रांची। बोकारो, हजारीबाग और चाईबासा जिलों में सामने आए वेतन घोटाले ने पुलिस महकमे को झकझोर कर रख दिया है। करोड़ों रुपये की अवैध निकासी के इस मामले की जांच कर रही सीआईडी की विशेष जांच टीम (SIT) को ऐसे तथ्य मिले हैं, जो सिस्टम की बड़ी खामियों और आंतरिक लापरवाही की ओर इशारा करते हैं।
जांच में खुलासा हुआ है कि इस पूरे घोटाले की जड़ ‘डिजिटल प्रक्रिया’ में छिपी कमजोर कड़ियां और अधिकारियों का अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर अत्यधिक भरोसा रहा। पुलिसकर्मियों के वेतन भुगतान के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग किया जाता है, जिसमें जिले के सभी कर्मियों का डेटा दर्ज रहता है। इस पोर्टल में किसी भी बदलाव के लिए संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) के मोबाइल पर ओटीपी आता है, जिसे दर्ज करने के बाद ही संशोधन संभव होता है।
अधिकारियों ने लेखापालों पर भरोसा कर सौंप दी ‘चाबी’
लेकिन यहीं से गड़बड़ी की शुरुआत हुई। व्यस्तता के चलते कई डीएसपी स्तर के अधिकारियों ने ओटीपी साझा करने की जिम्मेदारी अपने लेखापालों को दे दी। कई मामलों में तो अधिकारियों ने अपना मोबाइल और लॉग-इन एक्सेस तक सौंप दिया। इसी भरोसे का फायदा उठाते हुए लेखापालों ने सिस्टम में हेरफेर शुरू कर दिया।
घोटाले का तरीका बेहद सुनियोजित था। जांच में सामने आया है कि रिटायर हो चुके पुलिसकर्मियों के रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ की गई। उनकी जन्मतिथि बदलकर उन्हें सिस्टम में ‘कार्यरत’ दिखाया गया। इसके बाद उनके असली बैंक खातों की जगह लेखापालों ने अपने परिचितों और रिश्तेदारों के खाते दर्ज कर दिए। परिणाम यह हुआ कि एक ओर संबंधित कर्मचारी अपनी पेंशन लेते रहे, वहीं दूसरी ओर उनके नाम पर निकलने वाली वेतन राशि फर्जी खातों में जाती रही।
SIT की जांच में यह भी सामने आया है कि इस तरीके से लंबे समय तक रकम निकाली जाती रही और किसी को भनक तक नहीं लगी। बोकारो और हजारीबाग से गिरफ्तार किए गए लेखापालों से पूछताछ में इस पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ है।
अब जांच एजेंसी इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि क्या संबंधित अधिकारी केवल लापरवाही के दोषी हैं या इस पूरे खेल में उनकी भी कोई भूमिका रही है। फिलहाल मामला गंभीर विश्वासघात और सरकारी धन की हेराफेरी का प्रतीत हो रहा है। SIT पूरे नेटवर्क को खंगालने में जुटी है और आने वाले दिनों में और बड़े खुलासे की संभावना जताई जा रही है।

