
जमशेदपुर: जब सपनों में जान और इरादों में चट्टान जैसी मजबूती हो तो तंगहाली भी रास्ता छोड़ने पर मजबूर हो जाती है। जमशेदपुर की तीरंदाज अंकिता भकत की कहानी इस बात की जीती-जागती मिसाल है। एक वक्त ऐसा भी था जब अंकिता के पास तीरंदाजी का सामान खरीदने तक के पैसे नहीं थे। उनके पिता दूध बेचकर परिवार का गुजारा करते थे। लेकिन अंकिता ने उधार के धनुष-तीर से अभ्यास शुरू कर आज वह कर दिखाया, जिसका इंतजार भारतीय खेल इतिहास सालों से कर रहा था।
2 अक्तूबर 2026 को अंकिता भकत ने अपनी साथी खिलाड़ियों कीर्ति शर्मा और कुमकुम मोहोद के साथ मिलकर एशियन गेम्स में इतिहास रच दिया। भारतीय महिला रिकर्व टीम ने रोमांचक फाइनल मुकाबले में मजबूत दक्षिण कोरियाई टीम को 5-3 से पटखनी देकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। एशियन गेम्स के इतिहास में यह पहला मौका है जब भारत की महिला रिकर्व टीम ने सोने का तमगा हासिल किया है।
खेल से जुड़ाव और तंगहाली का दौर
कोलकाता की गलियों में पली-बढ़ीं अंकिता की तीरंदाजी से पहली मुलाकात साल 2008 में हुई थी, जब वे अपने पिता शांतनु भकत के साथ एक स्थानीय तीरंदाजी प्रतियोगिता देखने गई थीं। वहीं से उनके मन में इस खेल का जुनून सवार हुआ। हालांकि, पेशेवर तीरंदाजी का सामान काफी महंगा होता है और दूध बेचने वाले पिता के लिए रिकर्व धनुष खरीदना नामुमकिन सा था।
अंकिता ने हार मानने के बजाय स्थानीय क्लब से उधार के उपकरण लेकर अभ्यास जारी रखा। शुरुआती दिनों में उन्होंने बेसिक ‘इंडियन राउंड’ से शुरुआत की। आर्थिक तंगी के बावजूद उनकी बुआ ने हिम्मत बढ़ाई और अभ्यास का सामान खरीदने में थोड़ी आर्थिक मदद की।
जमशेदपुर ने दी नई उड़ान
अंकिता की मेहनत तब रंग लाई जब 2014 में उनका चयन जमशेदपुर की प्रसिद्ध टाटा आर्चरी अकादमी में हो गया। यहां उन्हें देश के दिग्गज कोच पूर्णिमा महतो और धर्मेंद्र तिवारी का मार्गदर्शन मिला। अकादमी की विश्वस्तरीय सुविधाओं और सटीक ट्रेनिंग ने अंकिता के हुनर को तराश कर निखार दिया। इसके बाद अंकिता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

एक नजर अंकिता की उपलब्धियों पर
2017: विश्व तीरंदाजी युवा चैंपियनशिप में मिश्रित टीम स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता।
2022: एशियन गेम्स में महिला टीम स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया।
2024: पेरिस ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए मिश्रित टीम इवेंट में चौथा स्थान हासिल किया।
2025: एशियन तीरंदाजी चैंपियनशिप में व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा का गोल्ड जीतकर नया मुकाम हासिल किया।
अनुशासन और जिद की अनोखी मिसाल
पेरिस ओलंपिक की कसक को पीछे छोड़ते हुए अंकिता ने 2026 के एशियन गेम्स में आखिरकार वह सपना पूरा कर दिखाया जिसकी उम्मीद पूरे देश को थी। अंकिता की सफलता का राज उनका कड़ा अनुशासन और खेल के प्रति बेपनाह लगाव है।
प्रैक्टिस का समय शुरू होने से एक घंटा पहले मैदान पर पहुंच जाना उनकी आदत में शुमार है। अंकिता बताती हैं कि अगर छुट्टी के दिन भी वे धनुष-कमान न थामें, तो उन्हें अजीब सी बेचैनी होने लगती है। अभावों की आंधी में भी सपनों का दीया जलाए रखने वाली अंकिता भकत की यह स्वर्णिम यात्रा देश के करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

