बातें और बर्फ पर पड़ती सुबह की धूप मौजूद थी।
Read Also- यात्रा वृतांत : स्मृतियों में बसा गुशैणी गांव
दिल्ली लौटकर शहर फिर अपनी पूरी रफ्तार में मिला। वही शोर, वही भीड़ और वही जल्दबाजी। लेकिन अब उस शोर के बीच भी कभी-कभी धौलाधार की सफेद चोटियाँ आँखों के सामने उभर आती हैं। तब लगता है कि यात्रा केवल किसी स्थान तक पहुँचने का नाम नहीं है। वह अपने भीतर कुछ जगह खाली करने की प्रक्रिया भी है, ताकि लौटने के बाद जीवन को थोड़ी अलग दृष्टि से देखा जा सके। धौलाधार पीछे छूट गया था, लेकिन उसकी शांति मन के भीतर कहीं ठहर गई थी।
Read Also- यात्रा वृतांत : पिन वैली : पहाड़ों की ख़ामोशी में जीवन की तलाश

