
खूंटी : जिले में पिछले दो दिनों से हुई झमाझम बारिश के बाद खूंटी में धान रोपनी तेज हो गई है। खेतों के साथ किसानों के चेहरे पर भी हरियाली छा गई है। मदईत परंपरा के सहारे किसान अपने खेतों में धानरोपनी करा रहे हैं। यह परंपरा गांवों में किसानों के लिए ताकत साबित हो रही है।
जानकारी के अनुसार पर्याप्त वर्षा होने से खेतों में पानी भर गया है। गांव-गांव में खेती-किसानी में लोगों में उत्साह देखने को मिल रहा है।
खेतों में महिलाएं कतारबद्ध होकर धान के बिचड़े रोपती नजर आ रही हैं, जबकि पुरुष किसान खेत तैयार करने, हल चलाने और अन्य कृषि कार्यों में व्यस्त हैं। कई स्थानों पर छोटे बच्चे भी अपने माता-पिता और परिजनों का हाथ बंटाते दिखाई दे रहे हैं।
तोरपा के किसान शिव शंकर साहू और निधिया के रंजीत महतो कहते हैं कि समय पर हुई बारिश से इस वर्ष अच्छी पैदावार की उम्मीद बढ़ गई है। उनका मानना है कि यदि मौसम इसी तरह अनुकूल रहा तो धान की फसल बेहतर होगी और आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी।
किसान बालकिशुन मुंडा ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में आज भी वर्षों पुरानी मदईत परंपरा जीवंत है। आधुनिक समय में भी ग्रामीण इस परंपरा को अपनी सबसे बड़ी सामाजिक ताकत मानते हैं। मदईत के तहत गांव के महिला और पुरुष अलग-अलग समूह बनाकर एक-दूसरे के खेतों में श्रमदान करते हैं। इससे किसानों को धनरोपनी में पैसे की बचत होती है और आपसी प्रेम भी प्रगाढ़ होता है। किसान बारी-बारी से सभी के खेतों में जाकर रोपाई का काम पूरा कराते हैं। इससे कम समय में अधिक खेतों की रोपाई संभव हो पाती है।
इस सहयोग के बदले किसी प्रकार की मजदूरी नहीं ली जाती। कार्य पूरा होने के बाद संबंधित किसान अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करने वाले ग्रामीणों के लिए भोजन की व्यवस्था करता है। ग्रामीणों का कहना है कि मदईत केवल खेती का तरीका नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यही परंपरा गांवों में सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रही है।

