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 Women Empowerment : कोल्हान की पहाड़ियों से रायसीना हिल तक छलांग, जानिए पद्मश्री चामी मुर्मू की प्रेरक यात्रा

राह में मिले सैकड़ों सितम,पर कभी न लड़खड़ाए कदम। 35 लाख से अधिक लगाए पैधे, जंगल में लाई हरियाली। 33 हजार महिलाओं को दिखाई स्वावलंबन की राह, बनाया खुशहाल।

by Kanchan Kumar
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कंचन कुमार, रांची : धूप से तपी पथरीली पगडंडियों पर नंगे पांव चलती एक परछाईं… हाथ में कुदाल, आंखों में अडिग संकल्प और चेहरे पर सादगी की गहरी रेखाएं। यह मंजर है सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर स्थित बगराईसाई गांव का। इसी गांव की मिट्टी से उठीं चामी मुर्मू आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और नारी शक्ति का जीवंत प्रतीक बन चुकी हैं। घने जंगलों, गहरी खाइयों और दुरूह पहाड़ियों से शुरू हुआ उनका सफर देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रांगण रायसीना हिल (राष्ट्रपति भवन) तक पहुंच चुका है।
​पद्मश्री से लेकर इंदिरा गांधी वृक्ष मित्र पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त नारी शक्ति सम्मान तक..,. पुरस्कारों की एक लंबी फेहरिस्त है। लेकिन आज भी चामी मुर्मू की सादगी और हरे-भरे झारखंड का उनका सपना वैसा ही अटूट है।

जब अभावों ने सिखाया जीना

राजनगर के भुरसा गांव में ​1973 में जन्मीं चामी का बचपन अभावों के बीच बीता। उनका परिवार पूरी तरह खेती-बाड़ी और मजदूरी पर आश्रित था। उन दिनों काम के बदले पैसे नहीं, बल्कि धान मिला करता था। जब वह महज आठवीं कक्षा में थीं, तब पिता का साया सिर से उठ गया।

​घर में मां, छोटे भाइयों और बहन की जिम्मेदारी उनके बाल कंधों पर आ गई। तंगहाली ऐसी कि परिवार का पेट भर पाना बड़ी चुनौती थी। मजबूरी में उन्हें दूसरों के खेतों में मजदूरी करनी पड़ी। दसवीं से आगे पढ़ाई के रास्ते बंद हो गए। सपना टूट गया। लेकिन परिस्थितियां कुछ पल के लिए रास्ते तो रोक सकती हैं, हौसले यदि कायम तो नए रास्ते भी निकल आते हैं।

दादाजी की सीख से पेड़ों को बनाया हमसफर

​प्रकृति व पर्यावरण से प्यार चामी को विरासत में मिला। उनके दादाजी सामाजिक-धार्मिक कार्यों से गांव-गांव घूमते थे। नन्हीं चामी भी उनके साथ होती थीं। बैठकों बुजुर्ग अक्सर चर्चा करते थे कि हम आदिवासी पेड़ों की पूजा करते हैं। हमारा जीवन इन्हीं पर निर्भर है। यह मंत्र ने चामी के बाल-मन को झकझोर दिया। पर्यावरण को सहेजने की ललक उनमें बड़ती गई।

​एक महिला सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद 1992 में चामी ने अपने हाथों पहला पौधा लगाया। इसके बाद तो मानो उनमें पंख लग गए। एक बूंद से शुरू हुआ यह सफर समंदर बनता चला गया। 11 महिलाओं को साथ लेकर उन्होंने सहयोगी महिला नामक संस्था की नींव रखी। आज तीन दशकों की इस कठोर तपस्या का नतीजा है कि सरायकेला-खरसावां, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम के 720 हेक्टेयर से अधिक बंजर इलाके पर 35 लाख से भी ज्यादा पेड़ लहरा रहे हैं।

वन माफिया भी नहीं तोड़ पाए हौसला

​चामी मुर्मू की यह राह बहुत आसान नहीं थे। वन माफियाओं का आतंक, आर्थिक संकट और सामाजिक बंदिशें…सैकड़ों सितम उनकी राह में आए। ​साल 1995-96 में उन्होंने एक नर्सरी में एक लाख पौधे तैयार किए थे। लेकिन एक काली रात वन माफियाओं ने पूरी की पूरी नर्सरी तहस-नहस कर दी। चामी टूटी नहीं।उन्होंने गांव में बैठक की, केस दर्ज करवाया और पुलिस की मदद से गुनहगारों को जेल भिजवाया। दस साल पहले जब पेड़ काटने आए दबंगों से चामी सीधे भिड़ गईं, तो माफियाओं को उल्टे पांव भागना पड़ा।

​मुट्ठी भर चावल से 33 हजार महिलाओं को जोड़ा

​​चामी मुर्मू का मानना है कि हर हाथ को काम और हर खेत को पानी मिले बिना पलायन नहीं रुक सकता। शुरुआत में जब संस्था के पास पैसे नहीं थे तो गांव की महिलाएं खाना बनाते समय सुबह-शाम एक-एक मुट्ठी चावल अलग रख देती थीं। हफ्ते के अंत में उस चावल को बेचकर बचत की शुरुआत हुई।
​इसी छोटे से प्रयास से आज लगभग तीन हजार से अधिक महिला स्वयं सहायता समूह खड़े हो चुके हैं, जिनसे 33 हजार से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं। सबर और पहाड़िया जैसी सुदूरवर्ती आदिम जनजातियों की महिलाओं को बैंक से जोड़कर बत्तख पालन, मुर्गी पालन, मुढ़ी बनाने और चावल व्यापार के जरिए स्वावलंबी बनाया गया है। पहाड़िया जनजाति की बेटियों के लिए पढ़ाई और स्वास्थ्य-सुरक्षा का बीड़ा भी चामी मुर्मू ने ही उठा रखा है।

जल संरक्षण की अनोखी मिसाल

​पहाड़ों पर जब मूसलाधार बारिश होती है तो पानी बहकर बर्बाद हो जाता है। चामी मुर्मू खुद कुदाल लेकर पहाड़ी नालियां बनाने में जुट जाती हैं। उनके संगठन ने 71 गांवों में 213 तालाब और 4 ‘अमृत सरोवर’ बनाए हैं। पहाड़ के ढलानों पर गड्ढे खोदे गए ताकि बारिश का पानी ठहर सके।
​आज इन तालाबों से गांवों में जलस्तर सुधरा है, मछली पालन हो रहा है और साल में दो-तीन बार खेती संभव हो पाई है। कोयले पर निर्भरता खत्म हो चुकी है और ग्रामीणों को जलावन के लिए सूखी लकड़ियां मुफ्त में मिलने लगी हैं।
विवाहित चाखी मुर्मू ने मदर टेरेसा को अपना रोल मॉडल मानकर अपना पूरा जीवन समाज और पर्यावरण के नाम समर्पित कर दिया। जब 75वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ के लिए चयनित किया, तो सरायकेला के उपायुक्त ने दूरभाष पर उन्हें यह खुशखबरी दी थी। वह बताती हैं अभी जल संरक्षण पर फोकस है।

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