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Jharkhand Highcourt : शादीशुदा महिला से संबंध अपराध नहीं, झारखंड हाईकोर्ट ने JAP कांस्टेबल की बर्खास्तगी रद की

कोर्ट ने कहा- व्यभिचार अब अपराध नहीं, चार्जशीट से बाहर के आरोपों पर कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ

by Mujtaba Haider Rizvi
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Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी शादीशुदा महिला के साथ सहमति से संबंध रखना अपने आप में अपराध नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप) के कांस्टेबल भरत पाठक की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए विभागीय कार्रवाई रद्द कर दी।

यह फैसला हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने कांस्टेबल की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर कर चुका है। ऐसे में केवल इस आधार पर किसी कर्मचारी के खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।

मामले के अनुसार वर्ष 2023 में एक महिला ने कांस्टेबल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि दोनों पहले से शादीशुदा होने के बावजूद कांस्टेबल ने उससे कथित तौर पर विवाह किया और वर्ष 2019 से 2023 के बीच शारीरिक संबंध बनाए। बाद में उसने महिला को अपने साथ रखने से इनकार कर दिया। शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज होने के साथ विभागीय जांच भी शुरू की गई और पुलिस मैनुअल के नियम 824(बी) के तहत कांस्टेबल को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय चार्जशीट में केवल एक शादीशुदा महिला के साथ संबंध रखने और अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया था, जबकि अंतिम बर्खास्तगी आदेश में बलात्कार से संबंधित एफआईआर को आधार बनाया गया, जो चार्जशीट का हिस्सा ही नहीं थी। अदालत ने कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को केवल उन्हीं आरोपों के आधार पर दंडित किया जा सकता है, जिनका उल्लेख चार्जशीट में किया गया हो। इसके विपरीत कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विभाग शिकायतकर्ता के आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। कथित विवाह, साथ रहने या अन्य आरोपों की पुष्टि के लिए न तो कोई दस्तावेजी प्रमाण, न सीसीटीवी फुटेज और न ही कोई अन्य विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध कराया गया।

अदालत ने टिप्पणी की कि पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में विभागीय अधिकारियों द्वारा सेवा से बर्खास्त करने जैसा कठोर निर्णय लेना अधिकारों के दुरुपयोग के समान है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कांस्टेबल भरत पाठक की बर्खास्तगी तथा उनके खिलाफ जारी सभी विभागीय आदेशों को निरस्त कर दिया।

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