
CENTRAL DESK,नई दिल्ली/रांची : राजधानी के मधुकम में दशकों से रह रहे 12 परिवारों की बेदखली से जुड़ा मामला अब पूरी तरह समाप्त होता दिख रहा है। झारखंड हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने पहुंचे जमीन मालिक महादेव उरांव को सुप्रीम कोर्ट से भी कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने उरांव की विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता के रवैये पर भारी नाराजगी जताई, जिसके बाद उरांव की तरफ से याचिका वापस ले ली गई।
अदालत की सख्त टिप्पणी, 10 लाख के जुर्माने का दिया संकेत
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जज इस बात से बेहद असहज दिखे कि पहले तो लोगों से जमीन के बदले मोटी रकम वसूल ली गई और बाद में उन्हीं को हटाने के लिए अदालत का इस्तेमाल किया गया। पीठ ने कहा कि यह मामला सीधे तौर पर धोखाधड़ी जैसा लगता है। अदालत ने याचिकाकर्ता पर 10 लाख रुपये तक का हर्जाना लगाने का मन बनाया, जिसके बाद उरांव के वकील ने आनन-फानन में याचिका वापस लेने का अनुरोध किया।
हाईकोर्ट ने लगाया था 12 लाख का जुर्माना
इससे पहले 31 जुलाई 2026 को झारखंड हाईकोर्ट ने भी इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने 50-60 सालों से बस रहे गैर-आदिवासी परिवारों को बड़ी राहत देते हुए मकान तोड़ने का आदेश रद्द कर दिया था। इसके साथ ही, अदालत से सच छिपाने और गुमराह करने के आरोप में महादेव उरांव पर 12 लाख रुपये का जुर्माना ठोका था। कोर्ट का सख्त आदेश था कि यह रकम पीड़ित 12 परिवारों को 1-1 लाख रुपये के मुआवजे के रूप में दी जाए।
ऐसे समझिए पूरा मामला
सुनवाई में सामने आया कि जमीन के बदले 1 करोड़ रुपये से अधिक का लेनदेन (5.25 लाख रुपये प्रति डिसमिल) हुआ था, जिसे अदालत से पूरी तरह छिपाया गया। याचिकाकर्ता ने जिनके मकान तुड़वाने की अर्जी दी थी, उन्हें मूल केस में पक्षकार ही नहीं बनाया था। ताकि प्रभावित पक्ष अपनी बात नहीं सके। उरांव ने पूर्व में मिले एक आदेश की आड़ लेकर हेहल अंचल के जरिए शिव-दुर्गा मंदिर रोड स्थित इन मकानों पर बुलडोजर चलवाने की कोशिश की थी।
पीड़ित परिवारों ने जमीन खरीदकर मकान बनाने के सबूत कोर्ट के सामने रखे थे। हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी और फैसले ने साफ कर दिया है कि अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करके किसी को बेघर नहीं किया जा सकता।
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