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Navratri 2024: महिलाओं की तरह साड़ी पहन पुरुष करते हैं गरबा, गुजरात के इस जगह की खास है दशहरा

अहमदाबाद स्थित साडू माता नी पोल में पुरुषों द्वारा निभाई जाने वाली एक अनोखी रस्म देशभर में आकर्षण का केंद्र है। यहां हर साल, नवरात्रि की आठवीं रात, बरोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा करते हैं।

by Priya Shandilya
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नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। देश के हर कोने में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा विधि-विधान के साथ जोर शोर से चल रही है। इस विशेष अवसर पर विभिन्न राज्यों में दुर्गा मां की पूजा के साथ कुछ खास परंपराओं का भी अनुसरण किया जाता है। जैसे बंगाल का धुनुची नाच, गुजरात का गरबा-डांडिया काफी मशहूर है। मगर, क्या आप जानते हैं, कि गुजरात के अहमदाबाद में दशहरा के इस अवसर पर एक और दिलचस्प परंपरा सालों से चली आ रही है। आइये जानें इसकी खासियत।

अहमदाबाद स्थित ‘साडू माता नी पोल’ में पुरुषों द्वारा निभाई जाने वाली एक अनोखी रस्म दशहरा के दौरान देशभर में आकर्षण का केंद्र बन जाती है। यहां हर साल, नवरात्रि की आठवीं रात, बरोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा करते हैं। माना जाता है कि ऐसा कर पुरुष अपने पूर्वजों से जुड़े एक अभिशाप का प्रायश्चित करते हैं। यह रस्म सिर्फ प्रायश्चित नहीं बल्कि तपस्या और भक्ति का प्रतीक है।

200 साल पुरानी है ये परंपरा

स्थानीय किंवदंती के अनुसार, यह परंपरा 200 साल पहले शुरू हुई थी। कहते हैं कि यहां साडूबेन नाम की एक महिला रहती थी। एक बार जब एक मुगल रईस, साडूबेन को अपनी रखैल बनाने की फिराक में था, तब साडूबेन ने बरोट समुदाय के पुरुषों से शरण मांगी। पर किसी ने साडूबेन की कोई मदद नहीं की। इस वजह से साडूबेन को अपना बच्चा खोना पड़ा। जब बरोट समुदाय के पुरुष साडूबेन की मदद करने में विफल रहे, तो अपने दुख में, साडूबेन ने पुरुषों को श्राप दिया कि उनके वंशज कायर पैदा होंगे और खुद को ‘सती’ कर लेंगे।

अष्ठमी की रात होता है उत्सव का माहौल

साडू माता की आत्मा को प्रसन्न करने और श्राप से मुक्ति पाने के लिए उनके सम्मान में साडू माता नी पोल में एक मंदिर बनाया गया था। हर साल, पुरुष तपस्या के रूप में गरबा करने के लिए साड़ियों में इकट्ठा होते हैं। अष्टमी की रात को, साडू माता नी पोल जहां एक हजार से अधिक लोग रहते हैं, काफी जीवंत हो उठता है। ऐसा लगता है मानो उत्सव चल रहा हो। गांव की संकरी गलियां पारंपरिक लोक नृत्य शेरी गरबा की धुनों पर साड़ियों में घूमते पुरुषों को देखने के लिए भीड़ से भर जाती है।

बरोट समुदाय को झेलना पड़ता है जेंडर डिस्क्रिमिनेशन?

कुछ लोगों को बरोट समुदाय के पुरुषों द्वारा निभाई जाने वाली यह प्रथा अटपटी लग सकती है। लेकिन उनके लिए यह विनम्रता और सम्मान का प्रतीक है। यह अनुष्ठान पिछले पापों का प्रायश्चित करने के साथ-साथ साडू माता द्वारा दिए गए आशीर्वाद के लिए आभार व्यक्त करने का भी काम करता है।

इन राज्यों में भी है अनोखी रस्में

मलयालम महीने मीनम (मार्च के मध्य से अप्रैल के मध्य) की 10 और 11 तारीख को केरल के कोल्लम जिले में ‘चामायाविलक्कू’ मनाया जाता है। यह वार्षिकोत्सव कोट्टनकुलंगरा श्री भगवती मंदिर में आयोजित की जाती है। इस दो दिवसीय उत्सव के दौरान हजारों पुरुष यहां महिलाओं के वेश में नजर आते हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में होली के दौरान पुरुष देवी रति और भगवान मनमथा की प्रार्थना करने के लिए महिलाओं की तरह सजते-संवरते हैं। माना जाता है कि होली के दिन पुरुष अपनी बुरी किस्मत से छुटकारा पाने के लिए साड़ी पहनते हैं। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की सीमा पर स्थित इस गांव में होली के दिन ज्यादातर पुरुष महिलाओं के वेश में दिखाई देते हैं।

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