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Vishwakarma Puja : विश्वकर्मा को क्यों कहा जाता है औजारों और शिल्पकला का देवता? जानिए लंका से पुष्पक विमान तक की मान्यताएं

विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कारीगर, शिल्पकार, मजदूर, अभियंता और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विश्वकर्मा से कार्य में सफलता, सुरक्षित कार्य व्यवस्था और उन्नति की कामना की जाती है

by Rakesh Pandey
Vishwakarma Puja
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फीचर डेस्क : भगवान विश्वकर्मा को सनातन परंपरा में देवशिल्पी के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वे सृष्टि के महान वास्तुकार और निर्माण कला के अधिष्ठाता देवता माने जाते हैं। कहा जाता है कि देवताओं के लिए भव्य महल, नगर, विमान, अस्त्र-शस्त्र और अनेक दिव्य वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था। निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले औजारों और उपकरणों को भी उनकी शिल्पकला से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कारीगरों से लेकर तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग मशीनों, औजारों और कार्यस्थल की पूजा करते हैं।

भगवान विश्वकर्मा को लेकर अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं में उनके द्वारा बनाई गई कई अद्भुत रचनाओं का उल्लेख मिलता है। सोने की लंका से लेकर द्वारका और इंद्रपुरी तक को उनकी वास्तुकला से जोड़कर देखा जाता है। पुष्पक विमान को भी उनकी दिव्य रचनाओं में शामिल किया जाता है। इन मान्यताओं के कारण भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का प्रमुख शिल्पकार और निर्माण कला का अधिष्ठाता माना जाता है।

सोने की लंका के निर्माण से जुड़ी विश्वकर्मा की मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने भगवान शिव और माता पार्वती के लिए सोने की लंका का निर्माण किया था। कहा जाता है कि लंका की संरचना बेहद भव्य थी और वहां के महल, भवन तथा दीवारें स्वर्ण से निर्मित थीं। इसकी सुंदरता और वैभव की चर्चा धार्मिक कथाओं में प्रमुखता से मिलती है।

मान्यता के अनुसार सोने की लंका के गृह प्रवेश के अवसर पर रावण के पिता ऋषि विश्रवा को पूजा कराने के लिए बुलाया गया था। पूजा पूरी होने के बाद जब दक्षिणा देने की बात आई तो ऋषि विश्रवा ने सोने की लंका ही मांग ली। इसके बाद यह नगरी रावण के अधिकार में आई और आगे चलकर वह इसका राजा बना। रामायण की कथा में भी लंका की समृद्धि और भव्यता का उल्लेख मिलता है।

समुद्र के बीच द्वारका नगरी की रचना

भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी को भी भगवान विश्वकर्मा की प्रमुख रचनाओं में माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा पर लगातार होने वाले हमलों के कारण श्रीकृष्ण ने अपने लोगों की सुरक्षा के लिए एक सुरक्षित नगर बसाने का निर्णय लिया था। इसके बाद विश्वकर्मा ने समुद्र के बीच द्वारकापुरी का निर्माण किया। मान्यता है कि यह नगरी करीब 12 योजन क्षेत्र में बसाई गई थी। धार्मिक कथाओं में कहा गया है कि विश्वकर्मा ने इसे बहुत कम समय में तैयार किया था। द्वारका में भव्य महल, चौड़ी सड़कें, उद्यान और सुरक्षा की विशेष व्यवस्थाएं थीं। इसी कारण इसे प्राचीन नगर निर्माण और वास्तुकला की अद्भुत मिसाल के रूप में धार्मिक परंपरा में याद किया जाता है।

इंद्रपुरी को भी विश्वकर्मा की रचना माना जाता है

देवलोक के राजा इंद्र की राजधानी इंद्रपुरी के निर्माण का श्रेय भी भगवान विश्वकर्मा को दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इंद्रपुरी में विशाल और आकर्षक महल, सुंदर उद्यान तथा भव्य मार्ग बनाए गए थे। इसकी संरचना में सुंदरता के साथ सुविधाओं और सुरक्षा का भी विशेष ध्यान रखा गया था। पौराणिक कथाओं में इंद्रपुरी की भव्यता का वर्णन करते हुए इसे ऐसी दिव्य नगरी बताया गया है, जिसे देखकर देवता और ऋषि-मुनि भी प्रभावित होते थे। इसी तरह की मान्यताओं के आधार पर विश्वकर्मा को देवताओं का कुशल वास्तुकार और शिल्पकार माना गया।

पुष्पक विमान को भी विश्वकर्मा की रचना माना जाता है

भगवान विश्वकर्मा की दिव्य रचनाओं में पुष्पक विमान का भी उल्लेख मिलता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार इसका निर्माण ब्रह्मा के लिए किया गया था। बाद में यह धन के देवता कुबेर को प्राप्त हुआ। कथा के अनुसार रावण ने कुबेर से पुष्पक विमान छीन लिया था। पुष्पक विमान को लेकर प्रचलित मान्यता इसे सामान्य विमान से अलग और दिव्य बताती है। कहा जाता है कि यह चालक की इच्छा के अनुसार गति से चलता था और आवश्यकता के अनुसार अपना आकार बदल सकता था। रामायण की कथा में लंका विजय के बाद भगवान राम के पुष्पक विमान से अयोध्या लौटने का उल्लेख मिलता है।

क्यों कहलाते हैं भगवान विश्वकर्मा देवशिल्पी?

भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी पौराणिक कथाओं में निर्माण, वास्तुकला और शिल्पकला का विशेष महत्व दिखाई देता है। सोने की लंका, द्वारका, इंद्रपुरी और पुष्पक विमान जैसी रचनाओं को उनकी अद्भुत शिल्पकला से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण उन्हें देवशिल्पी कहा जाता है।

विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कारीगर, शिल्पकार, मजदूर, अभियंता और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विश्वकर्मा से कार्य में सफलता, सुरक्षित कार्य व्यवस्था और उन्नति की कामना की जाती है। इस प्रकार विश्वकर्मा पूजा केवल औजारों की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि निर्माण और शिल्प परंपरा के प्रति सम्मान से भी जुड़ी धार्मिक परंपरा मानी जाती है।

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